गीता दत्त (जन्म: 23 नवम्बर 1930)

November 23, 2017

गीता दत्त (जन्म: 23 नवम्बर 1930 – मृत्यु: 20 जुलाई 1972) भारतीय सिनेमा जगत में प्रसिद्ध पा‌र्श्वगायिका जिसने अपनी दिलकश आवाज़ से लगभग तीन दशकों तक करोड़ों श्रोताओं को मदहोश किया। कालजयी फ़िल्म ‘प्यासा’ के अंत में इस फ़िल्म के गीतों को स्वर देने वाली पा‌र्श्वगायिका गीता दत्त के पति प्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता-निर्देशक गुरु दत्त थे।


जीवन परिचय
फ़िल्म जगत में गीता दत्त के नाम से मशहूर गीता घोष राय चौधरी का जन्म 23 नवंबर 1930 को फरीदपुर शहर में हुआ। जब वे महज 12 वर्ष की थी तब उनका पूरा परिवार अब बांग्लादेश में फरीदपुर से मुंबई आ गया। उनके पिता जमींदार थे। बचपन के दिनों से ही गीता दत्त का रुझान संगीत की ओर था और वह पा‌र्श्वगायिका बनना चाहती थी। गीता दत्त ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हनुमान प्रसाद से हासिल की।


गीता दत्त को सबसे पहले वर्ष 1946 में फ़िल्म 'भक्त प्रहलाद' के लिए गाने का मौका मिला। गीता दत्त ने 'कश्मीर की कली', रसीली, सर्कस किंग (1946) जैसी कुछ फ़िल्मो के लिए भी गीत गाए लेकिन इनमें से कोई भी बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई। इस बीच उनकी मुलाकात महान संगीतकार एस. डी. बर्मन से हुई। गीता राय में एस. डी. बर्मन को फ़िल्म इंडस्ट्री का उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने गीता दत्त से अपनी अगली फ़िल्म 'दो भाई' के लिए गाने की पेशकश की। वर्ष 1947 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दो भाई' गीता दत्त के सिने कैरियर की अहम फ़िल्म साबित हुई और इस फ़िल्म में उनका गाया यह गीत 'मेरा सुंदर सपना बीत गया' लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म 'दो भाई' में अपने गाये इस गीत की कामयाबी की बाद बतौर पा‌र्श्वगायिका गीतादत्त अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई।


वर्ष 1951 गीता दत्त के सिने कैरियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन में भी एक नया मोड़ लेकर आया। फ़िल्म 'बाजी' के निर्माण के दौरान उनकी मुलाकात निर्देशक गुरुदत्त से हुई। फ़िल्म के एक गाने 'तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले' की रिर्काडिंग के दौरान गीता दत्त को देख गुरुदत्त मोहित हो गए। इसके बाद गीता दत्त भी गुरुदत्त से प्यार करने लगी। वर्ष 1953 में गीता दत्त ने गुरुदत्त से शादी कर ली। इसके साथ ही फ़िल्म बाजी की सफलता ने गीता दत्त की तकदीर बना दी और बतौर पा‌र्श्व गायिका वह फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई।


दिलों की गहराई तक उतर जाने वाली आवाज़ और गाने के दिलकश अंदाज़ की मलिका गीता दत्त भारतीय फ़िल्म संगीत में पश्चिमी प्रभाव की पहचान थी और वह ऐसी फनकार थी जिन्हें हर तरह के गीत गाने में महारत हासिल थी। गीता दत्त की जादुई आवाज़ सबसे पहले ‘जोगन’ में सुनने को मिली। इस फ़िल्म में उन्होंने मीरा के आर्त्तनाद को उंडेलकर श्रोताओं को विरही बना दिया है। वे खुलकर गाती हैं- ‘मैं तो गिरधर के घर जाऊँ। घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे।‘ और गीता के पिया उससे नौ साल पहले चले गए। वे गाती रहीं - ‘जोगी मत जा, मत जा...।‘ गीता दत्त ने गुरुदत्त की फ़िल्मों में क्या खूब गाया है। गले से नहीं, एकदम दिल से। उनके मन की बेचैनी तथा छटपटाहट एक-एक शब्द से रिसती मिलती है। फ़िल्म चाहे ‘बाजी’ हो या ‘आरपार’, ‘सीआईडी’ हो या ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ हो या ‘चौदहवीं का चाँद’ उनके स्वर की विविधता का कायल हो जाता है श्रोता। ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ (बाजी), ‘बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना...हाँ बड़े धोखे हैं इस प्यार में’। सचमुच उन्होंने प्यार में धोखा खाया। फिर भी गाती रहीं - ‘ये लो मैं हारी पिया, हुई तेरी जीत रे।‘ 


‘साहिब बीबी और ग़ुलाम’ फ़िल्म भले ही छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी की फ़िल्म रही हो, लेकिन छोटी बहू का दर्द, शिकायत, अकेलेपन की पीड़ा, पति की बेवफाई को गीता की आवाज़ ने परदे पर ऐसा उतारा कि मीना अमर हो गईं। ‘न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी।‘ और मीना के साथ सिनेमाघर के अँधेरे में डूबे हजारों दर्शक रोए। गीता दत्त ने हर तरह के गाने गाए हैं। फ़िल्म ‘बाजी’ के गीत ‘जरा सामने आ, जरा आँख मिला’ में श्रोताओं को उन्मादी स्वर मिलते हैं। ‘भाई-भाई’ का गीत ‘ऐ दिल मुझे बता दे, तू किसपे आ गया है’ सुनकर मन प्रेम की सफलता से भर जाता है। ‘प्यासा’ की गुलाबो का जीवन संगीत सुनकर मन अतृप्त प्यास में खो जाता है- ‘आज सजन मोहे अंग लगा ले, जनम सफल हो जाए।‘ लेकिन गीता ने जिन्दगीभर जिन्दगी का जहर पिया- ‘कैसे कोई जिए, जहर है जिन्दगी।‘ वह शराब का जहर रोजाना गले के नीचे उतारती रहीं और एक दिन सबको अकेला छोड़कर चली गईं।


वर्ष 1957 मे गीता दत्त और गुरुदत्त की विवाहित ज़िंदगी मे दरार आ गई। गुरुदत्त ने गीता दत्त के काम में दख़ल देना शुरू कर दिया। वह चाहते थे गीता दत्त केवल उनकी बनाई फ़िल्म के लिए ही गीत गाये। काम में प्रति समर्पित गीता दत्त तो पहले इस बात के लिये राजी नहीं हुयी लेकिन बाद में गीता दत्त ने किस्मत से समझौता करना ही बेहतर समझा। धीरे-धीरे अन्य निर्माता निर्देशको ने गीता दत्त से किनारा करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के बाद गीता दत्त अपने पति गुरुदत्त के बढ़ते दख़ल को बर्दाशत न कर सकी और उसने गुरुदत्त से अलग रहने का निर्णय कर लिया। इस बात की एक मुख्य वजह यह भी रही कि उस समय गुरुदत्त का नाम अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ भी जोड़ा जा रहा था जिसे गीता दत्त सहन नहीं कर सकीं। गीता दत्त से जुदाई के बाद गुरुदत्त टूट से गये और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे मे डूबो दिया। 10 अक्तूबर 1964 को अत्यधिक मात्रा मे नींद की गोलियां लेने के कारण गुरुदत्त इस दुनियां को छोड़कर चले गए। गुरुदत्त की मौत के बाद गीता दत्त को गहरा सदमा पहुंचा और उसने भी अपने आप को नशे में डुबो दिया


खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते (बावरे नैन : 1950)
सुनो गजर क्या गाए (बाज़ी : 1951)
न ये चाँद होगा, न ये तारे रहेंगे (शर्त : 1954)
कैसे कोई जिए, जहर है जिन्दगी (बादबान : 1954)
जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी (मिस्टर एंड मिसेस 55 : 1955)
जाता कहाँ है दीवाने (सीआईडी : 1956)
ऐ दिल मुझे बता दे, तू किसपे आ गया है (भाई-भाई : 1956)
आज सजन मोहे अंग लगा ले (प्यासा : 1957)
मेरा नाम चिन-चिन चू (हावड़ा ब्रिज : 1958)
वक्त ने किया क्या हँसीं सितम (कागज के फूल : 1959)[2]


हिन्दी के अलावे गीता दत्त ने कई बांग्ला फ़िल्मों के लिए भी गाने गाए। इनमें तुमी जो आमार (हरनो सुर-1957), निशि रात बाका चांद (पृथ्वी आमार छाया-1957), दूरे तुमी आज (इंद्राणी-1958), एई सुंदर स्वर्णलिपि संध्या (हॉस्पिटल-1960), आमी सुनचि तुमारी गान (स्वरलिपि-1961) जैसे गीत श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है।


सत्तर के दशक में गीता दत्त की तबीयत खराब रहने लगी और उन्होंने एक बार फिर से गीत गाना कम कर दिया। लगभग तीन दशक तक अपनी आवाज़ से श्रोताओं को मदहोश करने वाली पा‌र्श्वगायिका गीता दत्त ने अंतत: 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया से विदाई ले ली।


Geeta Dutt (born Geeta Ghosh Roy Chowdhuri; 23 November 1930 – 20 July 1972) was a prominent Indian singer, born in Faridpur before the Partition of India. She found particular prominence as a playback singer in Hindi cinema. She also sang many modern Bengali songs, both in film and non-film genre.
Geeta Ghosh Roy Chowdhuri was one of 10 children born to a wealthy Zamindar family in a village named Idilpur, presently under Gosairhat Upzilla of Shariatpur District, Bangladesh, formerly under Faridpur district in Bengal, British India. Her family moved to Calcutta and Assam in the early forties, leaving behind their land and properties. In 1942, her parents moved to an apartment in Bombay. Geeta was twelve and continued her schooling at the Bengali High School.
K. Hanuman Prasad took Geeta under his patronage, trained and groomed her in singing and later launched her into singing for movies. In 1946, she got the first break with an opportunity to sing in the mythological film Bhakta Prahlad for which Prasad was the music director. She was given only two lines to sing for two songs.


In 1947, she got her break with Do Bhai. The music of Do Bhai became a hit with "Mera sundar sapna beet gaya" topping the charts. Geeta Roy's fresh and melodious voice combined vivacity and pathos in such a way that, despite a pronounced "Bengali lilt," the song touched the pulse of thousands of music lovers. She was popularly nick-named "Bangal ka jadu" (the magic from Bengal). In the same film she sang the evocative "Yaad karoge, yaad karoge, ik din humko yaad karoge." It was remarkable for a teenager to sing with such maturity.


In the same year, she sang for Hunuman Prasad's other releases.


"Naino Ki Pyali Se Hoto Ki Madira" (Rasili)
"Neha Lagake Mukh Mod Gayaa" (Rasili)
"Aaja ri Nindiya Aaja": a lullaby alongside the established playback singer Parul Ghosh (Nai Maa)
The uncanny ability of Geeta Dutt that made her race past her contemporaries was her unique versatility to sing any kind of song with the authentic tone, feeling, passion and emotion as demanded by the composition and the situation it was being picturised in. From a bhajan to a club song, from a haunting melancholic song to a peppy romantic number, she could traverse the range of music, seemingly effortlessly. This unique versatility helped Geeta (Roy) Dutt carve out a niche and cement her place even when the Lata Mangeshkar and Asha Bhosle phenomenon was sweeping through the world of Hindi playback, following the runaway success of Aayega Aanewala in Mahal (1949). Geeta Dutt's chart-busting "Tadbeer se bigdi hui taqdeer bana le" in Guru Dutt's directorial debut Baazi (1951) was the turning point where "Geeta Roy's vivacity was matched every inch by Geeta Bali on-screen". S. D. Burman had turned a ghazal by Sahir Ludhianvi into a sensual club song much to the chagrin of the famed lyricist-poet: The ploy worked as Baazi proved a hit on the strength of that song alone.


S D Burman fully exploited Geeta's potential across the spectrum. "Aan milo shyam saanware" (Devdas, 1955), the duet with Manna Dey, has the unmistakable touch of the Baul folk music of Bengal. "Nanhi kali sone chali" (Sujata, 1959) is one of the most popular and heart-touching lullaby ever where Geeta Dutt's voice rings maternal love in every note. The bubbly exuberance of "Aye dil mujhe bata de" (Bhai Bhai, 1956) is in sharp contrast to the pathos of "Waqt ne kiya" in (Kaagaz Ke Phool, 1959).
During Geeta's recording of songs for the movie Baazi, she met its young up-and-coming director, Guru Dutt. Their romance culminated in marriage on 26 May 1953. Geeta and Guru Dutt had three children: Tarun (1954-1985), Arun (1956-2014) and Ninā (b. 1962).


With music directors Hemant Mukherjee (better known as Hemant Kumar in Bombay film industry) (Harano Sur, Sonar Harin) and Nachiketa Ghosh (Prithibi Amare Chaaye, 1957 and Indrani, 1958), Geeta Dutt came up with songs that were hauntingly melodious, youthful and heartwarming. At a time when Sandhya Mukherjee's voice was synonymous with Suchitra Sen, Hemant Mukherjee and Nachiketa Ghosh picked Geeta Dutt. She also cut a number Non-film discs, singing to the tune of notable music directors like Sudhin Dasgupta and Anal Chatterjee.


In 1958, S.D. Burman had developed discord with Lata Mangeshkar as a playback singer and he attempted to work with Geeta as the main singer of his compositions rather than the upcoming Asha Bhosle who, he felt, was relatively raw. However, out of her personal problems, Geeta would not practice her art sufficiently and failed to meet Burman's demanding standards. (He and O.P. Nayyar then started to work with Asha and helped her blossom as a singer.)


Guru Dutt's magnum opus Kaagaz Ke Phool came in 1959 in which Guru Dutt himself starred in the lead role with Waheeda Rehman. The film was in a way reflective of his own views on life and the transitory nature of fame and success in the film world.


Geeta Dutt came up with one of her best renditions in the heart-rending "Waqt ne kiya kya haseen sitam," composed by S. D. Burman and penned by Kaifi Azmi where she poured out her pain, anguish and pathos in every word. However, the box-office disaster of Kaagaz Ke Phool (which is now considered a classic) left them shattered, financially and emotionally.


In 1964, Guru Dutt died from a combination of alcohol and an overdose of sleeping pills. (His death was widely perceived as a suicide following two earlier attempts.) Geeta then suffered a serious nervous breakdown and ran into financial problems. She tried to resume her singing career, cutting discs at Durgā Pujā and giving stage shows. She performed in a leading role in a Bengali movie, Badhu Baran (1967), and sang admirably Anubhav (1971), which was her final performance to the music of Kanu Roy as she died of liver cirrhosis in 1972, at the age of 41.
Geeta died of cirrhosis of the liver due to excessive consumption of alcohol on 20 July 1972 in Mumbai.