मदनमोहन मालवीय (मृत्यु- 12 नवम्बर, 1946)

November 12, 2017

मदनमोहन मालवीय (जन्म- 25 दिसम्बर, 1861 ; मृत्यु- 12 नवम्बर, 1946) महान स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि एक बड़े समाज सुधारक भी थे। इतिहासकार वीसी साहू के अनुसार हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक मदन मोहन मालवीय देश से जातिगत बेड़ियों को तोड़ना चाहते थे। उन्होंने दलितों के मन्दिरों में प्रवेश निषेध की बुराई के ख़िलाफ़ देशभर में आंदोलन चलाया। 24 दिसम्बर, 2014 को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पंडित मदनमोहन मालवीय को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा।


जीवन परिचय
इलाहाबाद में 25 दिसम्बर, 1861 में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपने महान कार्यों के चलते 'महामना' कहलाये। इनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था। चूँकि ये लोग मालवा के मूल निवासी थे, इसीलिए मालवीय कहलाए। महामना मालवीय जी ने सन् 1884 में उच्च शिक्षा समाप्त की। शिक्षा समाप्त करते ही उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया पर जब कभी अवसर मिलता वे किसी पत्र इत्यादि के लिये लेखादि लिखते। 1885 ई. में वे एक स्कूल में अध्यापक हो गये, परन्तु शीघ्र ही वक़ालत का पेशा अपना कर 1893 ई. में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वक़ील के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी प्रवेश किया और 1885 तथा 1907 ई. के बीच तीन पत्रों- हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन तथा अभ्युदय का सम्पादन किया।


बहुआयामी व्यक्तित्व। शिक्षाविद। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीरचयू) के संस्थापक। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। हिन्दू महासभा के नेता।
25 दिसम्बर, 1861 को इलाहाबाद में जन्म। इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट स्कूल में शिक्षा के रूप में करियर शुरू करने के साथ पढ़ाई जारी रखी।
वकालत की पढ़ाई करने के बाद पहले ज़िला और बाद में हाई कोर्ट में प्रेक्टिस शुरू की। 1886 में नवगाठित कांग्रेस के कोलकाता में आयोजित दूसरे वार्षिक सत्र में प्रेरणादायक भाषण देकर राजनीतिक परिदृश्य में उभरे।
50 वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे। 1909 (लाहौर), 1918 (दिल्ली), 1930 (दिल्ली) और 1932 (कोलकाता) में कांग्रेस अध्यक्ष रहे।
स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उदारवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच सेतु का काम किया।
1930 में जब गांधी जी ने नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया तो मदनमोहन मालवीय ने उसमें हिस्सा लिया और जेल गए।
50वीं वर्षगांठ पर देश सेवा के लिए वकालत छोड़ने का फैसला लिया।
1909 में इलाहाबाद से प्रभावी अंग्रेज़ी अखबार 'द लीडर' शुरू किया।
1903-18 के दौरान प्रांतीय विधायी परिषद और 1910-20 तक केंद्रीय परिषद के सदस्य रहे।
1916-18 के दौरान भारतीय विधायी सभा के निर्वाचित सदस्य रहे।
1931 में दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन द्वितीय में हिस्सा लिया
1937 में राजनीति से सन्न्यास लिया। सामाजिक मुद्दों के प्रति ध्यान केंद्रित किया।
महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल विवाह का विरोध किया।
12 नवम्बर, 1946 को निधन हो गया।


मदनमोहन मालवीय की प्राथमिक शिक्षा इलाहाबाद के ही श्री धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई जहाँ सनातन धर्म की शिक्षा दी जाती थी । इसके बाद मालवीयजी ने 1879 में इलाहाबाद ज़िला स्कूल से एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की और म्योर सेंट्रल कॉलेज से एफ.ए. की। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मदनमोहन को कभी-कभी फ़ीस के भी लाले पड़ जाते थे। इस आर्थिक विपन्नता के कारण बी.ए. करने के बाद ही मालवीयजी ने एक सरकारी विद्यालय में 40 रुपए मासिक वेतन पर अध्यापकी शुरू कर दी।


मदन मोहन मालवीय का विवाह मीरजापुर के पं. नन्दलाल जी की पुत्री कुन्दन देवी के साथ 16 वर्ष की आयु में हुआ था।[1]


जीवनकाल के प्रारम्भ से ही मालवीय जी राजनीति में रुचि लेने लगे और 1886 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सम्मिलित हुए। मालवीय जी दो बार 1909 तथा 1918 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष हुए। 1902 ई. में मालवीय जी उत्तर प्रदेश 'इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल' के सदस्य और बाद में 'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' के सदस्य चुने गये। मालवीय जी ब्रिटिश सरकार के निर्भीक आलोचक थे और उन्होंने पंजाब की दमन नीति की तीव्र आलोचना की, जिसकी चरम परिणति जलियांवाला बाग़ काण्ड में हुई। वे कट्टर हिन्दू थे, परन्तु शुद्धि (हिन्दू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेने वालों को पुन: हिन्दू बना लेते) तथा अस्पृश्यता निवारण में विश्वास करते थे। वे तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1915 ई. में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना है। विश्वविद्यालय स्थापना के लिए उन्होंने सारे देश का दौरा करके देशी राजाओं तथा जनता से चंदा की भारी राशि एकत्रित की।


बालकृष्ण भट्ट के ‘हिन्दी प्रदीप’ में हिन्दी के विषय में उन्होंने उन दिनों बहुत कुछ लिखा सन् 1886 ई. में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन के अवसर पर कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह से उनका परिचय हुआ तथा मालवीय जी की भाषा से प्रभावित होकर राजा साहब ने उन्हें दैनिक 'हिन्दुस्तान' का सम्पादक बनने पर राजी कर लिया। मालवीय जी के लिए यह एक यशस्वी जीवन का शुभ श्रीगणेश सिद्ध हुआ।


सन 1905 ई. में मालवीय की हिन्दू विश्वविद्यालय की योजना प्रत्यक्ष रूप धारण कर चुकी थी। इसी के प्रचार की दृष्टि से उन्होंने 1907 ई. में 'अभ्युदय' की स्थापना की। मालवीय जी ने दो वर्ष तक इसका सम्पादन किया। प्रारम्भ में यह पत्र साप्ताहिक रहा, फिर सन् 1915 ई. से दैनिक हो गया।


'लीडर' और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की स्थापना का श्रेय भी मालवीय जी को ही है। 'लीडर' के हिन्दी संस्करण 'भारत' का आरम्भ सन् 1921 में हुआ और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का हिन्दी संस्करण 'हिन्दुस्तान' भी वर्षों से निकल रहा है। इनकी मूल प्रेरणा में मालवीय जी ही थे।


'लीडर' के एक वर्ष बाद ही मालवीय जी ने 'मर्यादा' नामक पत्रिका निकलवाने का प्रबन्ध किया था। इस पत्र में भी वे बहुत दिनों तक राजनीतिक समस्याओं पर निबन्ध लिखते रहे। यह पत्रिका कुछ दिनों तक ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी से प्रकाशित होती रही।


सन 1906 ई. में इलाहाबाद के कुम्भ के अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म का विराट अधिवेशन कराया, जिसमें उन्होंने 'सनातन धर्म-संग्रह' नामक एक बृहत ग्रंथ तैयार कराकर महासभा में उपस्थित किया। कई वर्ष तक उस सनातन धर्म सभा के बड़े-बड़े अधिवेशन मालवीय जी ने कराये। अगले कुम्भ में त्रिवेणी के संगम पर इनका सनातन धर्म सम्मेलन भी इस सभा से मिल गया। सनातन धर्म सभा के सिद्धांतों के प्रचारार्थ काशी से 20 जुलाई, 1933 ई. को मालवीय जी की संरक्षता में 'सनातन धर्म' नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित होने लगा और लाहौर से ’मिश्रबन्धु’ निकला यह सब मालवीय जी के प्रयत्नों का ही फल था।
अन्य पत्रों को भी मालवीय जी सदा सहायक करते रहे। वे पत्रों द्वारा जनता में प्रचार करने में बहुत विश्वास रखते थे। और स्वयं वर्षों तक कई पत्रों के सम्पादक रहे। पत्रकारिता के अतिरिक्त वे विविध सम्मेलनों, सार्वजनिक सभाओं आदि में भी भाग लेते रहे। कई साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से उनका सम्पर्क हुआ तथा उनका सम्बन्ध आजीवन बना रहा। इसके अतिरिक्त 'सनातन धर्म सभा' के नेता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में जितने भी सनातन धर्म महाविद्यालयों की स्थापना हुई, वह मालवीय जी की सहायता से ही हुई। इनमें कानपुर, लाहौर, अलीगढ़, आदि स्थानों के सनातन धर्म महाविद्यालय उल्लेखनीय हैं।


आर्य समाज के प्रवर्तक तथा अन्य कार्यकर्ताओं ने हिन्दी की जो सेवा की थी, मालवीय जी उसकी कद्र करते थे किंतु धार्मिक और सामाजिक विषयों पर उनका आर्य समाज से मतभेद था। समस्त कर्मकाण्ड, रीतिरिवाज, मूर्तिपूजन आदि को वे हिन्दू धर्म का मौलिक अंग मानते थे। इसलिए धार्मिक मंच पर आर्यसमाज की विचार धारा का विरोध करने के लिए उन्होंने जनमत संगठित करना आरम्भ किया। इन्हीं प्रयत्नों के फलस्वरूप पहले 'भारतधर्म महामण्डल' और पीछे 'अखिल भारतीय सनातन धर्म' सभा की नींव पड़ी। धार्मिक विचारों को लेकर दोनों सम्प्रदायों में चाहे जितना मतभेद रहा हो किंतु हिन्दी के प्रश्न पर दोनों का मतभेद था। शिक्षा और प्रचार के क्षेत्र में सनातन धर्म सभा ने हिन्दी को उन्नत करने के लिए जो कुछ किया, उसका श्रेय मालवीय जी को ही है।


मालवीय जी एक सफल पत्रकार थे और हिन्दी पत्रकारिता से ही उन्होंने जीवन के कर्मक्षेत्र में पदार्पण किया। वास्तव में मालवीय जी ने उस समय पत्रों को अपने हिन्दी-प्रचार का प्रमुख साधन बना लिया और हिन्दी भाषा के स्तर को ऊँचा किया था। धीरे-धीरे उनका क्षेत्र विस्तृत होने लगा। पत्र सम्पादन से धार्मिक संस्थाएँ और इनसे सार्वजनिक सभाएँ विशेषकर हिन्दी के समर्थनार्थ और यहाँ से राजनीति की ओर इस क्रम ने उनसे सम्पादन कार्य छुड़वा दिया और वे विभित्र संस्थाओं के सदस्य, संस्थापक अथवा संरक्षक के रूप में सामने आने लगे। पत्रकार के रूप में उनकी हिन्दी सेवा की यही सीमा है, यद्यपि लेखक की हैसियत से वे भाषा और साहित्य की उत्रति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। हिन्दी के विकास में उनके योगदान का तब दूसरा अध्याय आरम्भ हुआ।


हिन्दी की सबसे बड़ी सेवा मालवीय जी ने यह की कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की अदालतों और दफ़्तरों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पहले केवल उर्दू ही सरकारी दफ़्तरों और अदालतों की भाषा थी। यह आन्दोलन उन्होंने सन् 1890 ई. में आरम्भ किया था। तर्क और आँकडों के आधार पर शासकों को उन्होंने जो आवेदन पत्र भेजा उसमें लिखा कि “पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध की प्रजा में शिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है और गुरुतर प्रमाणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों और सरकारी दफ़्तरों में नागरी अक्षर जारी किये जायेंगे। अतएव अब इस शुभ कार्य में जरा-सा भी विलम्ब न होना चाहिए। सन् 1900 ई. में गवर्नर ने उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया और इस प्रकार हिन्दी को सरकारी कामकाज में हिस्सा मिला। 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के कुलपति की स्थिति में उपाधिवितरणोंत्सवों पर प्राय: मालवीय जी हिन्दी में ही भाषण करते थे। शिक्षा के माध्यम के विषय में मालवीय जी के विचार बड़े स्पष्ट थे। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि "भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरुह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।"


सन 1893 ई. में मालवीय जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में पूर्ण योग दिया। वे सभा के प्रवर्तकों में थे और आरम्भ से ही सभा को उनकी सहायता का सम्बल रहा। सभा के प्रकाशन, शोध और हिन्दी प्रसार-कार्य में मालवीय जी की रुचि बराबर बनी रही और अंतिम दिन तक वे उसका मार्गदर्शन करते रहे।


हिन्दी आन्दोलन के सर्वप्रथम नेता होने के कारण मालवीय जी पर हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि का दायित्व भी आ गया। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सन् 1910 ई. में उनकी सहायता से इलाहाबाद में 'अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की स्थापना हुई। उसी वर्ष अक्टूबर में सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन काशी में हुआ। जिसके सभापति मालवीय जी थे। मालवीय जी विशुद्ध हिन्दी के पक्ष में थे। वे हिन्दी और हिन्दुस्तानी को एक नहीं मानते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो अद्वितीय कार्य किया है, उसका भी एक आवश्यक अंग साहित्यिक है।


'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' जैसी साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना द्वारा 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' तथा अन्य शिक्षण केन्द्रों के निर्माण द्वारा और सार्वजनिक रूप से हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व कर उसे सरकारी दफ़्तरों में स्वीकृत कराके मालवीय जी ने हिन्दी की सेवा की उसे साधारण नहीं कहा जा सकता। उनके प्रयत्नों से हिन्दी को यश विस्तार और उच्च पद मिला है किंतु इस बात पर कुछ आश्चर्य होता है कि ऐसी शिक्षा-दीक्षा पाकर और विरासत में हिन्दी तथा संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करके मालवीय जी ने एक भी स्वतंत्र रचना नहीं की। उनके अग्रलेखों, भाषणों, तथा धार्मिक प्रवचनों के संग्रह ही उनकी शैली और ओज पूर्ण अभिव्यक्ति के परिचायक के रूप में उपलब्ध है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे उच्च कोटि के विद्वान, वक्ता और लेखक थे। सम्भव है बहुधन्धी होने के कारण उन्हें कोई पुस्तक लिखने का समय नहीं मिला। अपने जीवन काल में जो उन्होंने कुछ हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए किया सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए पर्याप्त है किंतु उनकी निजी रचनाओं का अभाव खटकता है। उनके भाषणों और फुटकर लेखों का कोई अच्छा संग्रह आज उपलब्ध नहीं है। केवल एक संग्रह उनके जीवनकाल में ही सीता राम चतुर्वेदी ने प्रकाशित किया था, वह भी पुराने ढंग का है और उतना उपयोगी नहीं जितना होना चाहिए।


लोकमान्य तिलक, राजेन्द्र बाबू, और जवाहरलाल नेहरू के मौलिक या अनुदित साहित्य की तरह मालवीय जी की रचनाओं से हिन्दी की साहित्य निधि भरित नहीं हुई। इसलिए उनके सम्पूर्ण कृतित्व को आँकते हुए यह मानना होगा कि हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में मालवीय जी का योगदान क्रियात्मक अधिक है, रचनात्मक साहित्यकार के रूप में कम है। महामना मालवीय जी अपने युग के प्रधान नेताओं में थे। जिन्होंने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित कराया।


मालवीय ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। 1928 में उन्होंने लाला लाजपत राय, जवाहर लाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर साइमन कमीशन का ज़बर्दस्त विरोध किया और इसके ख़िलाफ़ देशभर में जनजागरण अभियान भी चलाया। महामना तुष्टीकरण की नीतियों के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने 1916 के लखनऊ पैक्ट के तहत मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल का विरोध किया। वह देश का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। उन्होंने गांधीजी को आगाह किया था कि वह देश के बंटवारे की कीमत पर स्वतंत्रता स्वीकार न करें। मालवीय जी ने 'सत्यमेव जयते' के नारे को जन-जन में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने 1931 में पहले गोलमेज सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया।


पं. मदन मोहन मालवीय जी कई संस्थाओं के संस्थापक तथा कई पत्रिकाओं के सम्पादक रहे। इस रूप में वे हिन्दू आदर्शों, सनातन धर्म तथा संस्कारों के पालन द्वारा राष्ट्र-निर्माण की पहल की थी। इस दिशा में 'प्रयाग हिन्दू सभा' की स्थापना कर समसामयिक समस्याओं के संबंध में विचार व्यक्त करते रहे। सन् 1884 ई. में वे हिन्दी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य, सन् 1885 ई. में 'इण्डियन यूनियन' का सम्पादन, सन् 1887 ई. में 'भारत-धर्म महामण्डल' की स्थापना कर सनातन धर्म के प्रचार का कार्य किया। सन् 1889 ई. में 'हिन्दुस्तान' का सम्पादन, 1891 ई. में 'इण्डियन ओपीनियन' का सम्पादन कर उन्होंने पत्रकारिता को नई दिशा दी। इसके साथ ही सन् 1891 ई. में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करते हुए अनेक महत्त्वपूर्ण व विशिष्ट मामलों में अपना लोहा मनवाया था। सन् 1913 ई. में वकालत छोड़ दी और राष्ट्र की सेवा का व्रत लिया ताकि राष्ट्र को स्वाधीन देख सकें।


मालवीय जी ने सन् 1916 ई. में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना की और कालांतरों में यह एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बन गया। वास्तव में यह एक ऐतिहासिक कार्य ही उनकी शिक्षा और साहित्य सेवा का अमिट शिलालेख है। पं0 मदन मोहन मालवीय जी के व्यक्तित्व पर आयरिश महिला डॉ. एनी बेसेंट का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा, जो हिन्दुस्तान में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु दृढ़प्रतिज्ञ रहीं। वे वाराणसी नगर के कमच्छा नामक स्थान पर 'सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना सन् 1889 ई. में की, जो बाद में चलकर हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का केन्द्र बना। पंडित जी ने तत्कालीन बनारस के महाराज श्री प्रभुनारायण सिंह की सहायता से सन् 1904 ई. में 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना का मन बनाया। सन् 1905 ई. में बनारस शहर के टाउन हाल मैदान की आमसभा में श्री डी. एन. महाजन की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित कराया। सन् 1911 ई. में डॉ. एनी बेसेंट की सहायता से एक प्रस्तावना को मंजूरी दिलाई जो 28 नवम्बर 1911 ई. में एक 'सोसाइटी' का स्वरूप लिया। इस 'सोसायटी' का उद्देश्य 'दि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी' की स्थापना करना था। 25 मार्च 1915 ई. में सर हरकोर्ट बटलर ने इम्पिरीयल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में एक बिल लाया, जो 1 अक्टूबर सन् 1915 ई. को 'ऐक्ट' के रूप में मंजूर कर लिया गया। 4 फरवरी, सन् 1916 ई. (माघ शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 1972) को 'दि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी' की नींव डाल दी गई। इस अवसर पर एक भव्य आयोजन हुआ। जिसमें देश व नगर के अधिकाधिक गणमान्य लोग, महाराजगण उपस्थित रहे।


1924 के प्रयाग कुंभ मेला क्षेत्र में बांस बल्लियों को बांध कर बनाए गए अवरोधक और इसके एक तरफ 'ऑल इंडिया सेवा समिति' के स्वयंसेवक और दूसरी ओर अंग्रेज़ सिपाहियों की संगीनें तनी थीं। एक आवाज़ के साथ ही सैंकड़ों युवक बेरीकेटिंग के पार कर गए। उन्हें न गोली का डर था, ना ही अंग्रेजों का डर। इस समय अंग्रेजों ने गंगा में स्नान पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। महामना मदन मोहन मालवीय ने इस प्रतिबंध का जमकर विरोध किया था व अपने स्वयंसेवकों के साथ गंगा स्नान के लिए मेला क्षेत्र में डट गए थे। इस आंदोलन में पं. जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए थे। गोली अब चली तब चली के माहौल में मालवीय के आह्वान पर बेरीकेटिंग के पार छलांग लगाने वालों में वह पहली पंक्ति में शामिल थे। मालवीय जी की पौत्र व हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति 'गिरधर मालवीय जी' के अनुसार महामना का व्यक्तित्व ही ऐसा था। कोई उनसे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता था। अंग्रेज़ भी उनसे ख़ासे प्रभावित थे। यही वजह थी कि महामना द्वारा विरोध करने के साथ ही अंग्रेजों की बंदूकें झुक गई थीं। उनके अनुसार गंगा के लिए महामना लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने 1913 में हरिद्वार में बांध बनाने की अंग्रेजों की योजना का विरोध किया था। उनके दबाव में अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा था। तत्कालीन भारत सरकार ने महामना के साथ समझौता किया था। इस समझौते में गंगा को हिन्दुओं की अनुमति के बिना न बांधने व 40 प्रतिशत गंगा का पानी किसी भी स्थिति में प्रयाग तक पहुंचाने की शर्त शामिल थी। न्यायमूर्ति पं. मालवीय के अनुसार यही वजह है कि आज गंगा में कुछ पानी हमें मिल जा रहा है।


महामना मदन मोहन मालवीय समिति के सचिव 'पं. शशि मालवीय' के अनुसार गौ, गंगा व गायत्री महामना का प्राण थे। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बाकायदा एक बड़ी गौशाला बनवायी थी। इस गौशाला को देखरेख के लिए विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज को सौंपा गया था। गंगा उन्हें इस क़दर प्यारी थीं कि उन्होंने न सिर्फ़ गंगा के लिए बड़े आंदोलन किए वरन गंगा को विश्वविद्यालय के अन्दर भी ले गए थे, जिससे कि पूरा प्रांगण हमेशा पवित्र रहे। न्यायमूर्ति मालवीय के अनुसार महामना सही मायनों में आधुनिक भारत के निर्माणकर्ता थे। देश में इंजीनियरिंग, फार्मेसी आदि की पढ़ाई का कार्य महामना ने ही प्रारंभ किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में देश में पहली बार इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हुई थी। दशकों तक देश में इंजीनियरिंग की डिग्री ख़ास कर 'इलेक्ट्रिकल' व 'मैकेनिकल' की डिग्री बनारस इंजीनियरिंग कॉलेज के माध्यम से ही दी जाती रही है।


सनातन धर्मी छात्रों को शाकाहारी भोजन व रहने की व्यवस्था सुलभ कराने के लिए इलाहाबाद में हिन्दू छात्रावास (हिन्दू बोर्डिग हाउस) की स्थापना, भारती भवन पुस्तकालय, दो अख़बार प्रारंभ करने आदि के कार्य महामना ने किए थे। हिन्दू छात्रावास आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा छात्रावास है। न्यायमूर्ति मालवीय के अनुसार महामना हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। वह अंग्रेज़ी में बात करने को देशद्रोह मानते थे। महामना के अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही तत्कालीन अंग्रेज़ सरकार ने 18 अप्रैल 1900 को आदेश जारी कर देवनागरी को सरकारी कार्यालयों व न्यायालयों में प्रयोग की अनुमति दी थी।


मालवीय जी आजीवन देश सेवा में लगे रहे और 12 नवम्बर, 1946 ई. को इलाहाबाद में उनका निधन हो गया।


Mahamana Pandit Madan Mohan Malaviya  (25 December 1861 – 12 November 1946) was an Indian educationist and politician notable for his role in the Indian independence movement and as the two time president of Indian National Congress. He was respectfully addressed as Pandit Madan Mohan Malaviya and also addressed as 'Mahamana'.


Mahamana is most remembered as the founder of Banaras Hindu University (BHU) at Varanasi in 1916, which was created under the B.H.U. Act, 1915. The largest residential university in Asia and one of the largest in the world, having over 40,000 students across arts, sciences, engineering, medical, agriculture, performing arts, law and technology from all over the world. Pandit ji was Vice Chancellor of Banaras Hindu University from 1919–1938.


Malaviya ji was one of the founders of Scouting in India.He also founded a highly influential, English-newspaper, The Leader published from Allahabad in 1909.He was also the Chairman of Hindustan Times from 1924 to 1946. His efforts resulted in the launch of its Hindi edition named Hindustan Dainik in 1936.


Pandit ji was posthumously conferred with Bharat Ratna, India's highest civilian award, on 24 December 2014, a day before his 153rd Birth Anniversary.
Malaviya was born in Allahabad, North-Western Provinces, India on 25 December 1861, to Pandit Brij Nath and Moona Devi. His ancestors, known for their Sanskrit scholarship, originally hailed from Malwa (Ujjain), Madhya Pradesh and hence came to be known as 'Malaviyas'. Their original surname was Chaturvedi. His father was also a learned man in Sanskrit scriptures, and used to recite the Srimad Bhagavat.


Malaviya was traditionally educated at two Sanskrit Pathshalas and later continued education at an English school.Malaviya started his schooling at Hardeva's Dharma Gyanopadesh Pathshala, where he completed his primary education and later another school run by Vidha Vardini Sabha. He then joined Allahabad Zila School (Allahabad District School), where he started writing poems under the pen name Makarand which were published in journals and magazines.


Malaviya matriculated in 1879 from the Muir Central College, now known as Allahabad University. Harrison College's Principal provided a monthly scholarship to Malaviya, whose family had been facing financial hardships, and he was able to complete his B.A. at the University of Calcutta.


Although he wanted to pursue an M.A. in Sanskrit, his family conditions did not allow it and his father wanted him to take his family profession of Bhagavat recital, thus in July 1884 Madan Mohan Malaviya started his career as an assistant master at the Govt High School in Allahabad.
In December 1886, Malaviya attended the 2nd Indian National Congress session in Calcutta under chairmanship of Dadabhai Naoroji, where he spoke on the issue of representation in Councils. His address not only impressed Dadabhai but also Raja Rampal Singh, ruler of Kalakankar estate near Allahabad, who started a Hindi weekly Hindustan but was looking for a suitable editor to turn it into a daily. Thus in July 1887, he left his school job and joined as the editor of the nationalist weekly, he remained here for two and a half years, and left for Allahabad to join L.L.B., it was here that he was offered co-editorship of The Indian Opinion, an English daily. After finishing his law degree, he started practising law at Allahabad District Court in 1891, and moved to Allahabad High Court by December 1893.


Malaviya became the President of the Indian National Congress in 1909 and 1918. He was a moderate leader and opposed the separate electorates for Muslims under the Lucknow Pact of 1916. The "Mahamana" title was conferred to him by Mahatma Gandhi.


To redeem his resolve to serve the cause of education and social-service he renounced his well established practice of law in 1911, for ever. In order to follow the tradition of Sannyasa throughout his life, he pursued the avowed commitment to live on the society's support. But when 177 freedom fighters were convicted to be hanged in the Chauri-chaura case he appeared before the court, despite his vow and got acquitted 156 freedom fighters.


He remained a member of the Imperial Legislative Council from 1912 and when in 1919 it was converted to the Central Legislative Assembly he remained its member as well, till 1926. Malaviya was an important figure in the Non-cooperation movement. However, he was opposed to the politics of appeasement and the participation of Congress in the Khilafat movement.


In 1928 he joined Lala Lajpat Rai, Jawaharlal Nehru and many others in protesting against the Simon Commission, which had been set up by the British to consider India's future. Just as the "Buy British" campaign was sweeping England, he issued, on 30 May 1932, a manifesto urging concentration on the "Buy Indian" movement in India. Malaviya was a delegate at the Second Round Table Conference in 1931.


However, during the Civil Disobedience Movement, he was arrested on 25 April 1932, along with 450 other Congress volunteers in Delhi, only a few days after he was appointed in 1932 at Delhi as the President of Congress after the arrest of Sarojini Naidu. In 1933, at Calcutta, Malaviya was again appointed as the President of the Congress. Thus before Independence, Malaviya was the only leader of the Indian National Congress who was appointed as its President for four terms.


On 25 September 1932, an agreement known as Poona Pact was signed between Dr. Ambedkar (on behalf of the depressed classes among Hindus) and Malaviya (on behalf of the other Hindus). The agreement gave reserved seats for the depressed classes in the Provisional legislatures, within the general electorate and not by creating a separate electorate. Due to the pact, the depressed class received 148 seats in the legislature, instead of the 71 as allocated in the Communal Award proposal of the British Prime Minister Ramsay MacDonald. After the pact, the Communal Award was modified to include the terms as per the pacts. The text uses the term "Depressed Classes" to denote Untouchables among Hindus who were later called Scheduled Castes and Scheduled Tribes under India Act 1935, and the later Indian Constitution of 1950. 


In protest against the Communal Award which sought to provide separate electorates for minorities, Malaviya along with Madhav Shrihari Aney left the Congress and started the Congress Nationalist Party. The party contested the 1934 elections to the central legislature and won 12 seats.
Malviya founded Ganga Mahasabha to oppose the damning of Ganges.He compelled the British government to sign an agreement with Ganga Mahasabha and other Hindu religious leaders on uninterrupted flow of Ganges in Haridwar and protect Ganges for future obstructions.This agreement is known as Aviral Ganga Raksha Samjhuata 1916 also known as Agreement of 1916. Malaviya played an important part in the removal of untouchability and in giving direction to the Harijan movement. The Harijan Sevak Sangh was founded at a meeting in 1933 at which Pandit Malaviya presided.


Malaviya asserted - if you admit internal purity of human soul, you or your religion can never get impure or defiled in any way by touch or association with any man.


To solve the problem of untouchability, Malaviya followed a Hindu method, of giving Mantradīkshā to untouchables. He said that - Mantras would be a certain means of their upliftment socially, politically and spiritually.


He worked for the eradication of caste barriers in temples and other social barriers. Malaviya made massive efforts for the entry of so-called untouchables into any Hindu temple. In March 1936, Hindu Dalit (Harijan) leader P. N. Rajbhoj along with a group of 200 Dalit people demanded entry at the Kalaram Temple on a Rath Yatra day. Malaviya in the presence of priests of Kalaram Temple, gave diksha to the assembled people and gave them entry into the temple. Then these Dalit members also participated in the Rath Yatra of Kalaram Temple.


In 1901 Malaviya established a boys' hostel named Hindu Hostel (Hindu Boarding House) in Allahabad.
He Created a Non Governmental organization named ShriMathura Vrindavan Hasanand Gochar Bhoomi In Vrindavan for Welfare Of Cows.
A criticism of Montagu-Chelmsford proposals of Indian constitutional reform. Printed by C. Y. Chintamani, 1918.
Speeches and writings of Pandit Madan Mohan Malaviya. Publisher G.A. Natesan, 1919.