विनायक कृष्ण गोकाक( जन्म: 9 अगस्त, 1909)

August 09, 2017

विनायक कृष्ण गोकाक ( जन्म: 9 अगस्त, 1909 - मृत्यु: 28 अप्रैल, 1992) को 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित कन्नड़ भाषा के प्रमुख साहित्यकारों में गिना जाता है। डॉ. वियानक कृष्ण गोकाक का 'कन्नड़ साहित्य' में नि.संदेह एक विशिष्ट स्थान है। कवि, उपन्यासकार, समालोचक, नाटककार और निबंध लेखक के रूप में आधी से भी अधिक शताब्दी का उनका सक्रिय कार्यकाल 1934 में आरम्भ हुआ, जब उनका प्रथम कविता संकलन 'कलोपासक' प्रकाशित हुआ था।
गोकाक ने कन्नड़ कविता को स्वतंत्रता का उपहार दिया, जिससे नए क्षितिज खुले और नई संभावनाओं का जन्म हुआ। प्राच्य और पाश्चात्य, अतीत और वर्तमान, वर्तमान और भविष्य, मानवतावाद और अध्यात्म तथा राष्ट्रीय और वैश्विक के मध्य सामंजस्य की स्थापना में जीवन भर क्रियाशील गोकाक समन्वय के सिद्धांत पर आरूढ़ थे। अपने गुरु श्री अरबिंद की भांति उनकी आस्था थी कि आत्मिक विकास करते-करते मनुण्य विश्व-मानव के रूप मे सिद्ध हो सकता है।


चौथे दशक के आरंभ मे काव्य की ओर उन्मुख युवक गोकाक दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे के प्रभाव में आए और उनके नेतृत्व में काव्य के एक नए युग का सूत्रपात करने में संलग्न कवि मंडली के एक सदस्य के रूप मे गोकाक ने स्वप्नों और आदर्शों, आध्यात्यिक अभिलाषाओं और काव्यगत प्रेरणाओं की स्वच्छंदवादी कविता का सृजन किया, 'कलोपासक' (1934) में नई पंरपराओं के गीत संकलित हैं। 'समुद्र गीतेगळु' (1940) की कविताएँ एक नई ताज़गी देती हैं और उनमें गोकाक की वह वाणी मुखर हुई है, जिसमें सहज अभिव्यंजना और फक्कड़पन के साथ गीतात्मकता है। स्वातंत्र्योत्तर भारत की नई प्रवृतियों की पूर्ति उन्होंने एक अभिनव काव्य-शैली के सूत्रपात द्वारा की, इस कविता को उन्होंने इलियट,पाउंड और फ़्राँसीसी प्रतीकवादियों के अनुसरण में 'नव्य' कविता कहा। नए विषयों, नई कल्पनाओं, नई कल्पनाओं, नई लयों, नई वक्रोक्तियों और व्यंग्यों के प्रयोगों से भरपूर 'नव्य कवितेगळु' (1950) ने कन्नड़ कविता में एक 'नव्य युग' का सूत्रपात किया।
विनायक कृष्ण गोकाक के नाटकों में 'जननायक' (1939) और 'युगांतर' (1947) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्हें कन्नड़ भाषा में आधुनिक समालोचना का जनक कहा जाता है। उनकी आरंभिक आलोचनात्मक रचनाओं पर पश्चिम की गहरी छाप है, किंतु उन्होंने शीघ्र ही कॉलरिज, अरबिंद और भारतीय काव्यशास्त्र को मिला कर अपना-अपना अलग सिद्धांत ढाल लिया, जिसे वह साहित्य का समन्वयकारी रूप कहते थे।


महाकाव्य
गोकाक की सर्वोत्कृष्ट रचना उनका महाकाव्य 'भारत सिधुं रशिम' है, जो उनकी 1972 से 1978 तक की निरंतर साहित्य साधना का प्रतिफल है। एक ओर इस महाकाव्य में विश्वामित्र का आख्यान है, जो क्षत्रिय राजकुमार होकर भी ऋषि बन गए। दूसरी ओर इसमें आर्य और द्रविड़ समस्याओं के सामरस्य और 'भारतवर्ष' के आविर्भाव की कथा है। इसका दूसरा सूत्रधार राजा सुदास जातियों की समरसता का प्रतीक है, और विश्वामित्र वर्णों की समरसता का। अध्यात्म के उदात्त स्तर पर विश्वामित्र का आख्यान जिस बात का प्रतीक है, उसे अरविंद ने 'ईश्वरत्व की ओर मनुष्य का सफल अभियन' कहा है। त्रिशंकु आज के आदमी का प्रतीक है, जिसने स्मृति, मति और कल्पना पर तो विजय प्राप्त कर ली है, किंतु अभी उसे यह जानना है, कि अंत.प्रज्ञा ही सिद्धि का एकमात्र साधन है। विश्वामित्र के अतिमानवीय प्रयन्नों के बावजूद त्रिशंकु स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर पाता, तो अंत में यह अनुभव करके कि मुक्ति केवल अंत:प्रज्ञा से ही संभव है, वह एक नक्षत्र बन जाता है। इस महाकाव्य में वैदिक संस्कृति और उसके परिवर्तनशील मूल्यों की ऐसी पुन.प्रस्तुति है, कि वे वर्तमान और भविष्य के लिए प्रांसगिंक बन गए है।


Vinayaka Krishna Gokak (9 August 1909 – 28 April 1992) was a major writer in the Kannada language and a scholar of English and Kannada literatures. He was the fifth writer to be honoured with the Jnanpith Award in 1990 for Kannada language, for his epic Bharatha Sindhu Rashmi. Bharatha Sindhu Rashmi deals with the Vedic age and is perhaps the longest epic narrative in any language in the 20th Century. In 1961, Gokak was awarded the Padma Shri from the Government of India for Dyava Prithvi.


Gokak was a prolific writer in both Kannada and English. He was deeply influenced by the Kannada poet D.R Bendre who mentored him during his early forays into Kannada literature. Bendre is reputed to have said that were Gokak to allow his talent to bloom in Kannada, there was a bright future in wait for Gokak and Kannada literature.His Kavyanama is "KRISHNA"


His epic 'Bharatha Sindhurashmi', running into 35000 lines, is notably the longest epic written in this century, for which he received the Jnanpith Award and also honorary doctorates from Karnataka University and Pacific University, USA.


His novel 'Samarasave Jeevana' was translated by his daughter Yashodhara Bhat into English under the title 'The Agony and the Ecstasy' and released to worldwide popularity.


In the 1980s, Karnataka was in the midst of an agitation which demanded the replacement of Sanskrit with Kannada as the medium of instruction in schools. V.K Gokak also headed the 'Gokak Committee' which recommended declaring Kannada as the first language in schools in the state.


Gokak's writing reflected his interest in religion, philosophy, education and cultures. His education abroad prompted him to write two sets of travelogues.


The Navodaya movement was at its peak and Gokak stayed true to his spirit- his poems showed nuances of Victorian poetry, oral traditions in Kannada storytelling and epics in Sanskrit and Kannada.


V.K Gokak wrote many collections of poetry under the pen name Vinayaka. These collections include 'Samudra Geethegalu', 'Baaladeguladalli', 'Abhyudaya', 'Dhyava Prithvi' and 'Urnabha'.


Gokak's anthology of poetry by Indian poets titled The Golden Treasury of Indo Anglican poetry was a treatise on poets like Sri Aurobindo, Sarojini Naidu and Toru Dutta, Nissim Ezekiel and Kamala Das.


In the late 1960s he was deeply influenced by Sri Sathya Sai Baba of Puttaparthi and over the years, Gokak became the medium for translating the guru's words into English and spreading it to the world. His book 'The Advent of Sathya Sai' explains the meaning of Sathya Sai Baba's miracles, his work with the poor and his impact on the educational system.


The state of Karnataka hosts a series of literary events to mark Gokak's birth centenary on 9 August of every year.


Writings
Epics
Bharatha Sindhu Rashmi'. '
Novels
Samarasave Jeevana – Ijjodu Mattu Erilita (vol 1)
Samarasave Jeevana – Samudrayana Mattu Nirvahana (vol 2)
Poetry collections
Urnanabha
Abyudaya
Baaladeguladalli
Dyava Pruthvi (Kannada Saahithya Academy Award)
Samudra Geethegalu
English words


Other
Sahitya Vimarsheya Kelavu Tatvagalu
Nanna Jeevana Drishti
Jeevana Paatagalu
Kala Siddhantha
India & World Culture
Gokak Kruthi Chintana
Pravasa katanagalu
Honors and awards
Presidentship of the 40th Kannada Sahitya Sammelana in 1958
Honorary doctorates from the Karnatak University
Honorary doctorates from the Pacific University of the USA
Central Sahitya Akademi award for his 'Dyava Prithivi' in 1961
Jnanpith award-for his Bharatha sindhu rashmi, in 1990