इबने अरबी (मृत्यु: 10 नवंबर, 1240 ई.)

November 10, 2017

इबने अरबी (  जन्म: 28 जुलाई, 1165 ई.; मृत्यु: 10 नवंबर, 1240 ई.) अरबी के प्रसिद्ध सूफी कवि, साधक और विचारक थे। इबने अरबी के सम्बन्ध में लोगों की अलग-अलग धारणाएं हैं। कुछ व्यक्तियों के विचार से वे सन्न्यासी (वली कामिल) थे और अध्यात्म् पर उनका पूर्ण अधिकार था, जिसमें किसी की कोई आपत्ति नहीं हो सकती। दूसरी ओर एक ऐसा समुदाय भी था, जो उन्हें नास्तिक समझता था। इबने अरबी की पुस्तकों के सम्बन्ध में आज भी ऐसी ही परस्पर विरोधी धारणाएं प्रचलित हैं। ये 'शेखुल अकबर' के नाम से भी प्रसिद्ध है।


जीवन परिचय
17 रमजान सन् 560 हिजरी (28 जुलाई, 1165 ई.) मरसिया में पैदा हुए थे, जो उन्दलुस के दक्षिण पूर्व में स्थित है। उनका सम्बन्ध अरब के एक प्राचीन कबीले 'तय' से था। जगत विख्यात दानी 'हातिमताई' इसी कबीले के थे। सन 568 हिजरी में इबने अरबी (अशबीलिया) चले गए, जो उन दिनों विद्या और साहित्य का बहुत बड़ा केन्द्र था। यहाँ वे तीस साल तक उस समय के जाने माने विद्वान से ज्ञान प्राप्ति करते रहे। 38 वर्ष की आयु में वे पूर्वी देश चले गए और वहाँ से फिर कभी स्वदेश नहीं लौटे। सबसे पहले वे मिस्र पहुँचे और कुछ समय वहाँ व्यतीत किया। फिर समीपस्थ पूर्व और एशियाई कोचक (तुर्की) की लम्बी यात्रा में व्यस्त हो गए और इस सिलसिले में बैतुलमकदिस (पोरशलम) मक्का, बगदाद और हलब गए। अन्त में उन्होंने दमिश्क में स्थाई रूप से रहना प्रारम्भ कर दिया और वहीं पर सन् 638 हिजरी (1240 ई.) में उनका देहान्त हो गया। उन्हें कासीउन पर्वत में दफन कर दिया गया।


इबने अरबी की रचनाओं की संख्या और उनके खंडों के बारे में कुछ भी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता। अब्दुर्रहमान जामी ने, एक बगदाद वासी वृद्ध सज्जन के कथनानुसार, इबने अरबी की पुस्तकों की संख्या 580 से अधिक बताई है और मिस्र के विद्वान मुहम्मद रजब हिल्मी ने इनकी संख्या 284 आंकी है। इनकी कृतियों की विश्वसनीय संख्या आमतौर पर अधिक से अधिक 150 के क़रीब मानी जाती है। इबने अरबी ने अपनी रचनाओं का जो भंडार छोड़ा है, वह उस समय की सभी इस्लामिक शिक्षाओं को अपने में समेटे हुए हैं, परन्तु अधिकतर पुस्तकों का विषय सूफीवाद (तसब्बुफ) है। इन सभी पुस्तकों को समय की दृष्टि से क्रमबद्ध करना अत्यन्त कठिन है। इनमें से 'फुतुहोत-मक्कीया' अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, जो उनके परिपक्व मस्तिष्क का दर्पण है। उनके लिखने का ढंग प्रतीकात्मक और व्याख्या अत्यन्त गूढ़ है। कहीं-कहीं जान बूझकर कुछ बातों को उन्होंने दुर्बोध बनाने का प्रयास किया है। ऐसा इसलिए कि वे अपने बहदतुलवुजुदी के सिद्धांत को लोगों से छिपा सकें। फलत: इस्लामिक संसार में उनके सिद्धांतों के विषय में विरोधाभास पाया जाता है।


दार्शनिक दृष्टि से इनका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण योगदान सार्वभौम मानव के प्रत्यय का परिमार्जन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह संप्रत्यय सूफियों की कृतियों में शनै: शनै: पहले से ही प्रकट होने लग गया था। सार्वभौम (इन्सान-ए-कामिल) मानव का यह संप्रत्यय लोगोस के नव्य प्लोटोनिक प्रत्यय की भांति ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है एवं जगत् व ईश्वर के बीच मध्यस्थ शक्ति के रूप में क्रियाशील होने में सक्षम है। इस प्रकार सार्वभौम मानव ब्रह्मांड एवं मानव के मूल रूप का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक नमूना या आदर्श प्रस्तुत करता है, जिसके अनुरूप हो पाने के लिए मानव सतत प्रयत्नशील रह सकता है।


इनकी कृतियों में बहुत से पूर्ववर्ती महत्त्वपूर्ण दार्शनिकों एवं वैचारिक गतिविधियों के प्रभाव दिखते हैं। ये विशेष रूप से प्लेटो, अरस्तु, प्लाटीनस एवं नव्य प्लेटोवादियों से प्रभावित थे। इन्होंने अपने समय के अंधविश्वासपूर्ण धर्मशास्त्र को दर्शन से सम्बद्ध करने का प्रयास किया है। इनके द्वारा वर्णित सत्ता के घटक रूप एवं भाव हैं, जो अरस्तु के उपादान एवं आकार से सादृश्य रखते हैं। मानव ईश्वर को प्रतिबिम्बित करता है, जिसमें वह अपने को जैसा वह है, देख सकता है। ईश्वर के स्वभाव को प्रतिबिम्बित करने की यह स्थिति नितांत अपूर्ण प्रतिबिम्बों से पूर्ण मानवों तथा दूसरे देवदूतों, संतों आदि द्वारा सम्पन्न नितांत पूर्ण प्रतिबिम्बों तक विस्तृत है। ये अद्वैतावाद में पक्का विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे, जिसके अनुसार ईश्वर एवं जगत् निरपेक्ष सत्ता के दो सह-सम्बन्धी एवं पूरक तत्व हैं। इबने अरबी के पूर्व एक दूसरे महान सूफी मंसूर ने 'मैं सत्य (एक मात्र) हूँ' का उद्घोष किया था और इस उद्घोष के लिए उनकी हत्या कर दी गई थी, क्योंकि अंधविश्वासियों के अनुसार उनका यह उद्घोष एक ईश्वर निंदात्मक कथन था। इबने अबरी मंसूर के विचारों से सहमत नहीं हो सके, क्योंकि इनके अनुसार वे विचार प्रतिपाद्य नहीं थे। इनके अनुसार मानव अपूर्ण एवं सीमित है एवं ईश्वर पूर्ण एवं असीमित है और मानव केवल 'एक सत्य' हो सकता है, 'एक मात्र सत्य' नहीं।


दान्ते के स्वर्गारोहण के वर्णन को ध्यान में रखते हुए यह बहुतों का ख्याल है कि अरबी के काव्यात्मक तत्वशास्त्रीय सूफीवाद ने दान्ते को प्रभावित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि दान्ते का यह वर्णन जिसमें उन्होंने नक्षत्र शास्त्रीय सिद्धांतों को मुहम्मद की स्वर्ग यात्रा से सम्बद्ध किया है। मुस्लिम मताबलंबियों के एक महत्त्वपूर्ण विश्वास का घटक है। अपने विश्वदेवतावादी सिद्धांतों में इन्होंने मानव को दैनिक सार का अंकुर माना है, जो वास्तव में ईश्वर की ज्ञातव्य होने की इच्छा के कारण अस्तित्व में है। दैनिक सत्ता को अनुभव किये जाने की प्रक्रिया में चिन्तशील मानव अपने ही व्यक्तित्व में ब्रह्मांड की संरचना को प्रतिबिम्बित करता है। 'लोगोस' के सिद्धांत का उपयोग करते हुए इन्होंने उसको ब्रह्मांड में एक सृजनात्मक तत्व के रूप में स्वीकार किया है और उसका तादात्म्य मुहम्मद के आत्मन् से स्थापित किया है।


इनकी कृतियां अंधविश्वासी धर्मशास्त्रियों द्वारा पूर्णरूप से उपेक्षित रहीं, तथापि इन्होंने परसियन रहस्यवादी कवियों तथा जमालउद्दीन रूमी (1207-1273) एवं नूरउद्दीन जामी (1414-1482) को महत्त्वपूर्ण सीमा तक प्रभावित किया है। इबने अरबी का सूफी दर्शन ईश्वर की एकरूपता और सर्वव्यापकता के सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत कुछ शब्दों में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:


महान है वह शक्ति जिसने सबको रचा और जो स्वयं उनके कण कण में समाई हुई है।