गुलज़ारीलाल नन्दा (जन्म- 4 जुलाई, 1898)

July 04, 2017

गुलज़ारीलाल नन्दा (जन्म- 4 जुलाई, 1898, सियालकोट, पंजाब, पाकिस्तान; मृत्यु- 15 जनवरी, 1998) भारत के तेरह प्रधानमंत्रियों के अतिरिक्त कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अब तक के एकमात्र ऐसे व्यक्ति रहे, जिन्होंने इस ज़िम्मेदारी को दो बार निभाया। यह प्रासंगिक ही था कि कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में गुलज़ारी लाल नंदा के व्यक्तित्व और कर्तव्य को भी यहाँ पर प्रस्तुत किया जाता। दरअसल भारत की संवैधानिक परम्परा में यह प्रावधान है कि यदि किसी प्रधानमंत्री की उसके कार्यकाल के दौरान मृत्यु हो जाए और नया प्रधानमंत्री चुना जाना तत्काल सम्भव न हो तो कार्यवाहक अथवा अंतरिम प्रधानमंत्री की नियुक्ति तब तक के लिए की जा सकती है, जब तक की नया प्रधानमंत्री विधिक रूप से नियुक्त नहीं कर दिया जाता। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार प्रधानमंत्री के पद को रिक्त नहीं रखा जा सकता। कांग्रेस पार्टी के प्रति समर्पित गुलज़ारी लाल नंदा प्रथम बार पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद 1964 में कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाए गए। दूसरी बार लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद 1966 में यह कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। इनका कार्यकाल दोनों बार उसी समय तक सीमित रहा जब तक की कांग्रेस पार्टी ने अपने नए नेता का चयन नहीं कर लिया।


जन्म एवं परिवार
नंदाजी के रूप में विख्यात गुलज़ारी लाल नंदा का जन्म 4 जुलाई, 1898 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा है। इनके पिता का नाम 'बुलाकी राम नंदा' तथा माता का नाम 'श्रीमती ईश्वर देवी नंदा' था। नंदा की प्राथमिक शिक्षा सियालकोट में ही सम्पन्न हुई। इसके बाद उन्होंने लाहौर के 'फ़ोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज' तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। गुलज़ारी लाल नंदा ने कला संकाय में स्नातकोत्तर एवं क़ानून की स्नातक उपाधि प्राप्त की। इनका विवाह 1916 में 18 वर्ष की उम्र में ही 'लक्ष्मी देवी' के साथ सम्पन्न हो गया था। इनके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री सम्मिलित हुए। नंदा दीर्घायु हुए और 100 वर्ष की अवस्था में इनका निधन 15 जनवरी, 1998 को हुआ। इन्हें एक स्वच्छ छवि वाले गांधीवादी राजनेता के रूप में सदैव याद रखा जाएगा।


गुलज़ारी लाल नंदा एक राष्ट्रभक्त व्यक्ति थे। इस कारण भारत के स्वाधीनता संग्राम में इनका काफ़ी योगदान रहा। नंदाजी का जीवन आरम्भ से ही राष्ट्र के प्रति समर्पित था। 1921 में उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। नंदाजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने मुम्बई के 'नेशनल कॉलेज' में अर्थशास्त्र के व्याख्याता के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। अहमदाबाद की 'टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री' में यह 'लेबर एसोसिएशन' के सचिव भी रहे और 1922 से 1946 तक का लम्बा समय इन्होंने इस पद पर गुज़ारा। यह श्रमिकों की समस्याओं को लेकर सदैव जागरूक रहे और उनका निदान करने का प्रयास करते रहे। 1932 में सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान और 1942-1944 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय इन्हें जेल भी जाना पड़ा।


नंदा जी मुम्बई की विधानसभा में 1937 से 1939 तक और 1947 से 1950 तक विधायक रहे। इस दौरान उन्होंने श्रम एवं आवास मंत्रालय का कार्यभार मुम्बई सरकार में रहते हुए देखा। 1947 में 'इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस' की स्थापना हुई और इसका श्रेय नंदा जी को जाता है। मुम्बई सरकार में रहने के दौरान गुलज़ारी लाल नंदा की प्रतिभा को रेखांकित करने के बाद इन्हें कांग्रेस आलाक़मान ने दिल्ली बुला लिया। यह 1950-1951, 1952-1953 और 1960-1963 में भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर रहे। ऐसे में भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में इनका काफ़ी सहयोग पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्राप्त हुआ। इस दौरान उन्होंने निम्नवत् प्रकार से केन्द्रीय सरकार को सहयोग प्रदान किया-


गुलज़ारी लाल नंदा केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में कैबिनेट मंत्री रहे और स्वतंत्र मंत्रालयों का कार्यभार सम्भाला।
नंदाजी ने योजना मंत्रालय का कार्यभार सितम्बर 1951 से मई 1952 तक निष्ठापूर्वक सम्भाला।
नंदाजी ने योजना आयोग एवं नदी घाटी परियोजनाओं का कार्य मई 1952 से जून 1955 तक देखा।
नंदाजी ने योजना, सिंचाई एवं ऊर्जा के मंत्रालयिक कार्यों को अप्रैल 1957 से 1967 तक देखा।
नंदाजी ने श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय का कार्य मार्च 1963 से जनवरी 1964 तक सफलतापूर्वक देखा।


नंदाजी ने मंत्रिमण्डल में वरिष्ठतम सहयोगी होने के कारण दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व सम्भाला। इनका प्रथम कार्यकाल 27 मई, 1964 से 9 जून, 1964 तक रहा, जब पंडिल जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था। दूसरा कार्यकाल 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी, 1966 तक रहा, जब लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में देहान्त हुआ। नंदाजी प्रथम पाँच आम चुनावों में लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। गुलज़ारी लाल नंदा ने प्रत्येक विभाग में समर्पित भाव से कार्य किया और जनता ने इन्हें सराहा। यह गांधीवादी विचारधारा के साथ जुड़े रहे थे और लोकतांत्रिक मूल्यों में इनकी गहरी आस्था थी। नंदाजी धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी समाज की कल्पना करते थे। वह आजीवन ग़रीबों की सहायता के लिए प्रस्तुत रहे। गुलज़ारी लाल नंदा वृद्धावस्था के बावज़ूद 'भारत सेवक समाज' को अपनी सेवाएँ प्रदान करते रहे। यह संगठन उन्होंने स्वयं बनाया था और वह आजीवन इसकी देखरेख करते रहे। नंदाजी ने नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीति की थी। उम्र के अन्तिम पड़ाव पर पहुँचने के बाद उन्होंने राजनीति में हुए परिवर्तन को देश के लिए घातक बताया। राजनीति में अपराधी तत्वों का सक्रिय होना इन्हें चिंतित करता था। इस सम्बन्ध में उन्होंने कहा था कि अपराधिक स्तर की राजनीति कैंसर के समान घातक साबित होगी। नंदाजी ने एक लेखक की भूमिका अदा करते हुए कई पुस्तकों की रचना की। जिनके नाम इस प्रकार हैं- सम आस्पेक्ट्स ऑफ़ खादी, अप्रोच टू द सेकंड फ़ाइव इयर प्लान, गुरु तेगबहादुर, संत एंड सेवियर, हिस्ट्री ऑफ़ एडजस्टमेंट इन द अहमदाबाद टेक्सटाल्स, फॉर ए मौरल रिवोल्युशन तथा सम बेसिक कंसीड्रेशन।


गुलज़ारीलाल नन्दा को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न (1997) और दूसरा सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' प्रदान किया गया।



Gulzarilal Nanda (4 July 1898 – 15 January 1998) was an Indian politician and economist who specialized in labour issues. He was the caretaker Prime Minister of India for two short periods following the deaths of Jawaharlal Nehru in 1964 and Lal Bahadur Shastri in 1966. Both his terms ended after the ruling Indian National Congress's parliamentary party elected a new prime minister. He was awarded the Bharat Ratna, India's highest civilian award, in 1997 a year before his death in 1998.


Nanda was born on 4 July 1898 in Sialkot in the Punjab Province of British India into a Punjabi Hindu family of the Khatri caste. (After the partition of British India into India and Pakistan in 1947, Sialkot became a part of the Punjab Province of Pakistan.) Nanda received his education in Lahore, Amritsar, Agra, and Allahabad.


Nanda worked as a research scholar on labour problems at Allahabad University (1920–1921), and became a Professor of Economics at National College in Bombay (Mumbai) in 1921.[citation needed] The same year, he joined the Indian Non-Cooperation Movement against the British Raj. In 1922, he became secretary of the Ahmedabad Textile Labour Association where he worked until 1946. He was imprisoned for Satyagraha in 1932, and again from 1942 to 1944.[citation needed]. He was honored with "Proud Past Alumni" in the list of 42 members, from "Allahabad University Alumni Association", NCR, Ghaziabad (Greater Noida) Chapter 2007–2008 registered under society act 1860 with registration no. 407/2000.


He married Lakshmi, with whom he had two sons and a daughter.
In the British Raj, Nanda was elected to the Bombay Legislative Assembly in 1937, and served as parliamentary secretary (for Labor and Excise) to the Government of Bombay from 1937 to 1939. As Labour Minister of the Bombay Government during 1946–50, he successfully piloted the Labor Disputes Bill in the state assembly. He served as a Trustee of the Kasturba Memorial Trust. (Kasturba was the wife of Mahatma Gandhi.) He served as secretary of the Hindustan Mazdoor Sevak Sangh (Indian Labor Welfare Organization), and Chairman of the Bombay Housing Board. He was a member of the National Planning Committee. He was largely instrumental in organising the Indian National Trade Union Congress, and later became its president.


In 1947, Nanda went to Geneva, Switzerland as a government delegate to the International Labor Conference. He worked on The Freedom of Association Committee of the Conference, and visited Sweden, France, Switzerland, Belgium, and the UK to study labour and housing conditions in those countries.


In March 1950, Nanda joined the Indian Planning Commission as its vice-chairman. In September 1951, he was appointed Planning Minister in the Indian Government. He was also given charge of the portfolios of Irrigation and Power. He was elected to the Lok Sabha from Bombay in the general elections of 1952, and was reappointed Minister for Planning, Irrigation, and Power. He led the Indian Delegation to the Plan Consultative Committee held in Singapore in 1955, and the International Labor Conference held in Geneva in 1959.


Nanda was elected to the Lok Sabha in the 1957 elections, and was appointed Union Minister for Labour, Employment and Planning, and later, as Deputy Chairman of the Planning Commission. He visited the Federal Republic of Germany, Yugoslavia, and Austria in 1959.


Nanda was re-elected to the Lok Sabha in the 1962 elections from the Sabarkantha constituency in Gujarat. He initiated the Congress Forum for Socialist Action in 1962. He was Union Minister for Labour and Employment during 1962 – 1963, and Minister for Home Affairs during 1963 – 1966. He was first inducted as Home Minister by Jawaharlal Nehru in his cabinet in 1963,and continued on the post under Lal Bahadur Shastri, and under Smt Indira Gandhi till he resigned in 1966,in protest against firing on protesting Hindu saints, with whom he had been deep in negotiations and was almost on the verge of agreement.


Nanda was re-elected to the Lok Sabha in the 1967 and 1971 elections from the Kaithal (Lok Sabha Constituency) in Haryana.He was Union Minister for Railways 1970 – 1971.



Nanda was the Prime Minister of India twice for thirteen days each: the first time after the death of Prime Minister Jawaharlal Nehru in 1964, and the second time after the death of Prime Minister Lal Bahadur Shastri in 1966.[8] Both his terms were uneventful, yet they came at sensitive times because of the potential danger to the country following Nehru's death soon after a war with China in 1962 and Shastri's death after a war with Pakistan in 1965.[9] Nanda died on 15 January 1998 at the age of 99.[10] From 25 November 1997, when former Malawi President Hastings Banda died until his own death, Nanda was the world's oldest living former head of state.


He was a deeply relegious person and a champion of the most emotive issue for most Hindus,like Gandhiji himself and many congress leaders in independent India- 'Cow protection'.


He was a loyal servant of Jawaharlal Nehru, and trustee of his wish to transfer the mantle safely to his daughter Indira. Upon NEHRU'S death, he was considered saintly enough to become caretaker PM and then vacate the post for the next selected incumbent, which was Lal Bahadur Shastri. Shastriji emerged as a very popular leader after 1965 Pakistan war, contrary to his diminutive looks emerged as a very tall leader. He died under suspicious circumstances in Tashkent and many believe he was eliminated by the KGB, for bringing the Pro-Soviet Indira, as desired by Nehru.


Guljarilal Nanda came in handy again as Nehru loyalists choice for a selfless caretaker Prime minister, again for 13 days as his earlier stint. He dutifully handed over the reigns of power to Indira Gandhi, and continued as Home Minister.


When the "ban-cow-slaughter" movement started in to gather steam, Nandaji was deeply involved with the saints spearheading and supporting the movement. He was trusted by the Sanatanis, Arya Samajis, the Akalis, the Shankaracharya of Puri, the Gorakshanath peethadheeshwar, among others. Both sides understood each other,and there was general understanding that the protests would end amicably in grand celebrations, as the parliament would adopt the resolution, that would be presented by Gulzari Lal Nanda.


He would become the darling of the Hindu masses,once cow slaughter was banned and thus repay the debt of his lifelong Gandhian convictions and faith.


He details in his book about his meetings with representatives of the protesters, that there would be no violence, and that the government too would not harm them.


With such an understanding, the crowd consisted of thousands of women, children and toddlers in laps, who were almost coming for a religious congregation, on the holy day of Gopashtami, the festival of Cow Worship.


The ugly turn of events on the 7th of November 1966,where as Nandaji recounts in his book, led to antisocial elements setting houses of K Kamraj among others on fire. Some shops too were set on fire. The Police opened fire on a crowd of lakhs even before he could go out and talk and pacify the crowds. He was aghast to see that they were not the sounds of tear gas shells bursting but real bullets, and bodies of his revered saints were falling all around. He could very well see that things were happening without his command but posterity would find none other to blame than him. He resigned at this massive betrayal of faith of lakhs of Hindus, whose champion he had tried to become in all earnest. Most believe that this was done to fix him, to forever end any threat to Mrs Indira Gandhi.