विजयदान देथा (मृत्यु: 10 नवम्बर, 2013)

November 10, 2017

विजयदान देथा ( जन्म: 1 सितम्बर, 1926 - मृत्यु: 10 नवम्बर, 2013) जिन्हें 'बिज्जी' के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के प्रसिद्ध लेखक और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य चुड़ामणी पुरस्कार जैसे विभिन्न अन्य पुरस्कारों से भी समानित किया जा चुका था। विजयदान देथा की राजस्थानी भाषा में चौदह खडों में प्रकाशित बाताँ री फुलवारी के दसवें खण्ड को भारतीय राष्ट्रीय साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया, जो राजस्थानी कृति पर पहला पुरस्कार है।


जीवन परिचय
लोक कथाओं एवं कहावतों का अद्भुत संकलन करने वाले पद्मश्री विजयदान देथा की कर्मस्थली उनका पैथृक गांव बोरुंदा दा ही रहा तथा एक छोटे से गांव में बैठकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के साहित्य का सृजन किया। राजस्थानी लोक संस्कृति की प्रमुख संरक्षक संस्था रूपायन संस्थान (जोधपुर) के सचिव देथा का जन्म 1 सितंबर 1926 को बोरूंदा में हुआ। प्रारम्भ में 1953 से 1955 तक बिज्जी ने हिन्दी मासिक प्रेरणा का सम्पादन किया। बाद में हिन्दी त्रैमासिक रूपम, राजस्थानी शोध पत्रिका परम्परा, लोकगीत, गोरा हट जा, राजस्थान के प्रचलित प्रेमाख्यान का विवेचन, जैठवै रा सोहठा और कोमल कोठारी के साथ संयुक्त रूप से वाणी और लोक संस्कृति का सम्पादन किया। विजयदान देथा की लिखी कहानियों पर दो दर्जन से ज़्यादा फ़िल्में बन चुकी हैं, जिनमें मणि कौल द्वारा निर्देशित 'दुविधा' पर अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 1986 में उनकी कथा पर चर्चित फ़िल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा द्वारा निर्देशित फिल्म परिणीति काफ़ी प्रभावित हुई है। राजस्थान साहित्य अकादमी 1972-73 में उन्हें विशिष्ट साहित्यकार के रूप में सम्मानित कर चुकी है।'दुविधा' पर आधारित हिंदी फिल्म 'पहेली' में अभिनेता शाहरुख खान और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में थे। यह उनकी किसी रचना पर बनी अंतिम फिल्म है। रंगकर्मी हबीब तनवीर ने विजयदान देथा की लोकप्रिय कहानी 'चरणदास चोर' को नाटक का स्वरूप प्रदान किया था और श्याम बेनेगल ने इस पर एक फिल्म भी बनाई थी।


राजस्थानी भाषा में क़रीब 800 से अधिक लघुकथाएं लिखने वाले विजयदान देथा की कृतियों का हिंदी, अंग्रेज़ी समेत विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया। विजयदान देथा ने कविताएँ भी लिखीं और उपन्यास भी। वे कलात्मक दृष्टि से उतने सफल नहीं नहीं हो सके। संभवतः उनकी रचनात्मक क्षमता खिल पाई लोक कथाओं के साथ उनके अपने काम में। विजयदान देथा ने रंगमंच और सिनेमा को अपनी ओर खींचा। एक अच्छी ख़ासी आबादी है जो उन्हें 'चरणदास चोर' के माध्यम से ही जानती है। अमोल पालेकर, मणि कौल, प्रकाश झा, श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने उनकी कहानियों पर फिल्में बनाईं। हबीब तनवीर उनकी कहानी को अपनाने वाले रंग निर्देशकों में सबसे प्रसिद्ध हैं लेकिन देश भर में उनकी जाने कितनी कहानियों को मंच पर खेला गया, इसका कोई हिसाब नहीं है।


राजस्थानी कृतियाँ


बाताँ री फुलवारी, भाग 1-14, 1960 - 1974, लोक लोरियाँ
प्रेरणा (कोमल कोठारी द्वारा सह-सम्पादित) 1953
सोरठा, 1956 - 1958
टिडो राव, राजस्थानी की प्रथम जेब में रखने लायक पुस्तक, 1965
उलझन, 1984, (उपन्यास)
अलेखुन हिटलर, 1984, (लघु कथाएँ)
रूँख, 1987
कबू रानी, 1989, (बच्चों की कहानियाँ)
राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोष। (संपादन)
हिन्दी अनुवादित कृतियाँ


अपनी मातृ भाषा राजस्थानी के समादर के लिए 'बिज्जी' ने कभी अन्य किसी भाषा में नहीं लिखा, उनका अधिकतर कार्य उनके एक पुत्र कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी में अनुवादित किया।


उषा, 1946 (कविताएँ)
बापु के तीन हत्यारे, 1948 (आलोचना)
ज्वाला साप्ताहिक में स्तम्भ, 1949 – 1952
साहित्य और समाज, 1960, (निबन्ध)
अनोखा पेड़ (सचित्र बच्चों की कहानियाँ), 1968
फूलवारी (कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी अनुवादित) 1992
चौधरायन की चतुराई (लघु कथाएँ) 1996
अन्तराल, 1997 (लघु कथाएँ)
सपन प्रिया, 1997 (लघु कथाएँ)
मेरो दर्द ना जाणे कोय, 1997 (निबन्ध)
अतिरिक्ता, 1997 (आलोचना)
महामिलन, (उपन्यास) 1998
प्रिया मृणाल, 1998 (लघु कथाएँ)

राजस्थान की रंग रंगीली लोक संस्कृति को आधुनिक कलेवर में पेश करने वाले, लोककथाओं के अनूठे चितेरे विजयदान देथा यानी बिज्जी अपने पैतृक गांव में ही रहते थे, राजस्थानी में ही लिखते थे और हिन्दीजगत फिर भी उन्हें हाथोंहाथ लेता था। चार साल की उम्र में पिता को खो देने वाले श्री देथा ने न कभी अपना गांव छोड़ा, न अपनी भाषा। ताउम्र राजस्थानी में लिखते रहे और लिखने के सिवा कोई और काम नहीं किया। बने बनाए सांचों को तोड़ने वाले विजयदान देथा ने कहानी सुनाने की राजस्थान की समृद्ध परंपरा से अपनी शैली का तालमेल किया। चतुर गड़ेरियों, मूर्ख राजाओं, चालाक भूतों और समझदार राजकुमारियों की जुबानी विजयदान देथा ने जो कहानियां बुनीं उन्होंने उनके शब्दों को जीवंत कर दिया। राजस्थान की लोककथाओं को मौजूदा समाज, राजनीति और बदलाव के औजारों से लैस कर उन्होंने कथाओं की ऐसी फुलवारी रची है कि जिसकी सुगंध दूर-दूर तक महसूस की जा सकती है। दरअसल वे एक जादुई कथाकार थे। अपने ढंग के अकेले ऐसे कथाकार, जिन्होंने लोक साहित्य और आधुनिक साहित्य के बीच एक बहुत ही मज़बूत पुल बनाया था। उन्होंने राजस्थान की विलुप्त होती लोक गाथाओं की ऐसी पुनर्रचना की, जो अन्य किसी के लिए लगभग असंभव थी। सही मायनों में वे राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने उस अन्यतम भाषा में आधुनिक गद्य और समकालीन चेतना की नींव डाली। अपने लेखन के बारे में उनका कहना था- "हवाई शब्दजाल व विदेशी लेखकों के अपच उच्छिष्ट का वमन करने में मुझे कोई सार नज़र नहीं आता। आकाशगंगा से कोई अजूबा खोजने की बजाय पाँवों के नीचे की धरती से कुछ कण बटोरना यादा महत्त्वपूर्ण लगता है। अन्यथा इन कहानियों को गढ़ने वाले लेखक की कहानी तो अनकही रह जाएगी।" विजयदान देथा की कहानियाँ पढ़कर विख्यात फिल्मकार मणि कौल इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने तत्काल उन्हें लिखा- तुम तो छुपे हुए ही ठीक हो। ...तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गयीं तो वे कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ेंगे। ...गिद्ध हैं नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल से ढँक रखा है। हुआ भी यही, अपनी ही एक कहानी के दलित पात्र की तरह- जिसने जब देखा कि उसके द्वारा उपजाये खीरे में बीज की जगह 'कंकड़-पत्थर' भरे हैं तो उसने उन्हें घर के एक कोने में फेंक दिया, किन्तु बाद में एक व्यापारी की निगाह उन पर पड़ी तो उसकी आँखें चौंधियाँ गयीं, क्योंकि वे कंकड़-पत्थर नहीं हीरे थे। विजयदान देथा के साथ भी यही हुआ। उनकी कहानियाँ अनूदित होकर जब हिन्दी में आयीं तो हिन्दी संसार की आँखें चौंधियाँ गयीं।


2007 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित विजयदान देथा को 2011 के साहित्य नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था हालांकि बाद में यह अवॉर्ड टॉमस ट्रांसट्रॉमर को दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार भी प्रदान किए गए।


राजस्थानी लेखक विजयदान देथा का रविवार 10 नवंबर, 2013 को दिल का दौरा पड़ने से बोरुंदा गांव (जोधपुर) में निधन हो गया। उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं को पहचान और आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। 87 वर्षीय विजयदान देथा के परिवार में तीन पुत्र और एक पुत्री हैं।


Vijaydan Detha (1 September 1926 – 10 November 2013), also known as Bijji, was a noted writer from Rajasthan and a recipient of the Padma Shri award.He was also recipient of several other awards such as the Sahitya Akademi Award.


He has more than 800 short stories to his credit, which are translated into English and other languages. He was co-founder of Rupayan Sansthan with late Komal Kothari, an institute that documents Rajasthani folk-lore, arts and music. His literary works include Bataan ri Phulwari (garden of tales), a fourteen volume collection of stories that draws on folk-lore and spoken dialects of Rajasthan. His stories and novels have been adapted for many plays and movies including Habib Tanvir's Charandas Chor, Prakash Jha's Parinati, Amol Palekar's Paheli, and Duvidha by Mani Kaul.



Vijaydan Detha hails from charan caste. His father Sabaldan Detha and grandfather Jugtidan Detha were also well-known poets of Rajasthan. Detha lost his father and two brothers in a feud at the age of four-year. At the age of six he moved to Jaitaran (25 km from Borunda) where his brother Sumerdan used to work in civil court. He studied there till class IV. His brother had transferable job hence Vijaydan also had to move with him. Vidaydan did his school study at Bihar and Barmer. Detha in his school years was poor in English language and had to face many embarrassing moments. In Barmer, while competing with another student Narsingh Rajpurohit, he realised that he wants to be a writer. His brother then transferred to Jodhpur where Detha studied in Durbar School.


Vijaydan Detha considers Sarat Chandra Chattopadhyay as his first inspirer. He is equally good fan of Chekhov. In beginning he was critical of Tagore but after reading Tagore's Stripatra he became fan of Tagore.


Detha joined college in 1944, by that time he had already established his name in poetry, however he gives credit for it to his cousin brother Kuberdan Detha, who had left school after standard X. Vijaydan says he used to pass his cousins poems in his name, applause brought from those poems made him to think to establish his own name in writing.


One of his first books to create a storm was Bapu Ke Teen Hatyare. The book is critique of the work of Harivanshrai Bachchan, Sumitranandan Pant and Narendra Sharma. The trio brought out books about Gandhi within two months of Gandhi's death.


In 1950–52, Detha read and was inspired by 19th Century Russian literature. That is when he thought: "If you do not want to be mediocre writer, you should return to your village and write in Rajasthani." By that time he had already written 1300 poems and 300 short stories. In 1973, renowned filmmaker Mani Kaul, directed ' Duvidha', based on Bijji's story' duvidha'. The film was appreciated all over the world. much of it was picturized at his village Borunda in Jodhpur district. Later Shah Rukh Khan made ' Paheli' on the same story, which was directed by Amol Palekar. "Paheli' was also India's entry in Oscar. Prakah Jha made' Parinati', a wonderful film based on Bijji's story.Habib Tanvir, adapted Bijji's story into one of his most acclaimed play' Charandas Chor', the same was converted into a film by Shyam Benegal. Bijji's stories have been converted into various films and dramas all over. Talking to Mahendra lalas in India Today, he said,' My land ( Rajasthan) is full of stories, whatever I've written is just a drop of the ocean. Bijji, was inspired by Shah govradhan Lal Kabra to write in Rajasthani' till date I have not written in any other language, he says regarding his immense love for the language. His favourite authors include Sharat Chandra Chattopadhya, Anton Chekhov and Rabindranath Tagore. Bijji has always portrayed the sufferings of the poor in his writings,' he is one of the finest authors, the world has ever produced, says Professor Gopal bharadwaj, former head of Sociology department of Jai Narayan vyas university, Jodhpur. Bijji was also tipped for the Nobel prize for literature in 2011 which ultimately went to Tomas Tranströmer Bijji was awarded rao Siha award by Mehrangarh Museum trust on 24 November 2011. Vijay dan detha has four sons and a daughter.


Awards and honours
Sahitya Akademi Award for Rajasthani in 1974 
Bhartiya Bhasa Parishad Award in 1992 
Marudhara Puraskar in 1995
Bihari Puraskar in 2002 
Sahitya Chudamani Award in 2006
Padmashri in 2007
Rao Siha award 2011 by mehrangarh museum trust.
Rajasthan Ratna award in 2012