कन्हैयालाल नंदन (मृत्यु: 25 सितंबर, 2010 )

September 25, 2017

कन्हैयालाल नंदन (जन्म: 1 जुलाई, 1933 उत्तर प्रदेश - मृत्यु: 25 सितंबर, 2010 दिल्ली) वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार, मंचीय कवि और गीतकार के रूप में मशहूर रहे। नंदन ने पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अपना अलग मुकाम बनाया। पराग, सारिका और दिनमान जैसी पत्रिकाओं में बतौर संपादक अपनी छाप छोड़ने वाले नंदन ने कई किताबें भी लिखीं। कन्हैयालाल नंदन को भारत सरकार के पद्मश्री पुरस्कार के अलावा भारतेन्दु पुरस्कार और नेहरू फेलोशिप पुरस्कार से भी नवाजा गया।


जीवन परिचय
कन्हैयालाल नंदन का जन्म 1 जुलाई, 1933 में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर ज़िले के परसदेपुर गांव में हुआ था। उनके परिवार में पत्नी और दो पुत्रियां हैं। उनकी एक पुत्री अमेरिका और दूसरी दिल्ली में ही रहती हैं। उनके एक क़रीबी सहयोगी के अनुसार नंदन स्वभाव से बेहद सरल और उच्च व्यक्तित्व के धनी थे। वह बतौर संपादक खोजी पत्रकारिता और नए प्रयोगों के पक्षधर थे। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत मशहूर पत्रिका 'धर्मयुग' से की। पत्रकारिता में क़दम रखने से पहले अध्यापन से जुड़े थे।


कन्हैयालाल नंदन ने डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से बी.ए, प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से एम.ए और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. किया। 


चार वर्षों तक बंबई विश्वविद्यालय, बंबई से संलग्न कॉलेजों में हिन्दी-अध्यापन के बाद 1961 से 1972 तक 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशन समूह' के ‘धर्मयुग’ में सहायक संपादक रहे। 1972 से दिल्ली में क्रमश: ’पराग’, ’सारिका’ और दिनमान के संपादक रहे। तीन वर्ष 'दैनिक नवभारत टाइम्स' में फीचर सम्पादन किया। 6 वर्ष तक हिन्दी ‘संडे मेल’ में प्रधान संपादक रहने के बाद 1994 से ‘इंडसइंड मीडिया’ में निर्देशक रहे।


1961 से 1972 तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशन समूह के धर्मयुग में सहायक संपादक।
1972 से दिल्ली में क्रमश: पराग, सारिका और दिनमान के संपादक।
तीन वर्ष तक दैनिक नवभारत टाइम्स में फीचर संपाद।
6 वर्ष तक हिन्दी संडे मेल में प्रधान संपादक।
1995 से इंडसइंड मीडिया में निदेशक के पद पर।

सत्तर के दशक से अस्सी के दशक के शुरू के काल में बचपन व्यतीत करने वाले ऐसे करोड़ों हिन्दी भाषी लोग होंगे जिन्होंने अपने बचपन में नंदन जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली बाल-पत्रिका पराग के द्वारा बाल-साहित्य के मायावी, कल्पनात्मक और ज्ञानवर्धक संसार में गोते लगाकर गंभीर और श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने की ओर क़दम बढ़ाने के लिये आरम्भिक शिक्षा दीक्षा प्राप्त की। इसी पीढ़ी ने थोड़ा बड़े होकर नंदन जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं सारिका और दिनमान के ज़रिये देश-विदेश का साहित्य पढ़ने और सम-सामयिक विषयों को समझने की समझ विकसित की।


ज़िन्दगी की ये ज़िद है
ख़्वाब बन के उतरेगी।
नींद अपनी ज़िद पर है
इस जनम में न आएगी
दो ज़िदों के साहिल पर
मेरा आशियाना है
वो भी ज़िद पे आमादा
ज़िन्दगी को कैसे भी
अपने घर बुलाना है।-कन्हैया लाल नंदन


गुज़रा कहाँ कहाँ से जैसी प्रसिद्ध कृति की रचना करने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन 25 सितंबर, 2010 को दिल्ली में मृत्यु का दामन पकड़ जीवन का साथ छोड़ गये। वे किडनी की बीमारी से बरसों से जूझ रहे थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने परिचितों और प्रशंसकों को इस बात की हवा भी नहीं लगने दी। एक घातक बीमारी के साथ पूरी ज़िंदादिली के साथ जीते रहे।


 


Kanhaiya Lal Nandan (1933–2010) was an Indian poet, lyricist and a former Features Editor of the Navbharat Times. He also served as the editor of a few notable Hindi magazines such as Parag, Sarika and Dinman. Born on 1 July 1933 at Parsadepur in Fatehpur district of the Indian state of Uttar Pradesh, Nandan graduated from the Allahabad University and continued his studies to secure a master's degree and a doctoral degree from Bhavnagar University. His career started as an academic at Mumbai University, but, after four years, he turned to journalism by joining Dharmayug as an assistant editor in 1961 and stayed there till 1972. Later, he moved to Parag as its editor, before working as the editor of Sarika and Dinman.


Nandan authored over 36 books, including Ghat Ghat Ka Pani, Aag Ke Rang and Guzra Kaha Kaha Se.The Government of India awarded him the fourth highest civilian award of the Padma Shri, in 1999.He was also a recipient of Bhartendu Award.He died on 25 September 2010, at the age of 77, at a hospital in New Delhi, survived by his wife and two daughters. His mortal remains were cremated at Lodhi Road crematorium in the city.