रामवृक्ष बेनीपुरी (मृत्यु- 9 सितम्बर, 1968)

September 09, 2017

रामवृक्ष बेनीपुरी (जन्म- 23 दिसम्बर, 1899., मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार; मृत्यु- 9 सितम्बर, 1968, बिहार) भारत के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार और नाटककार थे। ये एक महान विचारक, चिन्तक, मनन करने वाले क्रान्तिकारी, साहित्यकार, पत्रकार और संपादक के रूप में भी अविस्मणीय हैं। बेनीपुरी जी हिन्दी साहित्य के 'शुक्लोत्तर युग' के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। ये एक सच्चे देश भक्त और क्रांतिकारी भी थे। इन्होंने 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम' में आठ वर्ष जेल में बिताये। हिन्दी साहित्य के पत्रकार होने के साथ ही इन्होंने कई समाचार पत्रों, जैसे- 'युवक' (1929) आदि भी निकाले। इसके अलावा कई राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता संग्राम संबंधी कार्यों में भी संलग्न रहे।


रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसम्बर, 1899 ई. में बेनीपुर नामक गाँव, मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला, बिहार में हुआ था। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव की पाठशाला में ही पाई थी। बाद में वे आगे की शिक्षा के लिए मुज़फ़्फ़रपुर के कॉलेज में भर्ती हो गए।


इसी समय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'रौलट एक्ट' के विरोध में 'असहयोग आन्दोलन' प्रारम्भ किया। ऐसे में बेनीपुरीजी ने भी कॉलेज त्याग दिया और निरंतर स्वतंत्रता संग्राम में जुड़े रहे। इन्होंने अनेक बार जेल की सज़ा भी भोगी। ये अपने जीवन के लगभग आठ वर्ष जेल में रहे। समाजवादी आन्दोलन से रामवृक्ष बेनीपुरी का निकट का सम्बन्ध था। 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के समय जयप्रकाश नारायण के हज़ारीबाग़ जेल से भागने में भी रामवृक्ष बेनीपुरी ने उनका साथ दिया और उनके निकट सहयोगी रहे।


रामवृक्ष बेनीपुरी की आत्मा में राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी, जिसके कारण आजीवन वह चैन की साँस न ले सके। उनके फुटकर लेखों से और उनके साथियों के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि जीवन के प्रारंभ काल से ही क्रान्तिकारी रचनाओं के कारण बार-बार उन्हें कारावास भोगना पड़ता। सन 1942 में 'अगस्त क्रांति आंदोलन' के कारण उन्हें हज़ारीबाग़ जेल में रहना पड़ा था। जेलवास में भी वह शान्त नहीं बैठे सकते थे। वे वहाँ जेल में भी आग भड़काने वाली रचनायें लिखते। जब भी वे जेल से बाहर आते, उनके हाथ में दो-चार ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ अवश्य होती थीं, जो आज साहित्य की अमूल्य निधि बन गई हैं। उनकी अधिकतर रचनाएँ जेल प्रवास के दौरान लिखी गईं।


रामवृक्ष बेनीपुरी की अनेक रचनाएँ, जो यश कलगी के समान हैं, उनमें 'जय प्रकाश', 'नेत्रदान', 'सीता की माँ', 'विजेता', 'मील के पत्थर', 'गेहूँ और गुलाब' आदि शामिल है। 'शेक्सपीयर के गाँव में' और 'नींव की ईंट', इन लेखों में भी रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने देश प्रेम, साहित्य प्रेम, त्याग की महत्ता और साहित्यकारों के प्रति जो सम्मान भाव दर्शाया है, वह अविस्मरणीय है। इंग्लैण्ड में शेक्सपियर के प्रति जो आदर भाव उन्हें देखने को मिला, वह उन्हें सुखद भी लगा और दु:खद भी। शेक्सपियर के गाँव के मकान को कितनी संभाल, रक्षण-सजावट के साथ संभाला गया है। उनकी कृतियों की मूर्तियाँ बनाकर वहाँ रखी गई हैं, यह सब देख कर वे प्रसन्न हुए थे। पर दु:खी इस बात से हुए कि हमारे देश में सरकार भूषण, बिहारी, सूरदास और जायसी आदि महान साहित्यकारों के जन्म स्थल की सुरक्षा या उन्हें स्मारक का रूप देने का भी प्रयास नहीं करती। उनके मन में अपने प्राचीन महान साहित्यकारों के प्रति अति गहन आदर भाव था। इसी प्रकार 'नींव की ईंट' में भाव था कि जो लोग इमारत बनाने में तन-मन कुर्बान करते हैं, वे अंधकार में विलीन हो जाते हैं। बाहर रहने वाले गुम्बद बनते हैं और स्वर्ण पत्र से सजाये जाते हैं। चोटी पर चढ़ने वाली ईंट कभी नींव की ईंट को याद नहीं करती।


पत्रकार और साहित्यकार के रूप में बेनीपुरीजी ने विशेष ख्याति अर्जित की थी। उन्होंने विभिन्न समयों में लगभग एक दर्जन पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। उनकी लेखनी बड़ी निर्भीक थी। उन्होंने इस कथन को अमान्य सिद्ध कर दिया था कि अच्छा पत्रकार अच्छा साहित्यकार नहीं हो सकता। उनका विपुल साहित्य, शैली, भाषा और विचारों की दृष्टि से बड़ा ही प्रभावकारी रहा है। उपन्यास, जीवनियाँ, कहानी संग्रह, संस्मरण आदि विधाओं की लगभग 80 पुस्तकों की उन्होंने रचना की थी। इनमें 'माटी की मूरतें' अपने जीवंत रेखाचित्रों के लिए आज भी याद की जाती हैं।


रामवृक्ष बेनीपुरी 1957 में बिहार विधान सभा के सदस्य भी चुने गए थे। सादा जीवन और उच्च विचार के आदर्श पर चलते हुए उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में बहुत काम किया था। वे भारतीयता के सच्चे अनुयायी थे और सामाजिक भेदभावों पर विश्वास नहीं करते थे।


रामधारी सिंह दिनकर ने एक बार बेनीपुरीजी के विषय में कहा था कि- "स्वर्गीय पंडित रामवृक्ष बेनीपुरी केवल साहित्यकार नहीं थे, उनके भीतर केवल वही आग नहीं थी, जो कलम से निकल कर साहित्य बन जाती है। वे उस आग के भी धनी थे, जो राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती है, जो परंपराओं को तोड़ती है और मूल्यों पर प्रहार करती है। जो चिंतन को निर्भीक एवं कर्म को तेज बनाती है। बेनीपुरीजी के भीतर बेचैन कवि, बेचैन चिंतक, बेचैन क्रान्तिकारी और निर्भीक योद्धा सभी एक साथ निवास करते थे।"


वर्ष 1999 में 'भारतीय डाक सेवा' द्वारा रामवृक्ष बेनीपुरी के सम्मान में भारत का भाषायी सौहार्द मनाने हेतु भारतीय संघ के हिन्दी को राष्ट्रभाषा अपनाने की अर्धशती वर्ष में डाक-टिकटों का एक संग्रह जारी किया। उनके सम्मान में बिहार सरकार द्वारा 'वार्षिक अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार' दिया जाता है।


रामवृक्ष बेनीपुरी जी का निधन 7 सितम्बर, 1968 को मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में हुआ।


Ramavriksha Benipuri (1899–1968) was a freedom fighter, Socialist Leader, editor and Hindi writer. He was born in a small village named Benipur in the Indian state of Bihar. He had spent nine years in prison for fighting for India's independence. He was the founder of Bihar Socialist Party in 1931 and Congress Socialist Party in 1934. He served as the president of Patna District Congress Committee of Indian National Congress from 1935 to 1937 during the Indian provincial elections, 1937. He was elected as the Member of the Legislative Assembly (India) from Katra North in 1957. In 1958, He was elected as the Syndicate Member of Bihar University (Now Babasaheb Bhimrao Ambedkar Bihar University), Muzaffarpur.


Rambriksh Benipuri hailed from Muzaffarpur in Bihar and took active part in the Indian freedom movement. He was also a journalist of Hindi Literature and started several newspapers like Yuvak in 1929 and regularly contributed in various others to spread the idea of nationalism and freedom from British rule.Benipuriji's first writing was published in Pratapa of Kanpur in 1916. Since then, till the attainment of Independence of India, his was a life of political activities and struggle. In 1928-29, Benipuri established Yuvaka-Ashram in front of Patna College in Patna with his friends and lifelong colleagues Ganga Sharan Singh and Pandit Ramnandan Mishra. In 1929, Benipuri started the publication of Yuvaka, a Hindi monthly from this organization, under his editorship.


Benipuri started his literary career in 1921 with a weekly Hindi journal Tarun Bharat of which he was an associate editor. He also worked as an associate editor of the Kisan Mitra weekly in 1922, Golmal in 1924 and as an editor of the monthly journal Balak in 1926, but the publication of Yuvak made him more popular.Yuvak, an illustrated Hindi monthly magazine, was launched in January 1929 by Rambriksh Benipuri, a distinguished Hindi writer, critic, poet, journalist and freedom fighter. He was assisted by Ganga Sharan Singh (Sinha), Ambica Kant Sinha and Jagdish Narayan in its publication.Devoted to 'strength, courage and culture', Yuvak was edited, printed and published by Rambriksh Benipuri from the Patna Yuvak Ashram. It was printed at the Searchlight Press. Yuvak was the official organ of the Patna Yuvak Sangh founded in 1927 by Manindra Narayan Roy, a journalist of The Searchlight.


Yuvak made Benipuri an eyesore of the colonial British government as its mission was to secure Swaraj for India promoting armed revolution and overthrowing the British regime.Its writings had a clear impact of Marxism as its contributors were political elites, avowed nationalists and Marxist revolutionaries.Rambriksh Benipuri stands in a class apart as a playwright.He wrote Ambapalai during his detention in the Hazaribagh Central Jail. Later on he wrote a series of one-act plays and radio-dramas, more notable being: the Netra-dan, Tathagat, Sanghamitra, Singhal Vijay and Vijsta. Benipuri had a forceful pen and was a prolific writer. Main attraction of Benipuri's plays lies in his way of writing. There is a delightful mixture of romanticism and idealism in his plays.In most of Rambriksha Benipuri's short stories pictures of rural life of north Bihar, specially that of Muzaffarpur district have been vividly presented.His Mati ki Moorraten, though not a story book in strict sense of the term, actually presents persons of flesh and blood, each throbbing with life, on a rural canvas.



Benipuri wrote mostly big stories and essays. His dramas covered mostly ancient events. For example, Amipure depicts the life of the famous courtesan Ambipure who adopted and converted to Buddhism after meeting Buddha. Likewise Netradaan (that is, Gift of Eyes), another drama, is based on a historical legend involving Ashoka and his son Kunal.


He was also a distinguished playwright.


A stanza from one of his famous poems, "Shahido – tumhari yaad me" goes like this:


Hey, the Martyrs of August Revolution,


We shall forever keep the flag high


For which thy hath given thy lives;


We shall always esteem the path of martyrdom


Sanctified by the blood of thy supreme sacrifice.
The eminent Hindi writer, poet, play-wright, journalist and nationalist Rambriksh Benipuri, who spent more than eight years in prison fighting for India's independence writes of Non-co-operation movement as:


"When I recall Non-Cooperation era of 1921, the image of a storm confronts my eyes. From the time I became aware, I have witnessed numerous movements, however, I can assert that no other movement upturned the foundations of Indian society to the extent that the Non-Cooperation movement did. from the most humble huts to the high places, from villages to cities, everywhere there was a ferment, a loud echo.


Benipuri was a close associate of Jayaprakash Narayan and a leading light of the Congress Socialist Party. He took active part in the agitation against the Rowlatt Act and participated in the Non-cooperation movement launched by Mahatma Gandhi in 1920.He was an active member of the Bihar Pradesh Congress Committee, a member of the Indian National Congress, one of the founder members of the Bihar Socialist Party and a member of the working committee of the All India Congress Socialist Party.He had also been the President of the Bihar Provincial Kisan Sabha and the Vice-President of the All India Kisan Sabha. At the 50th session of the All India Congress Committee held at Faizpur in 1937 he moved a resolution on the abolition of Zamindari. Again, it was Benipuri who helped Jayaprakash Narayan escape from the Hazaribagh Central Jail alongwith Jogendra Shukul, Suraj Narayan Singh, Gulali Sonar, Pandit Ramnandan Mishra, and Shaligram Singh on November 9, 1942 keeping the prisoners engaged in Diwali Celebration.


In Hazaribagh Central Jail, he initiated a campaign " Janaeu Todo Abhiyaan" (Breaking of the Upanayana threads) against Casteism. As Upnayan threads are the symbol of upper castes epesically Brahmin and Zamindar.


In 1999, Benipuri was one of the Hindi writers depicted in a set of commemorative postal stamps released to celebrate the "Linguistic Harmony of India," marking the 50th anniversary since the Indian Union adopted Hindi as its official language.The chief guest on the occasion of the birth centenary of Benipuri held in zonal railway training centre at Muzaffarpur, held under the auspices of railway ministry, was the former Prime Minister of India Chandra Shekhar. The main speakers included litterateur Namwar Singh and journalist Prabhash Joshi.Namwar Singh described Benipuri as only the second litterateur who preferred to associate his name with that of his village.


Prabhash Joshi ranked Benipuri with Makhanlal Chaturvedi and Ganesh Shankar Vidyarthi, who were both contemporary writers and journalists as well. He said '"Benipuri was not like today's journalists who work only to earn. Benipuri had a desire to create a "samtawadi samaj" and fight against imperialism.