गुरदयाल सिंह ढिल्‍लों (जन्म: 6 अगस्त, 1915)

August 06, 2017

डॉ. गुरदयाल सिंह ढिल्लों (जन्म: 6 अगस्त, 1915 - मृत्यु: 23 मार्च 1992) भारत के पाँचवें लोकसभा अध्यक्ष थे। ये 'जी. एस. ढिल्लों' नाम से भी प्रसिद्ध हैं। गुरदयाल सिंह ढिल्लों बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जिन्हें क़ानून से लेकर पत्रकारिता तथा शिक्षा और खेलकूद से लेकर संवैधानिक अध्ययन में रुचि थी। सिद्धांतों से समझौता करना उन्हें क़तई पसंद नहीं था। उनके लिए संसद लोकतंत्र का मंदिर था और इसलिए सभा और इसकी परम्पराओं तथा परिपाटियों के प्रति उनके मन में अत्यधिक सम्मान था। उनमें सभा की मनःस्थिति को पल भर में भांपने की अद्भुत क्षमता थी तथा उनका दृष्टिकोण व्यावहारिक हुआ करता था। इन्हीं गुणों के कारण वे अध्यक्ष पद के गुरुतर दायित्व का निर्वहन गौरवशाली तरीके से कर पाए। अंतर-संसदीय संघ की अंतर-संसदीय परिषद के अध्यक्ष के रूप में ढिल्लों का चुनाव न केवल उनके लिए बल्कि भारत की पूरी जनता तथा भारतीय संसद के लिए भी बहुत सम्मान की बात थी।


परिचय-
गुरदयाल सिंह ढिल्लों का जन्म पंजाब के अमृतसर ज़िले के पंजवार में 6 अगस्त, 1915 को हुआ था। वे एक मेधावी छात्र थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा खालसा कालेज, अमृतसर, गवर्नमेंट कालेज, लाहौर और यूनिवर्सिटी लॉ कालेज, लाहौर में हुई। 1937 से 1945 तक की अवधि के दौरान ढिल्लों ने वकालत की और एक सफल वकील के रूप में ख्याति अर्जित की। उनकी वकालत खूब चलती थी। इसके बावजूद वे अपनी देशभक्ति की भावना और अपने देशवासियों के प्रति चिंता को दबा नहीं सके। शीघ्र ही वे स्वतंत्रता संघर्ष तथा किसान आंदोलन में पूरी तरह कूद पड़े जिसके कारण उन्हें ब्रिटिश शासकों का कोपभाजन होना पड़ा। स्वतंत्रता संघर्ष से संबंधित गतिविधियों के लिए उन्हें दो बार जेल भेजा गया। लम्बे समय तक जेल में रहने के कारण उन्होंने वकालत छोड़ दी।


आजादी के बाद उन्होंने पत्रकारिता का पेशा अपनाया और स्वयं को एक निडर और प्रभावशाली लेखक के रूप में स्थापित किया। उनके लेखों में वैचारिक दृढ़ता होती थी जिसने पाठकों को प्रभावित किया। सांप्रदायिक ताकतों के गंदे कारनामों के बावजूद सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के उनके प्रयास अनुकरणीय थे। महत्त्वपूर्ण मामलों पर सहमति बनाने और विघटनकारी ताकतों के नापाक इरादों के बारे में लोगों को शिक्षित करने के उद्देश्य से उन्होंने 1947 में एक पंजाबी दैनिक "वर्तमान" का प्रकाशन भी शुरू किया और उसका सम्पादन किया। बाद में वे उर्दू दैनिक "शेर-ए-भारत" के मुख्य सम्पादक और नेशनल सिख न्यूजपेपर्स लि. के प्रबंध निदेशक भी बने। वे वर्ष 1952 तक पंजाब पत्रकार संघ की कार्यकारी समिति के सदस्य और 1953 तक राज्य प्रेस सलाहकार समितियों सदस्य भी रहे।


राजनीतिक जीवन
ढिल्लों विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल रहते थे। वे 1946 से 1954 तक शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एस.जी.पी.सी.) और अमृतसर ज़िला बोर्ड के सदस्य रहे और 1948-52 के दौरान तरनतारन बाज़ार समिति के चेयरमैन रहे। कांग्रेस पार्टी के एक समर्पित कार्यकर्त्ता होने के नाते वे 1950-51 के दौरान पंजाब कांग्रेस अनुशासन समिति के चेयरमैन और 1953 तक अमृतसर ज़िला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहे। कुछ वर्षों के लिए वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी रहे।


ढिल्लों का 1952 से 1967 तक पंजाब विधान सभा के सदस्य के रूप में एक सुदीर्घ और शानदार कार्यकाल रहा। इस अवधि के दौरान उन्होंने अनेक विधायी उत्तरदायित्वों को विशिष्टता के साथ निभाया। इस दौरान वे पंजाब विधान सभा की लोक लेखा समिति और विशेषाधिकार समिति के सभापति रहे। वे राज्य में गैर कृषक भूमि कराधान समिति के सभापति भी रहे। ढिल्लों 1952 में पंजाब विधान सभा उपाध्यक्ष चुने गए और इस पद पर वे 1954 तक रहे। इसके पश्चात् वे 1954 से 1962 तक विधान सभा के अध्यक्ष के पद पर लम्बे समय तक रहे। अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सभा की कार्यवाही इस तरीके से चलाई कि उन्हें सभा के सभी वर्गों का सम्मान प्राप्त हुआ। ढिल्लों वर्ष 1964 से 1966 तक पंजाब कांग्रेस विधान मंडल पार्टी के महासचिव और मुख्य सचेतक रहे। वर्ष 1965-66 के दौरान उन्होंने परिवहन, ग्रामीण विद्युतीकरण, संसदीय कार्य और निर्वाचन मंत्री के रूप में और पंजाब में 1965 के युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के पुनर्वास मंत्री के रूप में भी कार्य किया। पूर्णतः राष्ट्रवादी ढिल्लों ने 1965 के युद्ध के दौरान सीमा क्षेत्रों का निडर होकर दौरा किया और लोगों को सीमापार के खतरों से एकजुट होकर सामना करने को प्रेरित किया। उनके साहस और संगठन क्षमता की सभी ने प्रशंसा की।


ढिल्लों 1967 में चौथी लोकसभा के लिए पंजाब के तरनतारन संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुने गए। उसके बाद वे बैंककारी विधि (संशोधन) विधेयक, 1967 संबंधी प्रवर समिति के सभापति नियुक्त किए गए। बाद में वे दो अवधियों 1968-69 और 1969-70 के लिए सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति के सभापति नियुक्त किए गए। वे सभापतियों की सूची के सदस्य भी रहे। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए लोकसभा के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिए जाने पर ढिल्लों को 8 अगस्त, 1969 को सर्वसम्मति से लोक सभा का अध्यक्ष चुना गया। जब ढिल्लों इस पद के लिए निर्वाचित हुए तो वे उस समय तक लोकसभा के जितने अध्यक्ष हुए थे उनमें से सबसे कम उम्र के अध्यक्ष थे। जिस ढंग से उन्होंने कार्यवाही का संचालन किया उससे सभा में सभी राजनीतिक दलों के सदस्य प्रभावित हुए। 1971 में ढिल्लों लोक सभा के लिए तरनतारन से पुनः चुने गए। इस बार भी ढिल्लों को 22 मार्च, 1971 को लोक सभा का अध्यक्ष चुना गया। उनका पुनः चुना जाना उनकी प्रसिद्धि तथा योग्यता का प्रमाण था।


ढिल्लों का यह दृढ़ मत था कि कार्यपालिका को विधायिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उन्हें इस बात का पूरा अहसास था कि क़ानून बनाने की शक्ति विधायिका के क्षेत्राधिकार में ही होनी चाहिए इसलिए ढिल्लों ने अपने पूर्ववर्ती अध्यक्षों के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अध्यादेश केवल तभी जारी किए जाएं जब वास्तव में आपात स्थिति हो अथवा ऐसी तात्कालिक परिस्थिति हो जो ऐसी कार्यवाही को उचित ठहरा सके। एक अन्य अवसर पर मार्च, 1970 में जब संसद का सत्र चल रहा था तो सरकार ने सभा को सूचित किए बिना ही कुछ वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि कर दी थी। उस घोषणा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ढिल्लों ने टिप्पणी की थी कि जब संसद का सत्र चल रहा है तो सभा को सूचित किए बिना ऐसे निर्णयों की घोषणा करना अनुचित है।


ढिल्लों ने 1 दिसम्बर, 1975 को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और उन्होंने उसी दिन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में नौवहन और परिवहन मंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। वे 1977 तक इस पद पर रहे। 1980 में वे 'योजना आयोग' के सदस्य बने। उन्होंने 1980-82 के दौरान कनाडा में भारतीय उच्चायुक्त की हैसियत से कार्य किया। उच्चायुक्त की हैसियत से कार्य करते हुए वह एक अनुभवी राजनयिक साबित हुए और उन्होंने भारत-कनाडा संबंधों को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।


ढिल्लों सितम्बर, 1985 में आठवीं लोक सभा के लिए इस बार फिरोजपुर निर्वाचन क्षेत्र से सदस्य निर्वाचित हुए। उन्हें शीघ्र ही कृषि मंत्री के रूप में केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया और वे 12 मई, 1986 से 14 फरवरी, 1988 तक इस पद पर रहे। केन्द्रीय मंत्री के रूप में ढिल्लों ने अपने दायित्वों का निर्वहन उत्कृष्टता से किया।


सामाजिक सक्रियता
ढिल्लों ने अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाओं और विद्वत निकायों को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभाई। वे सन् 1956 से पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, 1971-78 तथा पुनः 1985-86 के दौरान गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर तथा 1968-69 के दौरान पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के सिंडिकेट तथा सिनेट के निर्वाचित सदस्य रहे। उन्हें 1974-81 तथा 1984-86 के दौरान पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के विधि संकाय के "डीन" का पद धारण करने का गौरव भी प्राप्त हुआ था। इसके अतिरिक्त ढिल्लों कुछ वर्षों तक यादवेन्द्र पब्लिक स्कूल, पटियाला और पब्लिक स्कूल, नाभा के शासी निकाय के सदस्य रहे। वे अन्य अनेक शैक्षणिक संस्थाओं के कार्यकरण से भी जुड़े रहे। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी ढिल्लों अनेक सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे। वे जालियांवाला बाग स्मारक न्यास, अमृतसर के सदस्य थे। प्रकाण्ड विद्वान के रूप में उन्होंने चैत्रिक अभिनन्दन ग्रंथ के सह-सम्पादक के रूप में कार्य किया उन्होंने सामयिक चिन्तन के विषयों पर अनेक पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया और लेख लिखे। वे एक प्रगतिशील किसान, एक खिलाड़ी तथा नागर विमानन और ग्लाइडिंग क्लब के संरक्षक थे। एक अनुभवी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनके द्वारा की गई राष्ट्र सेवा का आदर करते हुए उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया।


सम्मान और पुरस्कार
ढिल्लों को पंजाब विश्वविद्यालय ने 1969 में, पंजाबी विश्वविद्यालय ने 1971 में तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने 1973 में एल.एल.डी. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। गुरुनानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर ने 1971 में उन्हें डी. लिट की उपाधि प्रदान की। हम्वोल्ट विश्वविद्यालय, जर्मनी द्वारा 1973 में उन्हें 'डॉक्टर ऑफ पोलिटीकल साइंस' की उपाधि प्रदान की गयी तथा 1973 में सुंग क्यूंक्वां विश्वविद्यालय (कोरिया गणराज्य) द्वारा पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की गई। ढिल्लों द्वारा अन्तर-संसदीय संघ के आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए किए गए उत्कृष्ट योगदान का सम्मान करते हुए अन्तर-संसदीय संघ ने उन्हें 1993 में नई दिल्ली में हुए 89 वें अन्तर-संसदीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह के अवसर पर मरणोपरांत अंतर-संसदीय संघ पुरस्कार से सम्मानित किया।
डॉ. गुरदयाल ढिल्लों का देहावसान 23 मार्च, 1992 को नई दिल्ली में हुआ।


Dr. Gurdial Singh Dhillon (6 August 1915 – 23 March 1992) was a Punjabi politician in the Indian National Congress party. He was President of the Inter-Parliamentary Union (1973–76)[3] and Indian High Commissioner to Canada (1980–82).


On 6 August 1915, Gurdial Singh Dhillon was born in the Panjwar area, some 20 kilometres west of Amritsar city in Punjab into a Dhillon Jat family. He studied at Khalsa College, Amritsar and Government College, Lahore before graduating in Law from Punjab University Law College in Lahore. He played an active role in the Harse Chhina Mogha Morcha rebellion in 1947.


Dhillon was a member of the Punjab Legislative Assembly (1952–1967), where he was its Deputy Speaker (1952–54) and its Speaker (1954–62). In 1967 he was first elected to the Lok Sabha, the lower House of the Indian Parliament representing Tarn Taran parliamentary constituency.He was elected from Firozpur in 1985.


Dhillon served two terms as Speaker of Lok Sabha (1969–71 and 1971–75) and was Minister of Agriculture in the Indian Government (1986–1988).[8] Regarding his time in Parliament, his biography on the Lok Sabha website expresses the following:
A man of uncompromising principles, he considered the institution of Parliament to be the temple of democracy and as such had great respect for the House and its traditions and conventions. The rare ability to quickly assess the mood of the House and a pragmatic approach helped him discharge the onerous responsibility of the office of the Speaker of the Lok Sabha in a dignified way. Dhillon's election as the President of the Inter-Parliamentary Council of the IPU was at once a great honour for himself and also for the people and the Parliament of India.


With Kartar Singh, he co-authored a series of eight children's books in the early 1970s entitled 'Stories from Sikh History'


Having undergone heart bypass surgery, Dr. Dhillon died at the All India Institute of Medical Sciences, New Delhi on 23 March 1992 following a heart attack.