मंसूर अली ख़ान पटौदी (मृत्यु- 22 सितंबर, 2011)

September 22, 2017

मंसूर अली ख़ान पटौदी ((जन्म- 5 जनवरी, 1941, भोपाल, मध्य प्रदेश; मृत्यु- 22 सितंबर, 2011 दिल्ली) भारतीय क्रिकेट टीम के भूतपूर्व कप्तान और महान खिलाड़ी थे। अपनी कलात्मक बल्लेबाजी से अधिक कप्तानी के कारण क्रिकेट जगत में अमिट छाप छोडऩे वाले मंसूर अली ख़ान पटौदी ने भारतीय क्रिकेट में नेतृत्व कौशल की नई मिसाल और नए आयाम जोड़े थे।


जीवन परिचय
पटौदी जूनियर जिन्हें दुनिया टाइगर पटौदी अथवा नवाब पटौदी के नाम से भी जानती है, का जन्म 5 जनवरी 1941 को मध्य प्रदेश के भोपाल के नवाब परिवार में हुआ था। यह दिन उन्हें खुशी के साथ गम भी दे गया था। पटौदी का जन्म भले ही भोपाल के शाही परिवार में हुआ लेकिन उन्हें विषम परिस्थितियों से जूझना पड़ा, चाहे वह निजी ज़िंदगी हो या फिर क्रिकेट। पटौदी जब 11वां जन्मदिन मना रहे थे तब इसी दिन 1952 में उनके पिता पूर्व भारतीय कप्तान इफ्तिखार अली ख़ाँ पटौदी का दिल्ली में पोलो खेलते हुए दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। इसके बाद जूनियर पटौदी को सभी भूल गये। चार साल बाद ही अखबारों में उनका नाम छपा जब विनचेस्टर की तरफ से खेलते हुए उन्होंने अपनी बल्लेबाजी से सभी को प्रभावित किया। अपने पिता के निधन के कुछ दिन बाद ही पटौदी इंग्लैंड आ गए थे। जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कैरियर शुरू किया तो 20 साल की उम्र में एक कार दुर्घटना में उनकी दाहिनी आंख की रोशनी चली गई। मंसूर अली ख़ाँ पटौदी ने इसके बावजूद क्रिकेट की अपनी विरासत न सिर्फ बरकरार रखी बल्कि भारतीय क्रिकेट को भी नई ऊंचाईयां दी। वह भारत, दिल्ली, हैदराबाद, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ससेक्स टीमों के लिए खेले थे।


मंसूर अली ख़ान पटौदी की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा देहरादून के वेलहम बॉयज स्कूल में हुई और फिर उन्होंने अपनी ज़्यादातर पढ़ाई ब्रिटेन में की। वे इफ़्तिख़ार अली ख़ान पटौदी के बेटे थे। जो पटौदी के आठवें नवाब थे। इफ़्तिख़ार अली ख़ान पटौदी सीनियर पटौदी के नाम से जाने जाते थे और उन्होंने भी भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी की थी।


पटौदी ने शर्मिला टैगोर से शादी करने का फैसला 25 जुलाई, 1966 को लंदन में लिया था। इससे पहले 1 मार्च, 1967 को उनकी मंगनी हुई थी। मशहूर अदाकारा और सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रह चुकीं अभिनेत्री शर्मिला से उनकी पहली मुलाकात उनके कोलकाता स्थित घर पर तब हुई थी, जब पटौदी अपने एक मित्र के साथ वहां एक कार्यक्रम में गए थे। इसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन और इंदिरा गांधी भी शामिल हुईं थीं। पटौदी के परिवार में पत्नी बालीवुड अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और तीन बच्चे हैं। उनका बेटा बालीवुड अभिनेता सैफ अली ख़ान और अभिनेत्री सोहा अली ख़ान हैं। उनकी एक बेटी सबा अली ख़ान 'ज्वैलरी डिजाइनर' है।


कई राजे-रजवाड़े की शख़्सियतों के सियासत के मैदान में उतरने पर उन्होंने भी राजनीति में आने का फैसला किया। विधान सभा का पहला चुनाव उन्होंने 1971 में पटौदी स्टेट (गुडग़ांव) से लड़ा, लेकिन यहां उन्हें शिकस्त मिली। वर्ष 1991 में उन्होंने भोपाल से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा तो भाजपा के सुशील चंद्र वर्मा से हार गए। इस चुनाव में खुद पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने उनके लिए चुनाव प्रचार किया था। उन्हें भोपाल से चुनाव लड़ाने का फैसला राजीव गांधी का था। इस चुनाव में बेगम आयशा सुल्तान यानी शर्मिला टैगोर ने प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कई क्रिकेटर भी चुनाव प्रचार करने भोपाल आए थे।


पटौदी ने अपने पिता को अधिक खेलते हुए नहीं देखा था लेकिन उनका क्रिकेट प्यार तब लोगों को पता चला था जब वह अपने पिता के निधन के कुछ दिन बाद ही जहाज़ में इंग्लैंड जा रहे थे। इस जहाज़ में वीनू मांकड़ तथा वेस्टइंडीज के फ्रैंक वारेल और एवर्टन वीक्स जैसे खिलाड़ी भी थे और तब पटौदी ने जहाज़ के डेक पर उनके साथ क्रिकेट खेली थी। इसके दस साल बाद युवा पटौदी किसी और के साथ नहीं बल्कि वारेल के साथ टेस्ट मैच में टॉस करने के लिए उतरे थे। वारेल ने इसके बाद कई अवसरों पर अपने इस युवा प्रतिद्वंद्वी की जमकर प्रशंसा की।


अपने प्रथम श्रेणी के करियर में पटौदी ने 310 मैचों में 33.67 के औसत से 15425 रन बनाए थे जिनमें 33 शतक और 75 अर्धशतक शामिल थे।


पटौदी ने अपना टेस्ट मैच करियर 13 दिसंबर 1961 को दिल्ली में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ शुरू किया था और एक साल बाद ही 1962 में उन्हें टेस्ट टीम की कप्तानी सौंप दी गई। उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट 23 से 29 जनवरी 1975 तक मुंबई में वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ खेला था। भारत के सबसे सफल कप्तानों में माने जाने वाले पटौदी ने 46 टेस्टों में 34.91 के औसत से 2793 रन बनाए थे जिनमें छह शतक, 16 अर्धशतक और 1 विकेट शामिल हैं। उनका सर्वाधिक स्कोर नाबाद 203 रन (नाबाद) रहा था। उनका औसत भले ही प्रभावशाली न हो लेकिन इनमें से 40 टेस्ट मैच उन्होंने तब खेले थे जबकि 1961 में एक कार दुर्घटना में उनकी दायीं आंख की रोशनी चली गई थी।


पटौदी ने मात्र 21 वर्ष 77 दिन की उम्र में भारतीय टीम की कप्तानी संभाली थी। पटौदी उस समय दुनिया के सबसे युवा कप्तान बने थे। टेस्ट क्रिकेट में सबसे कम उम्र में कप्तानी का रिकार्ड 2004 तक उनके नाम पर रहा। जिम्बाब्वे के तातैंडा तायबू ने 2004 में यह रिकार्ड अपने नाम किया था। पटौदी के कप्तान बनने के बाद भारतीय क्रिकेट की तस्वीर भी बदलने लगी। पटौदी को यह ज़िम्मेदारी वेस्टइंडीज दौरे में नियमित कप्तान नारी कांट्रेक्टर के सिर में चोट लगने के कारण दी गई थी। उन्होंने एक आंख की रोशनी के बावजूद टेस्ट क्रिकेट में पांच शतक लगाए जिनमें कप्तान के रूप में उनकी पहली पूरी सीरीज 1963-64 में दिल्ली में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ बनाया उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 203 रन भी शामिल है। पटौदी ने उसी वर्ष आस्ट्रेलियाई टीम के ख़िलाफ़ दो अर्धशतक बनाए थे जिसकी बदौलत भारत ने मुंबई टेस्ट जीता था। उन्होंने चेन्नई टेस्ट में आस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ नाबाद शतक भी बनाया था। फिरोजशाह कोटला में ही उन्होंने 1965 में न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ 113 रन की जोरदार पारी खेली थी जिससे भारत सात विकेट से मैच जीतने में सफल रहा था। पटौदी ने अपने 46 टेस्टों में से 40 में भारत का नेतृत्व किया था और नौ में भारत को जीत दिलाई थी जबकि 19 में हार मिली। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पटौदी से पहले भारतीय टीम ने जो 79 मैच खेले थे उनमें से उसे केवल आठ में जीत मिली थी और 31 में हार। यही नहीं इससे पहले भारत विदेशों में 33 में से कोई भी टेस्ट मैच नहीं जीत पाया था।


टाइगर के कमान संभालने से पहले भारतीय टीम को नौसिखिया माना जाता था जिससे आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी बड़ी टीमें ज़्यादा क्रिकेट नहीं खेलना चाहती थी लेकिन पटौदी ने अपने भारतीय खिलाडि़यों को सिखाया कि वह भी जीत सकते हैं और दिग्गज टीमों को नतमस्तक करने का माद्दा उनमें भी है। पटौदी हमेशा इस बात के हिमायती रहे थे कि टीम की जो ताकत है उसे उसी हिसाब से खेलना चाहिए। स्पिनर उस समय भारतीय टीम की ताकत हुआ करते थे और उन्होंने अपनी सफलताएं तीन स्पिनरों को मैदान पर उतारकर हासिल की थीं।


पटौदी साहसिक बल्लेबाज़ी के लिए जाने जाते थे और फील्डरों के ऊपर से शाट खेलने से नहीं चूकते थे। वह परंपरागत सोच में यकीन नहीं रखने वाले कप्तान थे और हमेशा कुछ अलग करने की कोशिश में रहते थे। एक कार दुर्घटना में उनकी दाईं आंख की रोशनी पर असर पडा था जिससे उनका क्रिकेट करियर प्रभावित हुआ।


क्रिकेट से सन्न्यास लेने के बाद वह 1993 से 1996 तक आईसीसी मैच रैफरी भी रहे थे जिसमें उन्होंने दो टेस्ट और 10 वनडे में यह भूमिका निभाई थी। वह 2005 में तब एक विवाद में भी फंस गए थे जब उन्हें लुप्त प्रजाति काले हिरण के अवैध शिकार के लिए गिरफ्तार किया गया था। वर्ष 2008 में पटौदी इंडियन प्रीमियर लीग [आईपीएल] की संचालन परिषद में भी नियुक्त किए गए थे और दो साल तक इस पद पर बने रहने के बाद 2010 में उन्होंने बीसीसीआई के इस पद की पेशकश को ठुकरा दिया था।


मंसूर अली ख़ान पटौदी का फेफडों के संक्रमण के कारण 22 सितंबर 2011 को 70 वर्ष की उम्र में निधन हुआ था। 23-09-2011 को मंसूर अली को गुड़गांव (हरियाणा) ज़िले के उनके पुश्‍तैनी गांव पटौदी में पटौदी महल परिसर स्थित क़ब्रगाह में जहां दफनाया गया, वहां पास में ही उनके दादा-दादी और पिता की क़ब्र है।


13 दिसंबर 1961 :- टेस्ट पदार्पण इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दिल्ली में 13 रन बनाए।
10 जनवरी 1962 :- इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट का अपना पहला शतक (113 रन) चेन्नई में बनाया।
23 मार्च 1962 :- बारबडोस टेस्ट में भारत के लिए पहली बार कप्तानी की, तब उनकी उम्र 21 साल ही थी।
12-13 फरवरी 1964 :- कैरियर की सर्वश्रेष्ठ पारी 203 नाबाद इंग्लैंड के ख़िलाफ़ नईदिल्ली टेस्ट में खेली।
फरवरी-मार्च 1968 :- ड्युनेडिन टेस्ट में न्यूजीलैंड को हराकर पहली बार विदेश में 3-1 से सीरीज जीती।
23 जनवरी 1075 :- वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ कैरियर के अंतिम टेस्ट (मुंबई) की दोनों पारियों में 9-9 रन बनाए।
1961 से 1975 के बीच पटौदी ने 46 टेस्ट बनाए।
1968 में विजडन क्रिकेटर ऑफ द ईयर
1964 में अर्जुन पुरस्कार
1967 में पद्मश्री से अंलकृत
आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की खेल पत्रिका स्पोट्र्स वल्र्ड का एक दशक से भी ज़्यादा समय तक संपादन।
2007 से बीसीसीआई के सलाहकार तथा आईपीएल गवर्निंग काउंसिल के सदस्य।
टीवी कॉमेंट्रेटर की भूमिका भी निभा चुके हैं।
2007 से इंग्लैंड-भारत के बीच पटौदी ट्रॉफी के लिए टेस्ट सीरीज खेली जाती है।


Nawab Mansoor Ali Khan Pataudi  (5 January 1941, Bhopal – 22 September 2011, New Delhi), nicknamed Tiger Pataudi, was an Indian cricketer and former captain of the Indian cricket team. He was the titular Nawab of Pataudi from 1952 until 1971, when by the 26th Amendment to the Constitution of India the privy purses of the princes were abolished and official recognition of their titles came to an end.He has been described as "India’s greatest cricket captain". He was appointed captain of the Indian team at the age of 21 even though several other players were more experienced.


Mansoor Ali Khan was the son of Iftikhar Ali Khan, himself a renowned cricketer. He was born in Bhopal and educated at Minto Circle in Aligarh and then went to Welham Boys' School in Dehradun (Uttarakhand), Lockers Park Prep School in Hertfordshire (where he was coached by Frank Woolley), and Winchester College. He learned Arabic and French at Balliol College, Oxford.


His father died while playing polo in Delhi on Mansoor's eleventh birthday in 1952, whereupon Mansoor succeeded as the ninth Nawab. Although the princely state of Pataudi had been merged with India after the end of the British Raj in 1947, he held the title until the entitlements were abolished by the Government of India through the 26th amendment to the constitution in 1971.


Pataudi Jr., as Mansoor came to be known during his cricket career, was a right-handed batsman and a right-arm medium pace bowler.He was a schoolboy batting prodigy at Winchester, relying on his keen eyes to punish the bowling. He captained the school team in 1959, scoring 1,068 runs that season and beating the school record set in 1919 by Douglas Jardine. He also won the public schools rackets championship, with partner Christopher Snell.


He made his first-class debut for Sussex in August 1957, aged 16, and also played for Oxford while he was at university and was the first Indian captain there. On 1 July 1961, he was a passenger in a car which was involved in an accident in Hove. A shard of glass from the broken windscreen penetrated and permanently damaged his right eye. The surgeon named Dr. David St Clair Roberts was called to operate on his eye, and was praised by Pataudi for saving one of his eyes. The damage caused Pataudi to see a doubled image, and it was feared this would end his cricketing career, but Pataudi was soon in the nets learning to play with one eye.


Despite his eye injury less than 6 months before, he made his Test debut playing against England in Delhi in December 1961. He found it easiest to play with his cap pulled down over his damaged right eye. He scored 103 in the Third Test in Madras, helping India to its first series win against England. He was appointed vice-captain for the tour to the West Indies in 1962. In March 1962, Mansoor became captain of the Indian cricket team after the sitting captain Nari Contractor was ruled out of the Fourth Test in Barbados due to an injury sustained by Contractor batting against Charlie Griffith in a tour match against Barbados. At 21 years and 77 days, he held the world record for the youngest Test captain until he was surpassed by Tatenda Taibu in May 2004. As of November 2015, he remains the youngest Indian Test captain and second youngest International Test captain worldwide.


He played in 46 Test matches for India between 1961 and 1975, scoring 2,793 runs at a Test batting average of 34.91, including 6 Test centuries.[8] Mansoor was captain of the Indian cricket team in 40 of his 46 matches, only 9 of which resulted in victory for his team, with 19 defeats and 19 draws. His victories included India's first ever Test match win overseas against New Zealand in 1968. India went on to win that series, making it India's first ever Test series win overseas.He lost the captaincy of the Indian cricket team for the tour to the West Indies in 1970-1, and did not play Tests from 1970 to 1972. He returned to the India side captained by Ajit Wadekar in 1973, for the Third Test against England, and captained India against West Indies in 1974-5, but was finally dropped as a player in 1975.


Between 1957 and 1970 Mansoor, following his countrymen Ranjitsinhji and Duleepsinhji, played 137 first class matches for Sussex County Cricket Club scoring 3,054 runs at an average of 22.29. He captained Sussex in 1966. In India, he played first-class cricket for Delhi in the North Zone until 1966, and then for Hyderabad in the South Zone.


He was an Indian Cricket Cricketer of the Year in 1962, and a Wisden Cricketer of the Year in 1968. He published an autobiography, Tiger's Tale, in 1969. He was the manager of the India team in 1974-5, and referee for two Ashes Tests in 1993.He was later a member of the council of the Indian Premier League. In 2007, in commemoration of the 75th anniversary of India's Test debut, the Marylebone Cricket Club has commissioned a trophy for Test match series between India and England which was named the Pataudi Trophy in honour of his father, the 8th Nawab.


Pataudi holds the record for facing the most number of balls in a single test match when batting at number six position in Test history(554)On 27 December 1968, Mansoor married Indian film actress Sharmila Tagore. They had three children: Saif Ali Khan (b. 1970), a Bollywood actor, Saba Ali Khan (b. 1976),[18] a jewellery designer, and Soha Ali Khan (b. 1978), a Bollywood actress and TV personality.


Mansoor Ali Khan Pataudi was also a member of the Freemasons.
Pataudi was admitted to New Delhi's Sir Ganga Ram Hospital on 15 August 2011 with an acute lung infection caused by chronic interstitial lung disease which prevented his lungs from exchanging oxygen properly. He died of respiratory failure on 22 September 2011 after being in hospital for more than a month. His body was buried at Pataudi near Delhi on 23 September 2011. His funeral was attended by large number of film actors, directors and producers, as well as cricketing fraternity.



Awards and recognitions


1964 Arjuna Award
1967 Padma Shri
In honour of his outstanding contributions towards cricket, the Mansur Ali Khan Pataudi Memorial Lecture was instituted by the BCCI on 6 February 2013 with the inaugural lecture by Sunil Gavaskar on 20 February 2013.