गोपाल चंद्र प्रहराज ( जन्म- 9 सितम्बर, 1874,)

September 09, 2017

गोपाल चंद्र प्रहराज ( जन्म- 9 सितम्बर, 1874, कटक, उड़ीसा; मृत्यु- 16 मई, 1945) भारत के प्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक थे। वे उड़िया भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार तथा भाषाविद थे। सरल भाषा के गम्भीर विचार युक्त व्यंग्य लेखक के रूप में गोपाल चंद्र प्रहराज की काफ़ी प्रसिद्धि थी।


गोपाल चंद्र प्रहराज का जन्म 9 सितम्बर, 1874 ई. में उड़ीसा के कटक ज़िले में सिद्धेखरपुर नामक गाँव में एक ज़मींदार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने क़ानून की शिक्षा 'कोलकाता विश्वविद्यालय' से प्राप्त की थी। इसके बाद वे वर्ष 1902 में वकील बने।


व्यवसाय से वकील गोपाल चन्द्र की अमर रचना 'उड़िया भाषा कोश' है। बड़े आकार के प्रत्येक डेढ़ हज़ार पृष्ठों के सात खंडों में प्रकाशित इस कोश में एक लाख चौरासी हज़ार शब्द हैं। 1913 ई. में उन्होंने इसकी योजना बनाई थी और 1940 में यह प्रकाशित हो सका। शब्द-संकलन के लिए गोपाल चंद्र प्रहराज पच्चीस वर्षों तक वनों, पहाड़ों, ग्रामों और नगरों में घूमते रहे।


सरल भाषा में गंभीर विचार युक्त व्यंग्य लेखक के रूप में गोपाल चंद्र प्रहराज की बड़ी ख्याति थी। इस विषय पर उनके द्वारा लिखी गई कुछ पुस्तकें निम्नलिखित हैं-


'दुनिआर हालचाल'
'आम घरर हालचाल'
'ननांक बस्तानि'
बाइननांक बुजुलि'
'मियां साहेब का रोज़नामचा'

उड़िया भाषा के इस प्रसिद्ध साहित्यकार का 16 मई, 1945 में निधन हो गया। इनके निधन के बारे में कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि इन्हें किसी ने विष दे दिया था।


Gopala Chandra Praharaj (9 September 1874 – 16 May 1945) was a writer and linguist in the Odia language, well known as the compiler of the Purnachandra Odia Bhashakosha. He also contributed significantly to Odia literature by his works in prose. A lawyer by profession, Praharaj wrote several satirical and analytical essays, in magazines such as Utkal Sahitya, Rasachakra, Nababharata, and Satya Samachar, on the social, political and cultural issues of contemporary Odisha (Odisha) during early 20th century.



Praharaj was born on 9 September 1874 to an aristocratic Zamindar Brahmin family of Siddheswarpur in Cuttack district. He completed his matriculation from Ravenshaw Collegeate School and studied FA from Ravenshaw college of Cuttack. He studied law at Calcutta University and became a lawyer in 1902.



He started writing essays in the Magazine Utkal Sahitya in 1901 by the caption "Bhagabata Tungire Sandhya", which is the first published work by the author. It was followed by Bai Mohanty Panji and many other writings on socio-cultural and political issues. He followed the footsteps of Fakir Mohan Senapati and made a remarkable development in Odia satirical literature. Praharaj used the colloquial speech of Odisha along with Hindustani, Parsi, English, Sanskrit and folk language in his prose works. He wrote several critical essays with different pen names in many magazines up to his old age. However, he dedicated around three decades of his life to the compilation of Purnachandra Odia Bhashakosha.