मदन मोहन (मृत्यु-14 जुलाई, 1975)

July 14, 2017

मदन मोहन (जन्म-25 जून, 1924, बगदाद, इराक; मृत्यु-14 जुलाई, 1975, मुम्बई, महाराष्ट्र) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध 1950, 1960, और 1970 के दशक के बॉलीवुड फ़िल्म संगीत निर्देशक थे। इनका पूरा नाम मदन मोहन कोहली था। उन्हें विशेष रूप से फ़िल्म उद्योग में गज़लों के लिए याद किया जाता है।


मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 बगदाद, इराक में हुआ था। जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल इराकी पुलिस के साथ एक एकाउंटेंट जनरल के रूप में काम कर रहे थे, मध्य पूर्व में जन्मे मदन मोहन ने अपने जीवन के पहले पाँच साल यहाँ बिताए। उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल फ़िल्म व्यवसाय से जुड़े थे और बाम्बे टाकीज और फ़िल्मीस्तान जैसे बड़े फ़िल्म स्टूडियो में साझीदार थे। घर में फ़िल्मी माहौल होने के कारण मदन मोहन भी फ़िल्मों में काम कर बड़ा नाम करना चाहते थे लेकिन अपने पिता के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का फैसला ले लिया और देहरादून में नौकरी शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली में हो गया। लेकिन कुछ समय के बाद उनका मन सेना की नौकरी में नहीं लगा और वह नौकरी छोड़ लखनऊ आ गये।


लखनऊ में मदन मोहन आकाशवाणी के लिये काम करने लगे। आकाशवाणी में उनकी मुलाकात संगीत जगत से जुडे़ उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ, उस्ताद अली अकबर ख़ाँ, बेगम अख़्तर और तलत महमूद जैसी जानी मानी हस्तियों से हुई। इन हस्तियों से मुलाकात के बाद मदन मोहन काफ़ी प्रभावित हुये और उनका रुझान संगीत की ओर हो गया। अपने सपनों को नया रूप देने के लिये मदन मोहन लखनऊ से मुंबई आ गये। मुंबई आने के बाद मदन मोहन की मुलाकात एस. डी. बर्मन, श्याम सुंदर और सी. रामचंद्र जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों से हुई और वह उनके सहायक के तौर पर काम करने लगे। बतौर संगीतकार वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म आँखें के ज़रिये मदन मोहन फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हुए। फ़िल्म आँखें के बाद लता मंगेशकर मदन मोहन की चहेती पा‌र्श्वगायिका बन गयी और वह अपनी हर फ़िल्म के लिये लता मंगेश्कर से हीं गाने की गुज़ारिश किया करते थे। लता मंगेश्कर भी मदन मोहन के संगीत निर्देशन से काफ़ी प्रभावित थीं और उन्हें गज़लों का शहजादा कहकर संबोधित किया करती थी।


मदन मोहन के पसंदीदा गीतकार के तौर पर राजा मेंहदी अली खान, राजेन्द्र कृष्ण और कैफी आजमी का नाम सबसे पहले आता है। स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने गीतकार राजेन्द्र किशन के लिये मदन मोहन की धुनों पर कई गीत गाये। जिनमें 'यूं हसरतों के दाग़'..अदालत (1958), 'हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ'.. जेलर (1958), 'सपने में सजन से दो बातें एक याद रहीं एक भूल गयी'..गेटवे ऑफ इंडिया (1957), 'मैं तो तुम संग नैन मिला के'..मनमौजी, 'ना तुम बेवफा हो'.. एक कली मुस्काई, 'वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गयी'..संजोग (1961) जैसे सुपरहिट गीत इन तीनों फनकारों की जोड़ी की बेहतरीन मिसाल है।


पचास के दशक में मदन मोहन के संगीत निर्देशन में राजेन्द्र कृष्ण के रचित रूमानी गीत काफ़ी लोकप्रिय हुये। उनके रचित कुछ रूमानी गीतों में 'कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये'.. देख कबीरा रोया (1957), 'मेरा करार लेजा मुझे बेकरार कर जा'.. (आशियाना)1952, 'ए दिल मुझे बता दे'..भाई-भाई 1956 जैसे गीत शामिल हैं। मदन मोहन के संगीत निर्देशन में राजा मेंहदी अली खान रचित गीतों में 'आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे'..अनपढ़ (1962), 'लग जा गले'..(वो कौन थी) 1964, 'नैनो में बदरा छाये'.., 'मेरा साया साथ होगा'.. मेरा साया (1966) जैसे गीत श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है। मदन मोहन ने अपने संगीत निर्देशन से कैफी आजमी रचित जिन गीतों को अमर बना दिया उनमें 'कर चले हम फिदा जानो तन साथियों अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों'... हकीकत (1965), 'मेरी आवाज़ सुनो..प्यार का राज सुनो'..नौनिहाल (1967), 'ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नही'.. हीर रांझा (1970), 'सिमटी सी शर्मायी सी तुम किस दुनिया से आई हो'...परवाना (1972), 'तुम जो मिल गये हो ऐसा लगता है कि जहां मिल गया'.. हंसते जख्म (1973) जैसे गीत शामिल है।


महान संगीतकार ओ.पी. नैयर जिनके निर्देशन में लता मंगेश्कर ने कई सुपरहिट गाने गाये अक्सर कहा करते थे। ..मैं नहीं समझता कि लता मंगेश्कर, मदन मोहन के लिये बनी हुयी है या मदन मोहन लता मंगेशकर के लिये लेकिन अब तक न तो मदन मोहन जैसा संगीतकार हुआ और न लता जैसी पा‌र्श्वगायिका.. मदन मोहन के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले ने फ़िल्म 'मेरा साया' के लिये 'झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में'.. गाना गाया जिसे सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते हैं। मदन मोहन से आशा भोंसले को अक्सर यह शिकायत रहती थी कि- आप अपनी हर फ़िल्मों के लिये लता दीदी को हीं क्यो लिया करते है, इस पर मदन मोहन कहा करते थे जब तक लता ज़िंदा है मेरी फ़िल्मों के गाने वही गायेगी।


वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म हकीकत में मोहम्मद रफी की आवाज़ में मदन मोहन के संगीत से सज़ा यह गीत 'कर चले हम फिदा जानों तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों'...आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बे को बुलंद कर देता है। आंखों को नम कर देने वाला ऐसा संगीत मदन मोहन ही दे सकते थे।


वर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म दस्तक के लिये मदन मोहन सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किये गये। मदन मोहन ने अपने ढ़ाई दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 100 फ़िल्मों के लिये संगीत दिया।


अपनी मधुर संगीत लहरियों से श्रोताओं के दिल में ख़ास जगह बना लेने वाले मदन मोहन 14 जुलाई 1975 को इस दुनिया से जुदा हो गए। उनकी मौत के बाद वर्ष 1975 में ही मदन मोहन की 'मौसम' और 'लैला मजनूं' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुयी जिनके संगीत का जादू आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता है।


Madan Mohan Kohli (25 June 1924 – 14 July 1975), better known as Madan Mohan, was a popular and unparalleled Indian music director of the 1950s, 1960s, and 1970s. He is considered one of the most melodious and skilled music directors of the Hindi film industry. He is particularly remembered for the immortal ghazals he composed for Hindi films. Some of his best works are with Mohammed Rafi, Talat Mahmood, Lata Mangeshkar and Asha Bhosle.


Born on 25 June 1924, at Erbil, Iraqi Kurdistan, where his father Rai Bahadur Chunilal was working as an Accountant General with the Kurdistan Peshmerga forces, Madan Mohan spent the early years of his life in the Middle East. After 1932, his family returned to their home town of Chakwal, then in Jhelum district of Punjab, British India. He was left in the care of a grandparent while his father went to Bombay to seek business opportunities. He attended local school in Lahore for the next few years. During his stay at Lahore, he learnt the basics of classical music from one Kartar Singh for a very short period, however he never received any formal training in music. Some time later, his family moved to Bombay where he completed his Senior Cambridge from St. Mary's School in Byculla Mumbai. In Bombay, at the age of 11 years, he started performing in children's programmes broadcast by All India Radio. At age 17, he attended the Colonel Brown Cambridge School in Dehradun where he completed a year's training.


He joined the Army as a Second Lieutenant in the year 1943. He served there for two years until end of World War II, when he left the Army and returned to Bombay to pursue his musical interests. In 1946, he joined the All India Radio, Lucknow as Programme Assistant, where he came in contact with various artists such as Ustad Faiyaz Khan, Ustad Ali Akbar Khan, Begum Akhtar, and Talat Mahmood. During these days he would also compose music for programmes to be broadcast on All India Radio. In 1947, he was transferred to All India Radio, Delhi where he worked for a short period. He was very fond of singing, and so in 1947 he got his first chance to record two ghazals penned by Behzad Lucknawi, Aane Laga Hai Koi Nazar Jalwa Gar Mujhe and Is Raaz Ko Duniya Jaanti Hai. Soon after, in 1948 he recorded two more private ghazals penned by Deewan Sharar, Wo Aaye To Mahfil Mein Ithlaate Huye Aaye and Duniya Mujhe Kahti Hai Ke Main Tujhko Bhoolaa Doon. In 1948, he got his first opportunity to sing a film duet Pinjare Mein Bulbul Bole and Mera Chhotasa Dil Dole with Lata Mangeshkar under composer Ghulam Haider (composer) for the film Shaheed (1948 film), though these songs were never released or used in the film. Between 1948 and 1949, he assisted music composers S.D. Burman for Do Bhai, and Shyam Sundar in Actress and Nirdosh.


He scored his first big break with the film Aankhen (1950 film) in 1950, which marked the beginning of a long lasting collaboration with Mohammed Rafi, his next film was "Adaa" which saw the beginning of a long lasting collaboration with Lata Mangeshkar; both would go on to sing for many of his films. Two of his composed songs from "Sharabi" "Sawan ke maheeney mein" and the classic song "Kabhi na Kabhi koi na koi toh aayega", both filmed for Dev Anand are among the most well known renditions of the renowned singer Mohammad Rafi. In addition, his other compositions like Wo Chup Rahen To from the film Jahan Ara (1964) and Maine Rang Li Aaj Chunariya from Dulhan Ek Raat Ki (1966) are two similar examples. Madan was also able to write songs for male singers such as Talat Mahmood (Phir wahi Sham, wahi dil, wahi tanhayee hai, Main Teri Nazar Ka Suroor Hoon and Teri Aankh Ke Aansoo from Jahan Ara, and Meri Yaad Mein Tum Na from Madhosh) and Mohammad Rafi (Ek Haseen Shaam Ko from Dulhan Ek Raat Ki, Kisi Ki Yaad Mein from Jahan Ara, Main Nigahen Tere Chehere Se from Aap Ki Parchaiyian, Aap Ke Pehlun Mein Aakar Ro Diye from Mera Saaya, the all-time haunting Meri Awaaz Suno and Tumhare Zulf Ke Sayen from Naunihal, Teri Aankhon Ke Siva Duniya Mein from Chiraag as well. Madan did not usually employ Kishore Kumar. Nonetheless their partnership created songs as well; in this category fall songs such as Simti Si, Sharmai Si from Parwana, Zaroorat Hai, Zaroorat Hai from Manmauji, the title song from Ek Muthi Aasman, Mera Naam Abdul Rehman from Bhai Bhai, and Aai Hasino, Naazanino from Chacha Zindabad. Madan often collaborated with lyricists Raja Mehdi Ali Khan, Kaifi Azmi, and Rajinder Krishan, Sahir Ludhianvi and Majrooh Sultanpuri for his movies.


In 1957 he came out with a film named Dekh Kabira Roya in which the legendary singer Manna Dey gave his voice to the melodious Kaun Aaya Mere Man Ke Dwaare and unforgettable numbers like Tum Bin Jeevan Kaisa Jeevan in the film Bawarchi. In addition to that, he had Lata sing Tu Pyaar Kare Ya Thukraaye and Meri Veena Tum Bin Roye numbers, and he used Talat Mahmood for the song Hum Se Aaya Na Gaya in the same movie. Once in an interview Manna Dey recalled that Madan Mohan asked him to take special care when singing Kaun Aaya Mere Man Ke Dwaare.


A film scored by Madan was Chetan Anand's Haqeeqat (1964), starring Balraj Sahni and Dharmendra and based on the Sino-Indian War of 1962. In it, he used Rafi, who sang numbers like Kar Chale Hum Fida, Main Yeh Soch Kar. Lata was used for the song Zara Si Aahat Hoti Hai and the unscreened " Khelo na mere dilse". And the same film saw Rafi, Talat, Manna Dey, and Bhupendra singing Hoke Majboor Mujhe Usne Bhulaya Hoga. Bhupendra appeared on the screen as well for the first time, much before he established himself as a playback singer. This song is also the only song in which four top-rated male playback singers have put voices together in a song. In 1966, he again paired with Lata Mangeshkar for Mera Saaya.


Madan Mohan's venture was Raj Khosla's version of "Woman in White", titled "Woh Kaun Thi?". This film has three Lata solos ('Naina barse rim jhim rim jhim', 'Lag ja gale' and 'Jo humne daastaan apni sunayee') and a Lata duet.


The late fifties, sixties and the early seventies were the most productive period in Madan Mohan's career. His songs from those decades include compositions for films like Adalat, Anpadh, Dulhan ek raat ki, Mera Saya, Dastak, Hanste Zakhm, Heer Raanjha, Maharaja, and Mausam, among many others. His second last bow was for a film released five years after his death, Chalbaaz. In 1970, during the changing times of western music he gave music based on ragas for Rajinder Singh Bedi's Dastak and won his only 1971 National Film Award for Best Music Direction. Its songs sung by Lata Mangeshkar are still considered her finest.


His legacy wouldn't be complete without mentioning the ghazal he composed for the movie "Dil Ki Rahein" - "Rasm-e-ulfat ko nibhaein to nibhaein kaise". The shayar(lyricist) for the ghazal was Naqsh Lallayalpuri and it was sung by Lata Mangeshkar. It is considered as one of the best songs sung by Lata Mangeshkar, ever.


Madan Mohan's son Sanjeev Kohli recreated 11 of his late father's unused compositions for the soundtrack of the 2004 Yash Chopra film Veer-Zaara. Later on, Kohli brought out an album "Tere Baghair" which contains some of Madan Mohan's songs.


Lata Mangeshkar christened him "Ghazal ka Shehzadaa", or the Prince of Ghazals. Even Lata herself stated in a live concert in the late 1990s that she found Madan Mohan's compositions difficult to master. Most of the top film actors of the day (who were also studio heads) had fallen into a groove with their preferred composers (e.g., Raj Kapoor had Shankar Jaikishan, Dev Anand had the Burmans, Dilip Kumar had Naushad, etc.) Hence, he often had difficulty finding assignments. His 1964 Filmfare Award nomination for Best Music Director for Woh Kaun Thi. In a tightly-contested race, both Madan and Shankar Jaikishan (Sangam) lost to relative newcomers Laxmikant Pyarelal, who scored Dosti.


Madan's constant struggles took a toll on his life, and he began drinking heavily. He died of liver cirrhosis on 14 July 1975.His body was lifted before his funeral by actors - Rajesh Khanna, Dharmendra, Amitabh Bachchan and Rajendra Kumar.


In 2004, Madan's unused tunes were recreated by his son, Sanjeev Kohli, for the Yash Chopra film Veer-Zaara, starring Shahrukh Khan, Preity Zinta, and Rani Mukerji. The lyrics were written by Javed Akhtar, and Lata Mangeshkar was invited to once again sing the majority of the melodies composed by him.The music was highly appreciated and was critically acclaimed. He was awarded the IIFA award 2005, for Music Direction for Veer-Zaara.