सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (मृत्यु- 6 अगस्त, 1925)

August 06, 2017

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (जन्म- 10 नवम्बर, 1848 कलकत्ता; मृत्यु- 6 अगस्त, 1925 बैरकपुर) प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी थे, जो कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए। उन्हें 1905 का 'बंगाल का निर्माता' भी जाता है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय समिति की स्थापना की, जो प्रारंभिक दौर के भारतीय राजनीतिक संगठनों में से एक था और बाद में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बन गए।


 परिचय-
जन्म और परिवार: सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का जन्म 10 नवम्बर 1848 को बंगाल के कोलकाता शहर में, एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के पिता का नाम डॉ. दुर्गा चरण बैनर्जी था और वह अपने पिता की गहरी उदार और प्रगतिशील सोच से बहुत प्रभावित थे। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने पैरेन्टल ऐकेडेमिक इंस्टीट्यूशन और हिन्दू कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद, उन्होंने रोमेश चन्द्र दत्त और बिहारी लाल गुप्ता के साथ भारतीय सिविल सर्विस परीक्षाओं को पूरा करने के लिए 1868 में इंग्लैंड की यात्रा की। 1868 ई. में वे स्नातक बने, वे उदारवादी विचारधारा के महत्त्वपूर्ण नेता थे। 1868 में उन्होंने इण्डियन सिविल सर्विसेज परीक्षा उतीर्ण की। इसके पूर्व 1867 ई. में सत्येन्द्रनाथ टैगोर आई.सी.एस. बनने वाले पहले भारतीय बन चुके थे। 1877 में सिलहट के सहायक दण्डाधिकारी के पद पर उनकी नियुक्त हुई परन्तु शीघ्र ही सरकार ने उन्हे इस पद से बर्खास्त कर दिया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने स्नातक होने के बाद इण्डियन सिविल सर्विस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) में प्रवेश के लिए इंग्लैण्ड में आवेदन किया। उस समय इस सेवा में सिर्फ़ एक हिन्दू था। बनर्जी को इस आधार पर शामिल नहीं किया गया कि उन्होंने अपनी आयु ग़लत बताई थी। जातीय आधार पर भेद-भाव किये जाने का आरोप लगाते हुए बनर्जी ने अपनी अपील में यह तर्क प्रस्तुत किया कि हिन्दू रीति के अनुसार उन्होंने अपनी आयु गर्भधारण के समय से जोड़ी थी, न कि जन्म के समय से और वह जीत गए। बनर्जी को सिलहट (अब बांग्लादेश) में नियुक्त किया गया, लेकिन क्रियान्वयन सम्बन्धी अनियमितताओं के आरोप में उन्हें 1874 में भारी विवाद तथा विरोध के बीच हटा दिया गया। उन्होंने तब बैरिस्टर के रूप में अपना नाम दर्ज़ कराने का प्रयास किया, किन्तु उसके लिए उन्हें अनुमति देने से इनकार कर दिया गया, क्योंकि वे इण्डियन सिविल सर्विस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) से बर्ख़ास्त किये गये थे। उनके लिए यह एक क़रारी चोट थी और उन्होंने महसूस किया कि एक भारतीय होने के नाते उन्हें यह सब भुगतना पड़ रहा है। बैरिस्टर बनने में विफल रहने के बाद 1875 ई. में भारत लौटने पर वे प्रोफ़ेसर हो गये; पहले मेट्रोपालिटन इंस्टीट्यूट में (जो कि अब विद्यासागर कॉलेज कहलाता है) और बाद में रिपन कॉलेज (जो कि अब सुरेन्द्रनाथ कॉलेज कहलाता है) में, जिसकी स्थापना उन्होंने की थी। अध्यापक के रूप में उन्होंने अपने छात्रों को देशभक्ति और सार्वजनिक सेवा की भावना से अनुप्राणित किया। मेजिनी के जीवन और भारतीय एकता सदृश विषयों पर उनके भाषणों ने छात्रों में बहुत उत्साह पैदा किया। राजनीति में भी भाग लेते रहे और 1876 में इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना तथा 1883 में कलकत्ता में प्रथम अखिल भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने में प्रमुख योगदान दिया।


अखिल भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन एक राष्ट्रीय संगठन की स्थापना की दिशा में यह पहला प्रयास था। 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इण्डियन नेशनल कांग्रेस) की स्थापना के बाद उन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन (आल इंडिया नेशनल काफ़्रेंस) का उसमें विलय कराने में प्रमुख भाग लिया और उसके बाद से उनकी गिनती कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में होने लगी। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1895 में पूना में हुए ग्यारहवें अधिवेशन और 1902 में अहमदाबाद में हुए अठारहवें अधिवेशन की अध्यक्षता की। उन्होंने देशव्यापी भ्रमण कर बड़ी-बड़ी सभाओं में भाषण करते हुए राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता और देश के प्रशासन में भारतीयों को अधिक जनमत को जाग्रत करने में बहुमूल्य योगदान दिया। उन्होंने 1878 ई. के वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट के विरोध का नेतृत्व किया और इल्बर्ट बिल के समर्थन में प्रमुख भाग लिया। कांग्रेस के सूरत विभाजन के समय बनर्जी नरम दल के सदस्य थे। 1909 ई. के मार्ले-मिण्टों सुधार के लिए उन्होंने अंग्रेज़ी साम्राज्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट की, किन्तु वे बंग-भंग की समाप्ति चाहते थे। 1913 ई. में उन्हें बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल ओर इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल का सदस्य चुना गया। 1919-20 ई. कें गांधी प्रणीत आंदोलन का उन्होंने समर्थन नहीं किया। 1921 ई. में अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी। 1921-23 ई. में बंगाल सरकार में मंत्री रहे।


इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का सम्बन्ध विच्छेद हो गया। उन्होंने कांग्रेस के अन्य पुराने नेताओं के साथ लिबरल फ़ेडरेशन की स्थापना की जो अधिक जन समर्थन प्राप्त नहीं कर सका। फिर भी सुरेन्द्रनाथ बनर्जी नई बंगाल लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य निर्वाचित हो गये। 1921 ई. में कलकत्ता म्युनिसिपल बिल को विधानमंडल से पास कराया, जिससे लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बनाया गया पूर्ववर्ती क़ानून निरस्त हो गया और कलकत्ता कार्पोरेशन पर पूर्ण रूप से लोकप्रिय नियंत्रण स्थापित हो गया। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन जिसकी 1876 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने शुरुआत की थी, इस समय तक बहुत विकसित हो गया था और देश के लिए क़ानून बनाने तथा देश के प्रशासन में अधिक हिस्सा दिये जाने की जिन माँगों के लिए सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने पचास वर्षों से भी अधिक समय तक संघर्ष किया था, उन माँगों की पूर्ति से अब देशवासी संतुष्ट नहीं थे। वे अब स्वाधीनता की माँग कर रहे थे, जो सुरेन्द्रनाथ की क्लपना से परे थी। उनकी मृत्यु जिस समय हुई उस समय उनकी गिनती देश के लोकप्रिय नेताओं में नहीं होती थी, किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि वे आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता के निर्माताओं में से थे, जिसकी स्वाधीन भारत एक देन हैसुरेन्द्रनाथ बनर्जी 1920 ई. में शुरू किये गये असहयोग आंदोलन से सहमत नहीं थे। फलत: स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में उनकी महत्त्वपूर्ण क़ानूनी उपलब्धियों के बावजूद उन्हें पहले की भाँति देशवासियों का समर्थन नहीं मिल सका। वे 1923 के चुनाव में हार गये और तदुपरान्त 6 अगस्त, 1925 में अपनी मृत्यु पर्यन्त सार्वजनिक जीवन से प्राय: अलग रहे।


Sir Surendranath Banerjee (Bengali: সুরেন্দ্রনাথ বন্দ্যোপাধ্যায়) (10 November 1848 – 6 August 1925) was one of the earliest Indian political leaders during the British Raj. He founded the Indian National Association, through which he led two sessions of the Indian National Conference in 1883 and 1885, along with Anandamohan Bose. Banerjee later became a senior leader of the Indian National Congress. Surendranath welcomed Montagu–Chelmsford Reforms, unlike Congress, and with many liberal leaders he left Congress and founded a new organisation named Indian National Liberation Federation in 1919. When the Montagu report of 1918 was made public, there was a divide in the Congress over it. The moderates welcomed it while the extremists opposed it. This led to a schism in the Congress with moderate leaders forming the "National Liberal Federation of India" in 1919. He was also known by the sobriquet Rashtraguru (রাষ্ট্রগুরু). He was editor of "The Bengali" newspaper.