मुकेश (मृत्यु- 27 अगस्त, 1976)

August 27, 2017

मुकेश ( जन्म- 22 जुलाई, 1923; मृत्यु- 27 अगस्त, 1976) भारत में संगीत इतिहास के सर्वश्रेष्‍ठ गायकों में से एक थे। पेशे से एक इन्जीनियर के घर में पैदा होने वाले मुकेश चन्द माथुर के अन्दर वह सलाहियत थी कि वह एक अच्छे गायक बन कर उभरें। और हुआ भी यही। कुदरत ने उनके अंदर जो काबलियत दी थी, वह लोगों के सामने आई और मुकेश की आवाज़ का जादू पूरी दुनिया के सिर चढ़ कर बोला।


परिचय-
मुकेश का जन्म 22 जुलाई, 1923 को दिल्ली में हुआ था। इनका विवाह 'सरल' के साथ हुआ था। मुकेश और सरल की शादी 1946 में हुई थी। मुकेश के एक बेटा और दो बेटियाँ हैं, जिनके नाम है:- नितिन, रीटा और नलिनी। मुकेश के पोते 'नील नितिन मुकेश' बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता हैं। इनके पिता जोरावर चंद्र माथुर अभियंता थे। दसवीं तक शिक्षा पाने के बाद पी.डब्लु.डी. दिल्ली में असिस्टेंट सर्वेयर की नौकरी करने वाले मुकेश अपने शालेय दिनों में अपने सहपाठियों के बीच के. एल. सहगल के गीत सुना कर उन्हें अपने स्वरों से सराबोर किया करते थे किंतु विधाता ने तो उन्हें लाखों करोड़ों के दिलों में बसने के लिये अवतरित किया था। सो विधाता ने वैसी ही परिस्थितियाँ निर्मित कर मुकेशजी को दिल्ली से मुम्बई पहुँचा दिया। 1946 में मुकेश की मुलाकात एक गुजराती लड़की से हुई। नाम था बची बेन (सरल मुकेश)। सरल से मिलते ही मुकेश उनके प्रेम में डूब गए। हालांकि मुकेश कायस्थ थे। इस वजह से एक कड़ा प्रतिबंध सरल के परिवार से था, लेकिन मुकेश दोनों परिवारों के तमाम बंधनों की परवाह न करते हुए अपने जन्मदिन 22 जुलाई 1946 को सरल के साथ शादी के अटूट बंधन में बंध गए। यहां एक बार फिर मोतीलाल ने उनका साथ देते हुए अपने तीन अन्य साथियों के साथ एक मंदिर में शादी की सारी रस्में पूरी कराई।


मुकेश के बेटे नितिन मुकेश के अनुसार, वो प्रतिदिन 5 बजे सोकर उठते थे, भले ही वो 15 मिनट पहले ही सोने के लिए गए हों। एक-दो घंटे रियाज़ करने के बाद बगल के बगीचे में टहलते थे। वहां वो हर एक फूल को बड़े प्यार से देखते थे, मानो अपने किसी साथी से बातें कर रहे हों। वो भगवान श्रीराम के परम भक्त थे और प्रतिदिन सुबह रामचरित मानस का पाठ किया करते थे, जिसे वे हमेशा अपने पास रखते थे। मुकेश यह कतई नहीं चाहते थे कि नितिन मुकेश एक गायक बने। वो हमेशा कहते थे कि गायन एक सुंदर रुचिकर, मगर बड़ा कष्टदायक व्यवसाय है। वो प्रत्येक स्टेज शो की समाप्ति पर नितिन की तारीफ उनकी माता सरल मुकेश से किया करते थे और कहते थे, आज तो आपके साहबजादे ने अपने पापा से भी ज्यादा तालियां पा लीं। मुकेश को अपने दो गीत बेहद पसंद थे- जाने कहां गए वो दिन.... और दोस्त-दोस्त ना रहा..।


मुकेश की आवाज़ की खूबी को उनके एक दूर के रिश्तेदार मोतीलाल ने तब पहचाना, जब उन्होंने उन्हें अपनी बहन की शादी में गाते हुए सुना। मोतीलाल उन्हें बम्बई ले गये और अपने घर में रहने दिया। यही नहीं उन्होंने मुकेश के लिये रियाज़ का पूरा इन्तज़ाम किया। सुरों के बादशाह मुकेश ने अपना सफ़र 1941 में शुरू किया। 'निर्दोष' फ़िल्म में मुकेश ने अदाकारी करने के साथ-साथ गाने भी खुद गाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'माशूका', 'आह', 'अनुराग' और 'दुल्हन' में भी बतौर अभिनेता काम किया। उन्होंने सब से पहला गाना "दिल ही बुझा हुआ हो तो" गाया था। इसमें कोई शक नहीं कि मुकेश एक सुरीली आवाज़ के मालिक थे और यही वजह है कि उनके चाहने वाले सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं, बल्कि अमरीका के संगीत प्रेमियों के दिलों को भी ख़ुश करते थे। के. एल. सहगल से मुतअस्सिर मुकेश ने अपने शरूआती दिनों में उन्हीं के अंदाज़ में गाने गाए। मुकेश का सफर तो 1941 से ही शुरू हो गया था, मगर एक गायक के रूप में उन्होंने अपना पहला गाना 1945 में फ़िल्म 'पहली नजर' में गाया। उस वक्त के सुपर स्टार माने जाने वाले 'मोती लाल' पर फ़िल्माया जाने वाला गाना 'दिल जल्ता है तो जलने दे' हिट हुआ था।


शायद उस वक्त मोतीलाल को उनकी मेहनत भी कामयाब होती नज़र आई होगी। क्योंकि वह ही वह जौहरी थे, जिन्होंने मुकेश के अंदर छुपी सलाहियत को परखा था और फिर मुम्बई ले आए थे। के. एल. सहगल की आवाज़ में गाने वाले मुकेश ने पहली बार 1949 में फ़िल्म 'अंदाज़' से अपनी आवाज़ को अपना अंदाज़ दिया। उसके बाद तो मुकेश की आवाज़ हर गली हर नुक्कड़ और हर चौराहे पर गूंजने लगी। 'प्यार छुपा है इतना इस दिल में, जितने सागर में मोती' और 'ड़म ड़म ड़िगा ड़िगा' जैसे गाने संगीत प्रेमियों के ज़बान पर चलते रहते थे। इन्हें गीतों ने मुकेश को प्रसिद्धि की ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। मुकेश के दिल के अरमान अदाकार बनने के थे और यही वजह है कि गायकी में कामयाब होने के बावजूद भी वह अदाकारी करने के इच्छुक थे। उन्होंने यह किया भी, मगर एक के बाद एक तीन फ़्लॉप फ़िल्मों ने उनके सपने को चकनाचूर कर दिया और मुकेश यहूदी फ़िल्म के गाने में अपनी आवाज़ देकर फिर से फ़िल्मी दुनिया पर छा गए।


मुकेश ने उस जमाने के बहुचर्चित गायक के. एल. सहगल की गायन शैली की छत्रछाया में रहकर अपने गायन की शुरूआत की थी। मिसाल के तौर पर उनका पहला हिट गीत- दिल जलता है तो जलने दे... था। इस गीत ने उनको मशहूर पार्श्वगायक बनाया। संगीतकार थे अनिल विश्वास। आगे चलकर अनिल विश्वास ने ही मुकेश की गायन शैली को एक नई पहचान दी। दरअसल मुकेश की गायन शैली केएल सहगल से इतनी मिलती-जुलती थी कि कई बार तो संगीत प्रेमियों में वाद-विवाद छिड़ जाता था कि इस गाने का असली गायक कौन है। मुकेश की आवाज़ में छिपा दर्द, उस समय के दर्द भरे फिल्मी गीतों के लिए पूर्ण रूप से सटीक होता था, जिससे भारतीय श्रोता बड़े चाव से सुनते थे। सन् 1948 में संगीतकार नौशाद मुकेश से मिले और उनसे कई गीत गवाए। इन गीतों में, भूलने वाले याद ना आना..., तू कहे अगर..., झूम-झूम के नाचो आज..., टूटे ना दिल टूटे ना..., हम आज कहीं दिल खो बैठे....आदि उल्लेखनीय हैं। इन गीतों से मुकेश की आवाज़ दिलीप कुमार के लिए बहुत चर्चित हो गई।


मुकेश को पहला मौका मिला राजकपूर को अपनी आवाज़ देने का केदार शर्मा निर्मित, निर्देशित और लिखिल फिल्म 'नीलकमल' (1947) में। इसी दौरान नौशाद ने मुकेश को अपनी गायन की एक अलग शैली विकसित करने की सलाह दी, जिससे मुकेश की अपनी एक अलग पहचान हो। फिल्म आग के बाद मुकेश राज कपूर की आवाज़ बन गए। यह दो जिस्म और एक जान का अनूठा संगम था। मुकेश तो पहले से ही राज के लिए फिल्म नीलकमल में- आंख जो देखे... गा चुके थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का आखिरी गीत- चंचल, शीलत, निर्मल कोमल... भी राजकपूर की सत्यम, शिवम, सुदंरम फिल्म के लिए रिकॉर्ड करवाया। यह गीत उन्होंने अमेरिका के लिए रवाना होने से कुछ घंटे पहले रिकॉर्ड करवाया था। राजकपूर-मुकेश की जोड़ी ने एक-दूसरे की जरूरत बनकर सेल्युलाइड के इतिहास में मिसाल कायम की। 1949 से इस जोड़ी ने न जाने कितने अनगिनत यादगार गीत दिए। जैसे छोड़ गए बालम...., जिंदा हूं इस तरह..., रात अंधेरी दूर सवेरा..., दोस्त-दोस्त ना रहा..., जीना यहां मरना यहां..., कहता है जोकर...., जाने कहां गए वो दिन... आदि गीत हिंदी सिनेमा के सदाबहार नगमों में शामिल हैं। इसके अलावा आवारा हूं..., मेरा ना राजू..., मेरा जूता है जापानी..., मेरे मन की गंगा..., ओ मेहबूबा..., सरीखे गीत उनकी एक अलग प्रतिभा का उदाहरण हैं। लेकिन उनको सामान्यतया दर्द भरे गीतों का जादूगर माना जाता रहा। राज कपूर की लगभग सभी फिल्मों की आवाज़ थे मुकेश। कभी तो ऎसा लगता है मानो जैसे ईश्वर ने मुकेश को राजकपूर के लिए ही बनाया है या फिर राजकपूर मुकेश के लिए बने हैं। मुकेश के निधन की खबर सुनकर राज सन्न रह गए और उनके मुंह से निकल पड़ा- मैंने अपनी आवाज़ खो दी।


मुकेश ने गाने तो हर किस्म के गाये, मगर दर्द भरे गीतों की चर्चा मुकेश के गीतों के बिना अधूरी है। उनकी आवाज़ ने दर्द भरे गीतों में जो रंग भरा, उसे दुनिया कभी भुला नहीं सकेगी। "दर्द का बादशाह" कहे जाने वाले मुकेश ने 'अगर ज़िन्दा हूँ मै इस तरह से', 'ये मेरा दीवानापन है' (फ़िल्म यहुदी से), 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना' (फ़िल्म बन्दिनी से), 'दोस्त दोस्त ना रहा' (फ़िल्म सन्गम से), जैसे गानों को अपनी आवाज़ के जरिए दर्द में ड़ुबो दिया तो वही 'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार' (फ़िल्म अन्दाज़ से), 'जाने कहाँ गये वो दिन' (फ़िल्म मेरा नाम जोकर से), 'मैंने तेरे लिये ही सात रंग के सपने चुने' (फ़िल्म आनन्द से), 'कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है' (फ़िल्म कभी कभी से), 'चन्चल शीतल निर्मल कोमल' (फ़िल्म 'सत्यम शिवम सुन्दरम्' से) जैसे गाने गाकर प्यार के एहसास को और गहरा करने में कोई कसर ना छोड़ी। यही नहीं मकेश ने अपनी आवाज़ में 'मेरा जूता है जापानी' (फ़िल्म आवारा) जैसा गाना गाकर लोगों को सारा गम भूल कर मस्त हो जाने का भी मौका दिया। मुकेश द्वारा गाई गई 'तुलसी रामायण' आज भी लोगों को भक्ति भाव से झूमने को मजबूर कर देती है। क़रीब 200 से अधिक फ़िल्‍मो में आवाज़ देने वाले मुकेश ने संगीत की दुनिया में अपने आपको 'दर्द का बादशाह' तो साबित किया ही, इसके साथ साथ वैश्विक गायक के रूप में अपनी पहचान भी बनाई। 'फ़िल्‍म फ़ेयर पुरस्‍कार' पाने वाले वह पहले पुरुष गायक थे।


दर्द भरे नगमों के बेताज बादशाह मुकेश के गाए गीतों में जहां संवेदनशीलता दिखाई देती है वहीं निजी ज़िंदगी में भी वह बेहद संवेदनशील इंसान थे और दूसरों के दुख-दर्द को अपना समझकर उसे दूर करने का प्रयास करते थे। एक बार एक लड़की बीमार हो गई। उसने अपनी माँ से कहा कि अगर मुकेश उन्हें कोई गाना गाकर सुनाएं तो वह ठीक हो सकती है। माँ ने जवाब दिया कि मुकेश बहुत बड़े गायक हैं, भला उनके पास तुम्हारे लिए कहां समय है। अगर वह आते भी हैं तो इसके लिए काफ़ी पैसे लेंगे। तब उसके डॉक्टर ने मुकेश को उस लड़की की बीमारी के बारे में बताया। मुकेश तुरंत लड़की से मिलने अस्पताल गए और उसे गाना गाकर सुनाया। और इसके लिए उन्होंने कोई पैसा भी नहीं लिया। लड़की को खुश देखकर मुकेश ने कहा “यह लड़की जितनी खुश है उससे ज्यादा खुशी मुझे मिली है।”


पुरस्कार
1959 - फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार- सब कुछ सीखा हमनें (अनाड़ी)
1970 - फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार- सबसे बड़ा नादान वही है (पहचान)
1972 - फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार- जय बोलो बेइमान की जय बोलो (बेइमान)
1974 - नेशनल पुरस्कार- कई बार यूँ भी देखा है (रजनी गंधा)
1976 - फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार- कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है (कभी कभी)


 निधन-
मुकेश का निधन 27 अगस्त, 1976 को दिल का दौरा पड़ने के कारण संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ। मुकेश के गीतों की चाहत उनके चाहने वालों के दिलों में सदा जीवित रहेगी। उनके गीत हम सबके लिए प्रेम, हौसला और आशा का वरदान हैं। मुकेश जैसे महान गायक न केवल दर्द भरे गीतों के लिए, बल्कि वो तो हम सबके दिलों में सदा के लिए बसने के लिए बने थे। उनकी आवाज़ का अनोखापन, भीगे स्वर संग हल्की-सी नासिका लिए हुए न जाने कितने संगीत प्रेमियों के दिलों को छू जाती है। वो एक महान गायक तो थे ही, साथ ही एक बहुत अच्छे इंसान भी थे। वो सदा मुस्कुराते रहते थे और खुशी-खुशी लोगों से मिलते थे। इनके निधन पर राज कपूर ने कहा था- मेरी आवाज़ और आत्मा दोनों चली गई।


Mukesh Chand Mathur (22 July 1923 – 27 August 1976), better known mononymously as Mukesh, was an Indian playback singer of Hindi movies. Along with Mohammed Rafi, Manna Dey and Kishore Kumar, he was one of the most popular singers of his era. Amongst the numerous nominations and awards he won, his song "Kai Baar Yuhi Dekha Hai" from film Rajnigandha (1973) won him the National Film Award for Best Male Playback Singer. Mukesh was also popular as being the voice of the actor Raj Kapoor, Manoj Kumar, Feroz Khan and Sunil Dutt.



Mukesh was born in Delhi in a Hindi-speaking Kayastha Hindu family.His parents were Zorawar Chand Mathur, an engineer, and Chandrani Mathur. He was the sixth in a family of ten children. The music teacher who came home to teach Mukesh's sister, Sundar Pyari, found a pupil in Mukesh, who would listen from the adjoining room. Mukesh left school after the 10th grade and worked briefly for the Department of Public Works. He experimented with voice recordings during his employment in Delhi and gradually developed his singing abilities and also his musical instrumental skills.


Mukesh's voice was first noticed by Motilal, a distant relative, when he sang at his sister's wedding. Motilal took him to Mumbai and arranged for singing lessons by Pandit Jagannath Prasad. During this period Mukesh was offered a role as an actor-singer in a Hindi film, Nirdosh (1941). His first song was "Dil Hi Bujha Hua Ho To" as an actor-singer for Nirdosh. He got his break as a playback singer for actor Motilal in 1945 with the film Pehli Nazar with music composed by Anil Biswas and lyrics written by Aah Sitapuri. The first song that he sang for a Hindi film was "Dil Jalta Hai To Jalne De".


Mukesh was such a fan of singer K. L. Saigal that in his early years of playback singing he used to imitate his idol.[4][5] In fact, it is said that when K. L. Saigal first heard the song "Dil Jalta Hai...", he remarked, "That's strange, I don't recall singing that song".


Mukesh created his own singing style with the help of music director Naushad Ali, who helped Mukesh to come out of his Saigal style and create his own style. Naushad gave him songs for the film Andaz. Initially Mukesh was the ghost voice of Dilip Kumar in this movie and Mohammed Rafi sang for Raj Kapoor. He delivered many Hits for Naushad in films like: Anokhi Ada (1948), Mela (1948), Andaz (1949). Other composers who used Mukesh voice for great Dilip Kumar in Hit songs like Jeevan Sapna toot gaya were Anil Biswas in Anokha Pyar, Ye Mera Diwanapan hai, Shankar-Jaikishan in Yahudi and Suhana Safar and Dil Tadap Tadap ke, Salil Choudhary in Madhumati. However, later Dilip Kumar choose Rafi as his ghost voice and Mukesh became the ghost voice of Raj Kapoor. Mukesh recorded highest number of songs for Shankar Jaikishan ie 133 songs followed by kalyanji Anandji ie 99 songs . Out of 4 Filmfare awards, Mukesh won 3 awards for Shankar Jaikishan songs


In 1974, Mukesh received National Film Award for Best Male Playback Singer for the song "Kai Baar Yuhi Dekha Hai" from Rajnigandha (1974), and Filmfare Awards for the songs "Sab Kuch Seekha Humne" in the movie Anari (1959), "Sabse Bada Naadan Wahi Hai" in Pehchaan (1970), "Jai Bolo Beimaan Ki" in Beimaan (1972) (all the three songs composed by Shankar Jaikishan )and "Kabhi Kabhie Mere Dil Mein", the title song of film Kabhie Kabhie (1976)(composed by Khayyam). A total of around 1,300 songs were sung by him. This number is less than those sung by some of his contemporaries, but the fact is that Mukesh emphasised on quality rather than quantity. The comparatively fewer songs sung by him in the 1970s can be attributed to both the Kishore wave and his failing health due to his worsening heart problem.


Mukesh sang many songs for Kalyanji Anandji music director duo. Mukesh sang more songs with the K-A duo after Shankar Jaikishan. From "Naina hai jadoo bhare..." Bedard Zamana Kya Jane (1958) composed by Kalyanji alone as Kalyanji Virji Shah, and "Main hoon mast madari..." Madari (1959) as the first Kalyanji-Anandji-Mukesh combo, to "Chahe aaj mujhe napasand karo..." Darinda/ 1977, the K-A, Mukesh combination gave numerous popular songs like "Chhalia mera naam...", "Mere toote hue dil se...", "Dum dum diga diga" Chalia(1959), "Mujhko iss raat ki tanhai mein..." Dil Bhi Tera Hum Bhi Tere (1960), "Hum chhod chale hain mehfil ko..." (Ji Chahta Hai), "Humne tumko pyar kiya hai jitna..." (Dulha Dulhan), "Chal mere dil lehraake chal..." Ishara and "Dheere se chalo..." Johar Mehmood in Goa,"Main to ek khwab hoon..." and "Chand si mehbooba ho..." Himalay Ki Godmein(1965),"Waqt kartaa jo wafaa..." Dil Ne Pukara,"Deewanon se yeh mat poocho..." Upkar, "Khush raho har khushi hai..." Suhaag Raat and "Humsafar ab yeh safar kat jaayega..." Juari, "Chandi ki deewaar..." and "Le chal le chal mere jeevan saathi..." Vishwas (1969), "Koi jab tumhara hriday tod de..." Purab Aur Paschim, "Darpan ko dekha..." Upaasna, "Jo tumko ho pasand..." Safar and "Mujhe nahin poochni tumse beeti baatein..." Anjaan Raahein (1970).


Out of the numerous songs he gave his voice to,Kahin door jab din dhal Jaaye from Anand(1971),Ek Pyaar ka Nagma hai from Shor(1972),Maine Tere Liye Hi Saat Rang Ke from Anand(1972),Sab Kuch Seekha Humne from Anari(1959),Jeena yahan marna yahan and Kehta hai Joker from Mera Naam Joker(1970) are the most popular among his fans and followers.


Mukesh started his career as an actor singer in the film 'Nirdosh' in 1941, with Nalini Jaywant as his heroine. His second film was 'Adab Arz' in 1943. He played a guest role in Raj Kapoor's film 'Aah' in 1953. He acted as a hero in the film 'Mashooka' in 1953, opposite Suraiya and in the film 'Anurag' (1956} (he was also the co-producer and composer in the film), opposite Usha Kiran and Mridula. Mukesh also produced a film " Malhar " (1951) with hero Arjun & heroine Shammi under "Darling Film" .


Mukesh married Saral Trivedi alias Bachhiben, daughter of Raichand Trivedi. Saral's father was a Gujarati Brahmin millionaire. With no proper house, an erratic income and what was then considered in India a supposedly "immoral" profession (singer in movies), the consent of Saral's father for this marriage could not be obtained and Mukesh and Saral were forced to elope. They got married in a temple in Kandivali on 22 July 1946, Mukesh's 23rd birthday, with the help of the actor Motilal and from the residence of R. D. Mathur. Everyone made dire predictions of unhappy days and divorce, but both weathered the lean days and celebrated their thirtieth wedding anniversary on 22 July 1976, four days before his departure for the USA The couple had five children – Rita, the singer Nitin, Nalini (d. 1978), Mohnish and Namrata (Amrita). The actor Neil Nitin Mukesh is a grandson of Mukesh (son of Nitin).



Mukesh died of a heart attack on 27 August 1976 in Detroit, Michigan, US, where he had gone to perform in a concert. That morning, he got up early and went to take a shower. He came out panting and complaining of chest pains. He was rushed to a hospital but was pronounced dead. The rest of the concert was completed by Lata Mangeshkar and surprisingly his son Nitin Mukesh . His body was flown to India by Lata Mangeshkar, where a grand funeral ceremony was held in the presence of several actors, with personalities of the Indian film industry and fans paying tribute. When news of his death reached Raj Kapoor, he burst into tears, and remarked, "I have lost my voice,"[citation needed] which is a testimony to the association of Mukesh's voice (in playback) to the immensely popular songs of Raj Kapoor's films. A famous song of the 50's featured on Bharat Bhushan Aa laut ke aa ja mere meet is another example of his earlier melodies, as is Dil tadap tadapke keh raha hai, picturised on Dilip Kumar.


After Mukesh's death, his newer, hitherto unreleased, songs were released in 1977 in films such as Dharam Veer, Amar Akbar Anthony, Khel khiladi ka, Darinda and Chandi sona. The year 1978 also featured a considerable number of Mukesh's songs in films such as Aahuti, Paramatma, Tumhari kasam and Satyam Shivam Sundaram, where Mukesh sang his last film song Chanchal sheetal nirmal komal for Raj Kapoor's younger brother, Shashi Kapoor. From 1980 onward, Mukesh's voice was heard in many later released films such as Shaitan mujarim, Premika, Patthar se takkar (1980), Sanjh ki bela, Maila anchal (1981), Aarohi (1982), Chor mandali (1983), Nirlaj (1985), Love and God (1986), Shubh chintak (1989), and his last known release of Chand grahan .


Awards
National Film Awards



1974 – National Film Award for Best Male Playback Singer for the song "Kai Baar Yuhi Dekha Hai" from the film Rajnigandha



Filmfare Awards

1959 "Sab Kuch Seekha Humne" Anari Shankar Jaikishan Shailendra
1970 "Sabse Bada Naadan" Pehchan Shankar Jaikishan Varma Malik
1972 "Jai Bolo Beimaan Ki" Be-Imaan Shankar Jaikishan Varma Malik
1976 "Kabhi Kabhie Mere Dil Mein" Kabhi Kabhie Khayyam Sahir Ludhianvi



Nominated
Year Song Film Music director(s) Lyricist
1962 "Hothon Pe Sacchai Rehti Hai" Jis Desh Men Ganga Behti Hai Shankar Jaikishan Shailendra
1965 "Dost Dost Na Raha" Sangam Shankar Jaikishan Shailendra
1968 "Sawan Ka Mahin" "Milan" Laxmikant Pyarelal Anand Bakshi
1971 " "Bas Yehi Apradh" "Pehchan" Shankar Jaikishan Neeraj



Bengal Film Journalists' Association Awards Winner


1967 – Best Male Playback Singer for Teesri Kasam
1968 – Best Male Playback Singer for Milan
1970 – Best Male Playback Singer for Saraswatichandra



Filmography
Nirdosh (1941)
Pehli Nazar (1945)
Mela (1948)
Aag (1948)
Sohag Raat (1948)
Vidya (1948)
Anokhi Ada (1949)
Andaz (1949)
Awaara (1951)
Aah (1953)
Barsaat (1949)
Shree 420 (1955)
Anuraag (1956)
Parvarish (1958)
Phir Subah Hogi (1958)
Anari (1959)
Jis Desh Mein Ganga Behti Hai (1960)
Chhalia (1960)
Bombai Ka Babu (1960)
Hum Hindustani (1960)
Banjarin (1960)
Mera Ghar Mere Bachche (1960)
HoneyMoon (1960)
Phool Bane Angarey (1962)
Aashiq (1962)
Rajnigandha (1974)
Ek Dil Sau Afsane (1963)
Dil Hi To Hai (1963)
Akeli Mat Jaiyo (1963)
Parasmani (1963)
Dil Chahta Hai (1964)
Sangam (1964)
Ishaara (1964)
Chhoti Chhoti Baten (1965)
Himalay Ki Godmein (1965)
Lal Bungla (1966)
Teesri Kasam (1966)
Boond Jo Ban Gayee Moti (1967)
Gunaho Ka devta (1967)
Raat Aur Din (1967)
Saraswatichandra (1968)
Sambandh (1969)
Vishwas (1969)
Kati Patang (1970)
Holi Ayee Re (1970)
Mera Naam Joker (1970)
Anand (1971)
Ek Bar Mooskura Do (1972)
Shor (1972)
Roti Kapda Aur Makaan (1974)
Dharam Karam (1975)
Dus Numbari (1975)
Sanyasi (1975)
Do Jasoos (1975)
Chhoti Si Baat (1975)
Dharmatma (1975)
Kabhi Kabhie (1976)
Darinda (1977)
Dharam Veer (1977)
Satyam Shivam Sundaram (1978)
Chand Grahan (1998)
Today's Special (2009)