मोहम्मद इक़बाल (जन्म- 9 नवम्बर, 1877)

November 09, 2017

मोहम्मद इक़बाल (जन्म- 9 नवम्बर, 1877, सियालकोट, पंजाब, ब्रिटिश भारत; मृत्यु- 21 अप्रैल, 1938) एक आधुनिक भारतीय प्रसिद्ध मुसलमान कवि थे। इक़बाल ने अपनी अधिकांश रचनाएँ फ़ारसी में की हैं। "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" यह मशहूर गीत इक़बाल का ही लिखा हुआ है। मोहम्मद इक़बाल का यह मत था कि इस्लाम धर्म रूहानी आज़ादी की जद्दोजहद के जज़्बे का अलमबरदार है, और सभी प्रकार के धार्मिक अनुभवों का निचोड़ है। वह कर्मवीरता का एक जीवन्त सिद्धान्त है, जो जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है।


मोहम्मद इक़बाल का जन्म ब्रिटिश भारत के समय पंजाब के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था। इनके पिता का नाम शेख़ नूर मोहम्मद था, जो कि पेशे से एक दर्जी थे। औपचारिक रूप से ये शिक्षित भी नहीं थे, लेकिन स्वभाव से ये बहुत ही धार्मिक व्यक्ति थे। इक़बाल की माता का नाम इमाम बीबी था, जो बहुत ही विनम्र स्वभाव की महिला थीं। ये हमेशा ही ग़रीबों तथा अपने पड़ोसियों की मदद और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर रहती थीं। 9 नवम्बर, 1914 ई. को इमाम बीबी को निधन सियोलकोट में हो गया।


मोहम्मद इक़बाल ने तीन विवाह किये थे। इनका प्रथम विवाह करीम बीबी के साथ हुआ, जो एक गुजराती चिकित्सक ख़ान बहादुर अता मोहम्मद ख़ान की पुत्री थीं। इससे इक़बाल एक पुत्री मिराज बेगम और पुत्र आफ़ताब इक़बाल के पिता बनें। इसके बाद इक़बाल ने दूसरा विवाह सरदार बेगम के साथ किया, इससे इन्हें पुत्र जाविद इक़बाल की प्राप्ति हुई। दिसम्बर 1914 में इक़बाल ने तीसरा विवाह मुख़्तार बेगम के साथ किया।


दूरदर्शी व्यक्तित्व इक़बाल ब्रिटेन और जर्मनी में पढ़ने के बाद हिन्दुस्तानी सरज़मीं पर लौटे आये थे। आज के दौर में पूरे मुल्क में भ्रष्टाचार और दूसरी मुश्किलात को लेकर जो आवामी जंग छिड़ी हुई है, उसका अंदेशा इक़बाल ने पहले ही लगा लिया था और लिखा था-


"वतन की फ़िक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के चर्चे हैं आसमानों में,
ना संभलोगे तो मिट जाओगे ए हिंदोस्तां वालों
तुम्हारी दास्तां भी न होगी दास्तानों में।"


यूरोप धन और सत्ता के लिए पागल है। इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, जो सच्चे जीवन मूल्यों का निर्माण कर सकता है और अनवरत संघर्ष के द्वारा प्रकृति के ऊपर मनुष्य को विजयी बना सकता है। उनकी रचनाओं ने भारत के मुसलमान युवकों में यह भावना भर दी कि, उनकी एक पृथक भूमिका है। इक़बाल ने ही सबसे पहले 1930 ई. में भारत के सिंध के भीतर उत्तर-पश्चिम सीमाप्रान्त, बलूचिस्तान, सिंध तथा कश्मीर को मिलाकर एक नया मुस्लिम राज्य बनाने का विचार रखा, जिसने पाकिस्तान को जन्म दिया। पाकिस्तान शब्द इक़बाल का गढ़ा हुआ नहीं है। इसे 1933 ई. में 'चौधरी रहमत अली' ने गढ़ा था। इक़बाल की काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'सर' की उपाधि प्रदान की।


मशहूर शायर 'मनुव्वर राना' का कहना है कि इक़बाल के जेहन में हमेशा वह हिन्दुस्तान था, जो किसी सरहद में नहीं बँटा था। वह कहते हैं कि ‘जिस तरह भगत सिंह के हिन्दुस्तान में पूरा हिन्दुस्तान शामिल था, उसी तरह इक़बाल के हिन्दुस्तान में भी पूरा हिन्दुस्तान शामिल था।’ दूसरी ओर अन्य मशहूर शायर 'निदा फ़ाज़ली' कहते हैं कि इक़बाल बाद में पाकिस्तान के ही हिमायती बनकर रह गये थे। इक़बाल की क़ब्र पर अपने संस्मरण की याद करते हुए वह कहते हैं कि आज पाकिस्तान में इक़बाल को पूजा जाने लगा है और लोग उनकी क़ब्र पर आकर दुआएँ मांगने लगे हैं। वह शायर कम और पीर ज़्यादा बन गये हैं। ऐसा क्या हुआ कि जहाँ एक ओर उन्होंने लिखा ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ तो वहीं दूसरी ओर एक अलग मुस्लिम राज्य बनाने का विचार भी उन्होंने ही रखा। वहाँ उनका लिखा ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’, कौमी तराना बन गया।


मुरादाबाद के शायर मंसूर उस्मानी कहते हैं कि यह बदकिस्मती है कि इक़बाल को सिर्फ़ मुसलमान शायर की तरह देखा गया। वह कहते हैं कि इक़बाल सिर्फ़ इंसानियत के तरफ़दार थे ना कि किसी एक मुल्क या मज़हब के। इक़बाल ने 1909 ई. में ‘शिकवा’ की रचना की, जिसमें उन्होंने मुसलमानों के ख़राब आर्थिक हालात की ख़ुदा से शिकायत की है। इनके द्वारा लिखी गईं रचनाएँ मुख्य रूप से फ़ारसी में हैं। इनकी अंग्रेज़ी में केवल एक पुस्तक है, जिसका शीर्षक है, 'सिक्स लेक्चर्स ऑन दि रिकन्सट्रक्शन ऑफ़ रिलीजस थॉट (धार्मिक चिन्तन की नवव्याख्या के सम्बन्ध में छह व्याख्यान)' है।


मोहम्मद इक़बाल का निधन 21 अप्रैल, 1938 ई. को हुआ।


Sir Muhammad Iqbal (Urdu: محمد اِقبال‬‎) (November 9, 1877 – April 21, 1938), widely known as Allama Iqbal, was a poet, philosopher, and politician, as well as an academic, barrister and scholar in British India who is widely regarded as having inspired the Pakistan Movement. He is called the "Spiritual Father of Pakistan "  He is considered one of the most important figures in Urdu literature, with literary work in both Urdu and Persian.


Iqbal is admired as a prominent poet by Indians, Pakistanis, Iranians and other international scholars of literature. Though Iqbal is best known as an eminent poet, he is also a highly acclaimed "Muslim philosophical thinker of modern times". His first poetry book, The Secrets of the Self, appeared in the Persian language in 1915, and other books of poetry include The Secrets of Selflessness, Message from the East and Persian Psalms. Amongst these, his best known Urdu works are The Call of the Marching Bell, Gabriel's Wing, The Rod of Moses and a part of Gift from Hijaz.[8] Along with his Urdu and Persian poetry, his Urdu and English lectures and letters have been very influential in cultural, social, religious and political disputes.


In 1923, he was knighted by King George V, granting him the title "Sir". While studying law and philosophy in England, Iqbal became a member of the London branch of the All-India Muslim League. Later, during the League's December 1930 session, he delivered his most famous presidential speech known as the Allahabad Address in which he pushed for the creation of a Muslim state in northwest India.


In much of South Asia and the Urdu speaking world, Iqbal is regarded as the Shair-e-Mashriq (Urdu: شاعر مشرق‬‎, "Poet of the East").He is also called Mufakkir-e-Pakistan (Urdu: مفکر پاکستان‬‎, "The Thinker of Pakistan"), Musawar-e-Pakistan (Urdu: مصور پاکستان‬‎, "Artist of Pakistan") and Hakeem-ul-Ummat (Urdu: حکیم الامت‬‎, "The Sage of the Ummah"). The Pakistan government officially named him "National Poet of Pakistan".His birthday Yōm-e Welādat-e Muḥammad Iqbāl (Urdu: یوم ولادت محمد اقبال‬‎), or Iqbal Day, is a public holiday in Pakistan.


Sir Muhammad Iqbal's house is still located in Sialkot and is recognized as Iqbal's Manzil and is open for visitors.