शिवपूजन सहाय (जन्म- 9 अगस्त, 1893)

August 09, 2017

आचार्य शिवपूजन सहाय ( जन्म- 9 अगस्त, 1893, शाहाबाद, बिहार; मृत्यु- 21 जनवरी, 1963, पटना) हिन्दी साहित्य में एक उपन्यासकार, कहानीकार, सम्पादक और पत्रकार के रुप में प्रसिद्ध थे। इनके लिखे हुए प्रारम्भिक लेख 'लक्ष्मी', 'मनोरंजन' तथा 'पाटलीपुत्र' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। शिवपूजन सहाय ने 1934 ई. में 'लहेरियासराय' (दरभंगा) जाकर मासिक पत्र 'बालक' का सम्पादन किया। स्वतंत्रता के बाद शिवपूजन सहाय 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' के संचालक तथा 'बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की ओर से प्रकाशित 'साहित्य' नामक शोध-समीक्षाप्रधान त्रैमासिक पत्र के सम्पादक थे।


परिचय-
शिवपूजन सहाय का जन्म सन 1893 ई. उनवास ग्राम, उपसंभाग बक्सर, शाहाबाद­ ज़िला (बिहार) में हुआ था। 1912 ई. में आरा नगर के एक हाईस्कूल से शिवपूजन सहाय ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उन्होंने सामाजिक जीवन का शुभारम्भ हिन्दी शिक्षक के रूप में किया और साहित्य के क्षेत्र में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से आये। शिवपूजन सहाय के आरम्भिक लेख तथा कहानियाँ 'शिक्षा', 'लक्ष्मी', 'मनोरंजन' तथा 'पाटलीपुत्र' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे।
शिवपूजन सहाय की सेवाएँ हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय हैं। 1921-1922 ई. के आस-पास शिवपूजन सहाय ने आरा से निकलने वाले 'मारवाड़ी सुधार' नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन किया। उन्होंने 1923 ई. में वे कलकत्ता के 'मतवाला मण्डल' के सदस्य हुए और कुछ समय के लिए 'आदर्श', 'उपन्यास तरंग', तथा 'समन्वय' आदि पत्रों में सम्पादन का कार्य किया। शिवपूजन सहाय ने 1925 ई. में कुछ मास के लिए 'माधुरी' के सम्पादकीय विभाग को अपनी सेवाएँ अर्पित कीं। वह 1930 ई. में सुल्तानगंज-भागलपुर से प्रकाशित होने वाली 'गंगा' नामक मासिक पत्रिका के सम्पादक मण्डल के सदस्य भी हुए। एक वर्ष के उपरान्त काशी में रहकर उन्होंने साहित्यिक पाक्षिक 'जागरण' का सम्पादन किया। शिवपूजन सहाय काशी में कई वर्ष तक रहे। 1934 ई. में लहेरियासराय (दरभंगा) जाकर मासिक पत्र 'बालक' का सम्पादन किया। भारत की स्वतंत्रता के बाद शिवपूजन सहाय 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' के संचालक तथा 'बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की ओर से प्रकाशित 'साहित्य' नामक शोध-समीक्षाप्रधान त्रैमासिक पत्र के सम्पादक थे।
शिवपूजन सहाय की लिखी हुई पुस्तकें विभिन्न विषयों से सम्बद्ध हैं तथा उनकी विधाएँ भी भिन्न-भिन्न हैं। 'बिहार का बिहार' बिहार प्रान्त का भौगोलिक एवं ऐतिहासिक वर्णन प्रस्तुत करती है। 'विभूति' में कहानियाँ संकलित हैं। 'देहाती दुनियाँ' (1926 ई.) प्रयोगात्मक चरित्र प्रधान औपन्यासिक कृति है। इसकी पहली पाण्डुलिपि लखनऊ के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में नष्ट हो गयी थी। इसका शिवपूजन सहाय जी को बहुत दु:ख था। उन्होंने दुबारा वही पुस्तक फिर लिखकर प्रकाशित करायी, किन्तु उससे शिवपूजन सहाय को पूरा संतोष नहीं हुआ। शिवपूजन सहाय कहा करते थे कि- "पहले की लिखी हुई चीज़ कुछ और ही थी।" 'ग्राम सुधार' तथा 'अन्नपूर्णा के मन्दिर में' नामक दो पुस्तकें ग्रामोद्धारसम्बन्धी लेखों के संग्रह हैं। इनके अतिरिक्त 'दो पड़ी' एक हास्यरसात्मक कृति है, 'माँ के सपूत' बालोपयोगी तथा 'अर्जुन' और 'भीष्म' नामक दो पुस्तकें महाभारत के दो पात्रों की जीवनी के रूप में लिखी गयी हैं। शिवपूजन सहाय ने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया, जिनमें 'राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद', (पटना) ने इनकी विभिन्न रचनाओं को अब तक चार खण्डों में 'शिवपूजन रचनावली' के नाम से प्रकाशित किया है।
शिवपूजन सहाय का हिन्दी के गद्य साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है। उनकी भाषा बड़ी सहज थी। इन्होंने उर्दू के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से किया है और प्रचलित मुहावरों के सन्तुलित उपयोग द्वारा लोकरुचि का स्पर्श करने की चेष्टा की है। शिवपूजन सहाय ने कहीं-कहीं अलंकार प्रधान अनुप्रास बहुल भाषा का भी व्यवहार किया है और गद्य में पद्य की सी छटा उत्पन्न करने की चेष्टा की है। भाषा के इस पद्यात्मक स्वरूप के बावज़ूद शिवपूजन सहाय के गद्य लेखन में गाम्भीर्य का अभाव नहीं है। शिवपूजन सहाय की शैली ओज-गुण सम्पन्न है और यत्र-तत्र उसमें वक्तृत्व कला की विशेषताएँ उपलब्ध होती हैं।
शिवपूजन सहाय का समस्त जीवन हिन्दी की सेवा की कहानी है। इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग हिन्दी भाषा की उन्नति एवं उसके प्रचार-प्रसार में व्यतीत किया है। 'बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन' तथा 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' नामक हिन्दी की दो प्रसिद्ध संस्थाएँ इनकी कीर्ति कथा के अमूल्य स्मारक के रूप में हैं। इनके संस्मरण में बिहार से स्मृति ग्रन्थ भी प्रकाशित हुआ है।


रचनाएँ
आचार्य शिवपूजन सहाय की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-


'देहाती दुनियाँ' - 1926
'मतवाला माधुरी' - 1924
'गंगा' - 1931
'जागरण' - 1932
'हिमालय' - 1946
'साहित्य' - 1950
'वही दिन वही लोग' - 1965
'मेरा जीवन' - 1985
'स्मृति शेश' - 1994
'हिन्दी भाषा और साहित्य' - 1996
सहायक ग्रन्थ - 'शिवपूजन रचनावली' (चार खण्डों में), बिहार राष्ट्रीय भाषा परिषद्, पटना।
हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा आचार्य शिवपूजन सहाय 1910 से 1960 ई. तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, जैसे- 'आज', 'सन्मार्ग', 'आर्यावर्त', 'हिमालय' आदि में सारगर्भित लेख लिखते रहे। उस दौरान उन्होंने हिन्दी पत्रों और पत्रकारिता की स्थिति पर भी गंभीर टिप्पणियाँ की थीं। अपने लेखों के जरिये वे जहाँ भाषा के प्रति सजग दिखाई देते थे, वहीं पूँजीपतियों के दबाव में संपादकों के अधिकारों पर होते कुठाराघात पर चिंता भी जाहिर करते थे। अपने लेख "हिन्दी के दैनिक पत्र" में आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा था कि- "लोग दैनिक पत्रों का साहित्यिक महत्व नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें राजनीतिक जागरण का साधन मात्र समझते हैं। किंतु हमारे देश के दैनिक पत्रों ने जहाँ देश को उद्बुद्ध करने का अथक प्रयास किया है, वहीं हिन्दी प्रेमी जनता में साहित्यिक चेतना जगाने का श्रेय भी पाया है। आज प्रत्येक श्रेणी की जनता बड़ी लगन और उत्सुकता से दैनिक पत्रों को पढ़ती है। दैनिक पत्रों की दिनोंदिन बढ़ती हुई लोकप्रियता हिन्दी के हित साधन में बहुत सहायक हो रही है। आज हमें हर बात में दैनिक पत्रों की सहायता आवश्यक जान पड़ती है। भाषा और साहित्य की उन्नति में भी दैनिक पत्रों से बहुत सहारा मिल सकता है।


शिवपूजन सहाय का यह भी कहना था कि "भारत की साधारण जनता तक पहुँचने के लिए दैनिक पत्र ही सर्वोतम साधन हैं। देश-देशांतर के समाचारों के साथ भाषा और साहित्य का संदेश भी दैनिक पत्रों द्वारा आसानी से जनता तक पहुँचा सकते हैं और पहुँचाते आये हैं। कुछ दैनिक पत्र तो प्रति सप्ताह अपना एक विशेष संस्करण भी निकालते हैं, जिसमें कितने ही साप्ताहिकों और मासिकों से भी अच्छी साहित्यिक सामग्री रहती है। दैनिक पत्रों द्वारा हम रोज-ब-रोज की राजनीतिक प्रगति का विस्तृत विवरण ही नहीं पाते, बल्कि समाज की वैचारिक स्थितियों का विवरण भी पाते हैं। हालांकि कभी-कभी कुछ साहित्यिक समाचारों को पढ़कर ही संतोष कर लेते हैं। भाषा और साहित्य से संबंध रखने वाली बहुत कुछ ऐसी समस्याएँ हैं, जिनकी ओर जनता का ध्यान आकृष्ट करने की बड़ी आवश्यकता है, किंतु यह काम दैनिक पत्रों ने शायद उन साप्ताहिकों व मासिकों पर छोड़ दिया है, जिनकी पहुँच व पैठ जनता में आज उतनी नहीं है, जितनी दैनिक पत्रों की। दैनिक पत्र आजकल नित्य के अन्न-जल की भांति जनता के जीवन के अंग बनते जा रहे हैं। यद्यपि ये पत्र भाषा-साहित्य संबंधी प्रश्नों को भी जनता के सामने रोज-रोज रखते जाते, तो निश्चित रूप से कितने ही अभाव दूर हो जाते।"


सम्मान
शिवपूजन सहाय को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सन 1960 ई. में 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया था।


एक कहानीकार, सम्पादक और पत्रकार के रुप में विशिष्ट स्थान बनाने वाले इस महान साहित्यकार का निधन 21 जनवरी, 1963 में पटना, बिहार में हुआ।


Acharya Shivpujan Sahay (9 August 1893 – 21 January 1963) was a noted Hindi novelist, editor and prose writer.


Shivpujan Sahay was born in a middle class Kayastha land-owning family in the Unwans village of Bhojpur District on 9 August 1893. His childhood name was 'Bholanath'. His early education was in village 'pathshalas'.


After his early education and a short stint as a Hindi language teacher at Ara (1903–1921), Acharya Shivpujan Sahay went to Kolkata to edit 'Marwari Sudhar' and then joined Matwala as an Editor in 1923. He moved to Lucknow in 1924 to join the editorial department of Dularelal Bhargava's Madhuri where he worked with noted Hindi author Munshi Premchand and edited his Rangbhumi and some of his other stories.


In 1925, he returned to Calcutta and engaged in editing short-lived journals such as Samanway, Mauji, Golmal,Upanyas Tarang. Finally, Sahay moved to Varanasi (Kāśi) in 1926 to work as a freelance editor. For a short period in 1931, he went to Sultanganj near Bhagalpur to edit Ganga. However, he returned to Varanasi in 1932 where he was commissioned to edit Jagaran, a literary fortnightly brought out by Jaishankar Prasad and his circle of friends. Sahay once again found himself working with Premchand. He also went on to become a prominent member of the Nagari Pracharini Sabha and similar literary circles in Varanasi.


In 1935, he moved to Laheria Sarai with his family (Darbhanga) to work as editor of Balak and other publications of Pustak Bhandar owned by Acharya Ramlochan Saran. In 1939, he joined Rajendra College, Chhapra as a Professor of Hindi Language. In 1946, on a year's leave, he moved to Patna to edit Himalaya, a literary monthly which was published by Pustak Bhandar owned by Acharya Ramlochan Saran.


In 1950, Sahay finally came to Patna to work as Secretary of Bihar Rashtra Bhasha Parished, a government academy where he edited and published more than 50 volumes of Hindi reference works. Later he became Director of the Parishad and compiled and edited Hindi Sahitya Aur Bihar a literary history. He retired from Parishad in 1959.


His own works were compiled and published in 4 volumes of Shipujan Rachanavali (1956–59) by the Parishad. Later, after his death, his complete works were edited and published by his son Prof. Mangal Murty as 'Shivapoojan Sahay Sahitya samagra'(2011) in 10 volumes. Shivpujan Sahay is also remembered for his editing of several literary commemoration volumes, chiefly Dwivedi Abhinandan Granth (1933),Anugrah Abhinandan Granth (1946), Rajendra Abhinandan Granth (1950) and Jayanti Smarak Granth (1942). He also edited Dr. Rajendra Prasad's Atmakatha. He was awarded Padma Bhushan in 1960.


Works by Acharya Shivpujan Sahay
Stories and novels
Wey Din Wey Log – 1965
Bimb:Pratibimb' – 1967
Mera Jeevan – 1985
Smritishesh – 1994
Hindi Bhasha Aur Sahitya – 1996
Gram Sudhar – 2007
Dehati Duniya – 1926
Vibhuti – 1935
Mera Bachapan' – 1960
'Amar Senani Veer Kunwar Singh'- 1962
Mata ka anchal



Editorial works
Dwivedi Abhinandan Granth – 1933
Rajendra Abhinandan Granth – 1950
Anugrah Abhinandan Granth – 1946
Jayanti Smarak Granth – 1942
Bihar ki Mahilayen' (Rajendra Abhinandan Granth) – 1962
Atmakatha – 1947
Rangbhumi – 1925
Samanway – 1925
Mauji – 1925
Golmaal- 1925
Jagaran – 1932
Balak – 1930
Himalaya- 1946
Hindi Sahitya Aur Bihar- 1962
Madhuri- 1924
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He died in Patna on 21 January 1963. His posthumously published books are Wey Din Wey Log (1965), Mera Jeevan (1985), Smritishesh (1994), Hindi Bhasha Aur Sahitya (1996), and Gram Sudhar (2007) and 'Shivapoojan Sahay Sahitya Samagra' (10 Vols.)