अमजद ख़ान (जन्म: 12 नवंबर, 1940)

November 12, 2017

अमजद ख़ान (जन्म: 12 नवंबर, 1940 - निधन: 27 जुलाई, 1992) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। इनके द्वारा शोले फ़िल्म में अभिनीत किरदार 'गब्बर सिंह' भारतीय सिनेमा के यादगार खलनायकों में से एक है। अपने करियर में उन्होंने 'शोले', 'परवरिश', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस', 'हीरालाल-पन्नालाल', 'सीतापुर की गीता', 'हिम्मतवाला' और 'कालिया' जैसी करीब 130 फ़िल्मों में काम किया था।


जीवन परिचय
12 नवंबर 1940 जन्मे अमजद ख़ान को अभिनय की कला विरासत में मिली। उनके पिता जयंत फ़िल्म इंडस्ट्री में खलनायक रह चुके थे। अमजद ख़ान ने बतौर कलाकार अपने अभिनय जीवन की शुरूआत वर्ष 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं से की थी। इस फ़िल्म में अमजद ख़ान ने बाल कलाकार की भूमिका निभायी। वर्ष 1965 में अपनी होम प्रोडक्शन में बनने वाली फ़िल्म 'पत्थर के सनम' के जरिये अमजद ख़ान बतौर अभिनेता अपने करियर की शुरूआत करने वाले थे लेकिन किसी कारण से फ़िल्म का निर्माण नहीं हो सका। सत्तर के दशक में अमजद ख़ान ने मुंबई से अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बतौर अभिनेता काम करने के लिये फ़िल्म इंडस्ट्री का रूख किया। वर्ष 1973 में बतौर अभिनेता उन्होंने फ़िल्म 'हिंदुस्तान की कसम' से अपने करियर की शुरूआत की लेकिन इस फ़िल्म से दर्शकों के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके।


बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म शोले के किरदार गब्बर सिंह ने अमजद ख़ान को फ़िल्म इंडस्ट्री में सशक्त पहचान दिलायी लेकिन फ़िल्म के निर्माण के समय गब्बर सिंह की भूमिका के लिये पहले डैनी का नाम प्रस्तावित था। फ़िल्म शोले के निर्माण के समय गब्बर सिंह वाली भूमिका डैनी को दी गयी थी लेकिन उन्होंने उस समय धर्मात्मा में काम करने की वजह से उन्होंने शोले में काम करने से इन्कार कर दिया। शोले के कहानीकार सलीम ख़ान की सिफारिश पर रमेश सिप्पी ने अमजद ख़ान को गब्बर सिंह का किरदार निभाने का अवसर दिया। जब सलीम ख़ान ने अमजद ख़ान से फ़िल्म शोले में गब्बर सिंह का किरदार निभाने को कहा तो पहले तो अमजद ख़ान घबरा से गये लेकिन बाद में उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और चंबल के डाकुओं पर बनी किताब अभिशप्त चंबल का बारीकी से अध्ययन करना शुरू किया। बाद में जब फ़िल्म शोले प्रदर्शित हुई तो अमजद ख़ान का निभाया किरदार गब्बर सिंह दर्शकों में इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोग गाहे-बगाहे उनकी आवाज़ और चालढ़ाल की नकल करने लगे।[1]


अनेक बरसों से हिन्दी सिनेमा में डाकू का एक परम्परागत चेहरा चला आ रहा था। धोती-कुरता, सिप पर लाल गमछा, आँखें हमेशा गुस्से से लाल, मस्तक पर लम्बा-सा तिलक, कमर में कारतूस की पेटी, कंधे पर लटकी बंदूक, हाथों में घोड़े की लगाम और मुँह से आग उगलती गालियाँ। फ़िल्म शोले के गब्बर सिंह उर्फ अमजद ख़ान ने डाकू की इस परम्परागत रूप को एकदम से अलग शैली में बदल दिया। उसने ड्रेस पहनना पसंद किया। कारतूस की पेटी को कंधे पर लटकाया। गंदे दाँतों के बीच दबाकर तम्बाकू खाने का निराला अंदाज। अपने आदमियों से सवाल-जवाब करने के पहले खतरनाक ढंग से हँसना। फिर गंदी गाली थूक की तरह बाहर फेंकते पूछना- कितने आदमी थे? अमजद ने अपने हावभाव, वेषभूषा और कुटिल चरित्र के जरिए हिन्दी सिनेमा के डाकू को कुछ इस तरह पेश किया कि वर्षों तक डाकू गब्बर के अंदाज में पेश होते रहे। शोले फ़िल्म के गब्बर सिंह को दर्शक चाहते हुए भी कभी नहीं भूल सकते। दरअसल अमजद को जो गेट-अप दिया गया, उस कारण उनका चरित्र एकदम से लार्जर देन लाइफ हो गया। पश्चिम के डाकूओं जैसा लिबास पहनकर, मटमैले दाँतों से अट्टहास करती हँसी हँसना, बढ़ी हुई काँटेदारदाढ़ी और डरावनी हँसी के जरिये अमजद ने सीन-चुराने की कला में महारत हासिल कर ली और संवाद अदायगी में 'पॉज' का इस्तेमाल तो उनका कमाल का था। क्रूरता गब्बर के चेहरे से टपकती थी और दया करना तो जैसे वह जानता ही नहीं था। उसकी क्रूरता ही उसका मनोरंजन होती थी। उसने बसंती को काँच के टुक्रडों पर नंगे पैर नाचने के लिए मजबूर किया। इससे दर्शक के मन में गब्बर के प्रति नफरत पैदा हुई और यही पर अमजद कामयाब हो गए।


अमजद ख़ान ने अपने लंबे करियर में ज्यादातर नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं। अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र जैसे सितारों के सामने दर्शक उन्हें खलनायक के रूप में देखना पसंद करते थे और वे स्टार विलेन थे। इसके अलावा उन्होंने कुछ फ़िल्मों में चरित्र और हास्य भूमिकाएँ अभिनीत की, जिनमें शतरंज के खिलाड़ी, दादा, कुरबानी, लव स्टोरी, याराना प्रमुख हैं। निर्देशक के रूप में भी उन्होंने हाथ आजमाए। चोर पुलिस (1983) और अमीर आदमी गरीब आदमी (1985) नामक दो फ़िल्में उन्होंने बनाईं, लेकिन इनकी असफलता के बाद उन्होंने फिर कभी फ़िल्म निर्देशित नहीं की। अमजद अपनी सफलता और अभिनेता के करियर को इतनी ऊँचाई देने का श्रेय पिता जयंत को देते हैं। पिता को गुरु का दर्जा देते हुए उन्होंने कहा था कि रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट अपने छात्रों को जितना सिखाती है, उससे ज्यादा उन्होंने अपने पिता से सीखा है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में यदि उन्होंने प्रवेश लिया होता, तो भी इतनी शिक्षा नहीं मिल पाती। उनके पिता उन्हें आखिरी समय तक अभिनय के मंत्र बताते रहे।


पर्दे पर खलनायकी के तेवर दिखाने वाले अमजद निजी जीवन में बेहद दरियादिल और शांति प्रिय इंसान थे। अमिताभ बच्चन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि अमजद बहुत दयालु इंसान थे। हमेशा दूसरों की मदद को तैयार रहते थे। यदि फ़िल्म निर्माता के पास पैसे की कमी देखते, तो उसकी मदद कर देते या फिर अपना पारिश्रमिक नहीं लेते थे। उन्हें नए-नए चुटकुले बनाकर सुनाने का बेहद शौक था। अमिताभ को वे अक्सर फोन कर लतीफे सुनाया करते थे।


एक कार दुर्घटना में अमजद बुरी तरह घायल हो गए। एक फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में लोकेशन पर जा रहे थे। ऐसे समय में अमिताभ बच्चन ने उनकी बहुत मदद की। वे तेजी से रिकवर होने लगे। लेकिन डॉक्टरों की बताई दवा के सेवन से उनका वजन और मोटापा इतनी तेजी से बढ़ा कि वे चलने-फिरने और अभिनय करने में कठिनाई महसूस करने लगे। वैसे अमजद मोटापे की वजह खुद को मानते थे। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि ‘शोले’ की रिलीज के पहले उन्होंने अल्लाह से कहा था कि यदि फ़िल्म सु‍परहिट होती है तो वे फ़िल्मों में काम करना छोड़ देंगे। फ़िल्म सुपरहिट हुई, लेकिन अमजद ने अपना वादा नहीं निभाते हुए काम करना जारी रखा। ऊपर वाले ने मोटापे के रूप में उन्हें सजा दे दी। इसके अलावा वे चाय के भी शौकीन थे। एक घंटे में दस कप तक वे पी जाते थे। इससे भी वे बीमारियों का शिकार बने। मोटापे के कारण उनके हाथ से कई फ़िल्में फिसलती गई। 27 जुलाई 1992 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और दहाड़ता गब्बर हमेशा के लिए सोया गया। अमजद ने हिन्दी सिनेमा के खलनायक की इमेज के लिए इतनी लंबी लकीर खींच दी थी कि आज तक उससे बड़ी लकीर कोई नहीं बना पाया है।


Amjad Zakaria Khan (12 November 1940 – 27 July 1992) was an Indian actor and director. He worked in over 130 films in a career spanning nearly twenty years. He enjoyed popularity for his villainous roles in Hindi films, the most famous being the iconic Gabbar Singh in the 1975 classic Sholay and of Dilawar in Muqaddar Ka Sikandar.



Amjad Khan was born in Peshawar, British India to legendary actor Jayant in a Pashtun family.His brothers are actors Imtiaz Khan and Inayat Khan. Khan was educated at St.Andrew's High School, in Bandra. He attended R D National College where he was the general secretary, the highest elected student body representative.



Before Amjad Khan came to films, he was a theatre actor. His first role was in the film Nazneen (1951). His next role was at the age of 17 in the film Ab Dilli Dur Nahin (1957). He made appearances in minor roles with father Jayant in a few films. He assisted K. Asif in Love And God in the late 1960s and had a brief appearance in the film. The film was left incomplete after Asif's death in 1971, and it ended up releasing in 1986. In 1973 he made his debut as an adult in Hindustan Ki Kasam.


In 1975 he was offered the role of dacoit Gabbar Singh for the film Sholay by Salim Khan, who was one of its writers. In preparation for the role, Amjad read Abhishapth Chambal, a book on Chambal dacoits written by Taroon Kumar Bhaduri (actress Jaya Bhaduri's father). Amjad shot to stardom with the movie. His portrayal of Gabbar Singh is considered by many to be the first depiction of pure evil in Indian Cinema. His mannerisms and dialogues have become an integral part of Bollywood lexicon and spawned numerous parodies and spoofs. Sholay went on to become a blockbuster. Although it boasted an ensemble cast of superstars including Dharmendra, Amitabh Bachchan and Sanjeev Kumar, who was nominated that year for the Filmfare award for Best Actor category, Amjad stole the show with his unorthodox and eerie dialogue delivery. Even to this day people fondly remember his dialogues and mannerisms. He later appeared in advertisements as Gabbar Singh endorsing Britannia Glucose Biscuits (popularly known as Gabbar Ki Asli Pasand), the first incidence of a villain being used to sell a popular product.


After the success of Sholay, Khan continued to play negative roles in many subsequent Hindi films in the 1970s, 1980s and early 1990s – superseding, in terms of popularity and demand, the earlier Indian actor, Ajit. He often acted as villain opposite Amitabh Bachchan as the hero. His role in Inkaar was also presented in terrifying manner. He made his presence felt in Des Pardes, Nastik, Satte Pe Satta, Dada, Chambal Ki Kasam, Ganga Ki Saugandh, Hum Kisise Kum Nahin, and Naseeb.


Khan was also acclaimed for playing many unconventional roles. In the critically acclaimed film Shatranj Ke Khiladi (1977) (based on the novel of the same title), by Munshi Premchand and directed by Satyajit Ray, Khan played the helpless and deluded monarch Wajid Ali Shah, whose kingdom, Avadh, is being targeted by British colonialists from the British East India Company. It is the only movie in which he dubbed a song. He played many positive roles in films such as Yaarana (1981) and Laawaris (1981) as Amitabh's friend and father respectively. In the art film Utsav (1984), he portrayed Vatsayana, the author of the Kama Sutra. In 1988 he appeared in the Merchant-Ivory English film The Perfect Murder as an underworld don. He excelled at playing comical characters in films such as Qurbani (1980), Love Story, and Chameli Ki Shaadi (1986). In 1991, he reprised his role as Gabbar Singh in Ramgarh Ke Sholay, a parody of the legendary film which included look-alikes of Dev Anand and Amitabh Bachchan.


He ventured into directing for a brief period in the 1980s, directing and starring in Chor Police (1983), which was a success, and Ameer Aadmi Gareeb Aadmi (1985) which was a block buster at the box office.


Amjad was the president of the Actors Guild Association. He was respected in the film industry. He would intervene and negotiate disputes between actors and directors/producers. One such dispute occurred when Dimple Kapadia agreed to play a mother role and later backed out. The entire film producers' community tried to boycott her. Vikram intervened on behalf of the Actors Guild.
In 1972, he married Shehla Khan and in the following year, she gave birth to their first child, Shadaab Khan, who acted in a few films. He also had a daughter, Ahlam Khan, and another son, Seemaab Khan. Ahlam married popular theatre actor Zafar Karachiwala in 2011.



In 1976, Amjad Khan had a severe accident on the Mumbai-Goa highway which left him with broken ribs and a punctured lung. He was going to participate in the shooting of the film The Great Gambler, starring Amitabh Bachchan.Due to the serious injuries he also almost slipped into a coma, but fortunately, he recovered soon. The drug administered during his operation caused him to gain a lot of weight, which led to further health complications. As a result of his increasing weight, he died in 1992 after suffering from heart failure at the age of 51. Several of the films he had completed were released after his death, until 1996. His funeral procession passed from his house in Pali Hill to the Muslim Burial in Bandra East.