रामकिंकर उपाध्याय ( जन्म: 1 नवम्बर, 1924)

November 01, 2017

रामकिंकर उपाध्याय ( जन्म: 1 नवम्बर, 1924 - मृत्यु: 9 अगस्त, 2002) भारत के मानस मर्मज्ञ, कथावाचक एवं हिन्दी साहित्यकार थे। इन्हें सन 1999 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था।


जीवन परिचय
रामकिंकर उपाध्याय का जन्म 1 नवम्बर 1924 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था। ये जन्म से ही होनहार व प्रखर बुद्धि के थे। इनकी शिक्षा-दीक्षा जबलपुर व काशी में हुई। रामकिंकर उपाध्याय स्वभाव से ही अत्यन्त संकोची एवं शान्त प्रकृति के बालक थे। ये बचपन से ही अपनी अवस्था के बच्चों की अपेक्षा कुछ अधिक गम्भीर हुआ करते थे। बाल्यावस्था से ही इनकी मेधाशक्ति इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट एवं गम्भीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन में ही स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। प्रारम्भ से ही पृष्ठभूमि के रूप में रामकिंकर उपाध्याय पर अपने माता-पिता के धार्मिक विचार एवं संस्कारों का प्रभाव था।


रामकिंकर जी आचार्य कोटि के संत थे। सारा विश्व जानता है कि रामायण की मीमांसा जिस रूप में उन्होंने की वह अद्वितीय थी। परन्तु स्वयं रामकिंकर जी ने अपने ग्रंथों में, प्रवचनों में या बातचीत में कभी स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने कोई मौलिक कार्य किया है। वे हमेशा यही कहते रहे कि मौलिक कोई वस्तु नहीं होती है भगवान जिससे जो सेवा लेना चाहते हैं वह ले लेते हैं वस्तु या ज्ञान जो पहले से होता है व्यक्ति को केवल उसका सीमित प्रकाशक दिखाई देता है, दिखाई वही वस्तु देती है जो होती है जो नहीं थी वह नहीं दिखाई जा सकती है। वह कहते हैं कि रामायण में वे सूत्र पहले से थे, जो लोगों को लगते हैं कि मैंने दिखाए या बोले, पर सत्य नहीं है। उनका वह वाक्य उनकी और ईश्वर की व्यापकता को सिद्ध करता है।


रामकिंकर जी आचार्य की ज्ञान-विज्ञान पथ में जितनी गहरी पैठ थी, उतना ही प्रबल पक्ष भक्ति साधना का उनके जीवन में दर्शित होता था। वैसे तो अपने संकोची स्वभाव के कारण इन्होंने अपने जीवन की दिव्य अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन अपने श्रीमुख से बहुत आग्रह के बावजूद नहीं किया। पर कहीं-कहीं उनके जीवन के इस पक्ष की पुष्टि दूसरों के द्वारा जहाँ-तहाँ प्राप्त होती रही। उसी क्रम में उत्तराखण्ड की दिव्य भूमि ऋषिकेश में हनुमानजी महाराज का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, निष्काम भाव से किए गए, एक छोटे से अनुष्ठान के फलस्वरूप हुआ। वैसे ही चित्रकूट धाम की दिव्य भूमि में अनेकानेक अलौकिक घटनाएँ परम पूज्य महाराजश्री के साथ घटित हुईं। जिनका वर्णन महाराजश्री के निकटस्थ भक्तों के द्वारा सुनने को मिला। परमपूज्य महाराजश्री अपने स्वभाव के अनुकूल ही इस विषय में सदैव मौन रहे।


एक शिष्य ने परमपूज्यपाद रामकिंकर जी से कहा... महाराज! मुझे यह भजन करना झंझट सा लगता है, मैं छोड़ना चाहता हूँ इसे! उदार और सहज कृपालु महाराजश्री उस शिष्य की ओर करुणामय होकर बोले... छोड़ दो भजन! मैं तुमसे सहमत हूँ। स्वाभाविक है कि झंझट न तो करना चाहिए और न ही उसमें पड़ना चाहिए पर मेरा एक सुझाव है जिसे ध्यान रखना कि फिर जीवन में कोई और झंझट भी मत पालना क्योंकि तुम झंझट से बचने की इच्छा रखते हो और कहीं भजन छोड़ कर सारी झंझटों में पड़ गए तो जीवन में भजन छूट जायेगा और झंझट में फँस जाओगे और यदि भजन नहीं छूटा तो झंझट भी भजन हो जाएगा तो अधिक अच्छा यह है कि इतनी झंझटें जब हैं ही तो भजन की झंझट भी होती रहे।


रामकिंकर उपाध्याय ने 9 अगस्त 2002 को अपना पञ्च भौतिक देह का त्याग कर दिया। इस 78 वर्ष के अन्तराल में इन्होंने रामचरितमानस पर 49 वर्ष तक लगातार प्रवचन दिये थे।


राम किंकर उपाध्याय भारतीय शास्त्रों के विख्यात विद्वान और पद्म भूषण के प्राप्तकर्ता हैं - भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार - 1999 में। वह उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उनका जन्म 1 नवंबर 1924 को जबलपुर में हुआ था। वह यूपी के गांव बरैनी का रहने वाला था। नरेंद्र उपाध्याय, बिजेंद्र उपध्याय, हेमंत उपाध्याय, नीरज उपाध्याय, प्रिंस उपाध्याय, राधे मोहन उपाध्याय उनके परिजन हैं और उनकी शिक्षाओं के महान अनुयायी हैं। उन्होंने 9 अगस्त 2002 को अपने स्वर्गीय निवास के लिए प्रस्थान किया। 19 वर्ष की आयु से, उन्होंने लिखना शुरू किया और 59 वर्षों में एक शानदार कैरियर के बारे में 92 पुस्तकें लिखीं- मुख्य रूप से रामचरितमानस पर। वह प्रतिद्वंद्वी दृष्टिकोण रखने वाले किसी भी व्यक्ति को परेशान या अपमान किए बिना अपनी बात रखता था।


अब उनके विचारों और उपदेशों को उनके शीश उमाशंकर ब्यास और मैथिलीशरण (उर्फ भाई जी) ने आगे बढ़ाया है। उमाशंकर ने 13 वर्ष की आयु में गुरजिएफ की चरण वंदना (भक्ति) में अपना घर छोड़ दिया। बाद में उमाशंकर के साले भाई जी भी शामिल हुए। उन्होंने पूज्य रामकिंकर उपाध्याय के विचारों को फैलाने के लिए एक वेबसाइट शुरू करने में योगदान दिया है। 'किंकर' शब्द 'रामचरितमानस' से लिया गया है। इसका अर्थ है, जो परमेश्वर की सेवा करने के लिए चुना जाता है।


पुस्तकें और प्रवाचन:


Manas Charitavali
Manas Muktavali
Sugreev aur Vibhishan
krodh
Vijay, Vivek aur Vibhooti
Premmurti Bharat
Krupa
Parashuram Samvad
Bhagwan Shriram Satya ya Kalpana
Navdha Bhakti
Manas Pravachan many many more ...