हरगोबिन्द खुराना (मृत्यु: 9 नवंबर, 2011)

November 09, 2017

हरगोबिन्द खुराना (जन्म: 9 जनवरी, 1922; मृत्यु: 9 नवंबर, 2011) भारत में जन्मे अमेरिकी जैव रसायनशास्त्री थे। इन्हें 1968 में शरीर विज्ञान या चिकित्सा के क्षेत्र में मार्शल डब्ल्यू. नीरेनबर्ग और रॉबर्ट डब्ल्यू. हॉली के साथ उस अनुसंधान के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। इस अनुसंधान से पता लगाने में मदद मिली कि कोशिका के आनुवंशिक कूट (कोड) को ले जाने वाले न्यूक्लिक अम्ल (एसिड) न्यूक्लिओटाइड्स कैसे कोशिका के प्रोटीन संश्लेषण (सिंथेसिस) को नियंत्रित करते हैं।


खुराना का जन्म 9 जनवरी 1922 रायपुर, ब्रिटिशकालीन भारत में हुआ था। इनका जन्म एक ग़रीब परिवार में हुआ था। इन्होंने लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय और सरकारी छात्रवृत्ति पर लिवरपूल यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड में शिक्षा ग्रहण की।


इन्होंने सर अलेक्ज़ेंडर टॉड के तहत केंब्रिज यूनिवर्सिटी (1951) में शिक्षावृत्ति के दौरान न्यूक्लिक एसिड पर अनुसंधान शुरू किया। वह स्विट्ज़रलैंड में स्विस फ़ेडरल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी और ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा (1952-1959) एवं विंस्कौंसिल, अमेरिका में फ़ेलो और प्राध्यापक पदों पर रहें। 1971 में उन्होंने मैसेच्यूसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के संकाय में कार्यभार संभाला।


1960 के दशक में खुराना ने नीरबर्ग की इस खोज की पुष्टि की कि डी.एन.ए. अणु के घुमावदार 'सोपान' पर चार विभिन्न प्रकार के न्यूक्लिओटाइड्स के विन्यास का तरीका नई कोशिका की रासायनिक संरचना और कार्य को निर्धारित करता है। डी.एन.ए. के एक तंतु पर इच्छित अमीनोअम्ल उत्पादित करने के लिए न्यूक्लिओटाइड्स के 64 संभावित संयोजन पढ़े गए हैं, जो प्रोटीन के निर्माण के खंड हैं। खुराना ने इस बारे में आगे जानकारी दी कि न्यूक्लिओटाइड्स का कौन सा क्रमिक संयोजन किस विशेष अमीनो अम्ल को बनाता है। उन्होंने इस बात की भी पुष्टि की कि न्यूक्लिओटाइड्स कूट कोशिका को हमेशा तीन के समूह में प्रेषित किया जाता है, जिन्हें प्रकूट (कोडोन) कहा जाता है। उन्होंने यह भी पता लगाया कि कुछ प्रकूट कोशिका को प्रोटीन का निर्माण शुरू या बंद करने के लिए प्रेरित करते हैं।


खुराना ने 1970 में आनुवंशिकी में एक और योगदान दिया, जब वह और उनका अनुसंधान दल एक खमीर जीन की पहली कृत्रिम प्रतिलिपि संश्लेषित करने में सफल रहे। डॉक्टर खुराना अंतिम समय में जीव विज्ञान एवं रसायनशास्त्र के एल्फ़्रेड पी. स्लोन प्राध्यापक और लिवरपूल यूनिवर्सिटी में कार्यरत रहे।


हरगोबिन्द खुराना का निधन 9 नवंबर, 2011 को हुआ था।


Har Gobind Khorana (9 January 1922 – 9 November 2011), was an Indian American biochemist who shared the 1968 Nobel Prize for Physiology or Medicine with Marshall W. Nirenberg and Robert W. Holley for research that showed how the order of nucleotides in nucleic acids, which carry the genetic code of the cell, control the cell’s synthesis of proteins. Khorana and Nirenberg were also awarded the Louisa Gross Horwitz Prize from Columbia University in the same year.


Khorana was born in Raipur, British India (today Tehsil Kabirwala, Punjab, Pakistan). He was the youngest of five children of Ganpat Rai Khorana, a taxation clerk and Krishna Devi Khorana. He served on the faculty of the University of British Columbia from 1952-1960, where he initiated his Nobel Prize winning work. He became a naturalized citizen of the United States in 1966, and subsequently received the National Medal of Science. He co-directed the Institute for Enzyme Research, became a professor of biochemistry in 1962 and was named Conrad A. Elvehjem Professor of Life Sciences at University of Wisconsin–Madison. He served as MIT's Alfred P. Sloan Professor of Biology and Chemistry, Emeritus and was a member of the Board of Scientific Governors at The Scripps Research Institute.


Ribonucleic acid pro (RNA) with three repeating units (UCUCUCU → UCU CUC UCU) produced two alternating amino acids. This, combined with the Nirenberg and Leder experiment, showed that UCU codes for Serine and CUC codes for Leucine. RNAs with three repeating units (UACUACUA → UAC UAC UAC, or ACU ACU ACU, or CUA CUA CUA) produced three different strings of amino acids. RNAs with four repeating units including UAG, UAA, or UGA, produced only dipeptides and tripeptides thus revealing that UAG, UAA and UGA are stop codons.


With this, Khorana and his team had established that the mother of all codes, the biological language common to all living organisms, is spelled out in three-letter words: each set of three nucleotides codes for a specific amino acid. Their Nobel lecture was delivered on 12 December 1968.Khorana was the first scientist to chemically synthesize oligonucleotides.


Khorana was elected as Foreign Member of the Royal Society (ForMemRS) in 1978.The University of Wisconsin-Madison, the Government of India (DBT Department of Biotechnology), and the Indo-US Science and Technology Forum jointly created the Khorana Program in 2007. The mission of the Khorana Program is to build a seamless community of scientists, industrialists, and social entrepreneurs in the United States and India.


The program is focused on three objectives: Providing graduate and undergraduate students with a transformative research experience, engaging partners in rural development and food, security, and facilitating public-private partnerships between the U.S. and India. In 2009, Khorana was hosted by the Khorana Program and honored at the 33rd Steenbock Symposium in Madison, Wisconsin.
Khorana died of natural causes on 9 November 2011 in Concord, Massachusetts, aged 89. A widower since 2001, he was survived by his children Julia and Davel.