गुरु तेग़ बहादुर सिंह (मृत्यु: 24 नवम्बर, 1675 ई.)

November 24, 2017

गुरु तेग़ बहादुर सिंह (जन्म: 18 अप्रैल, 1621 ई.; मृत्यु: 24 नवम्बर, 1675 ई.) सिक्खों के नौवें गुरु थे। विश्व के इतिहास में धर्म एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में इनका अद्वितीय स्थान है। तेग़ बहादुर जी के बलिदान से हिंदुओं व हिन्दू धर्म की रक्षा हुई। हिन्दू धर्म के लोग भी उन्हें याद करते और उनसे संबंधित कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। तेग़ बहादुर सिंह 20 मार्च, 1664 को सिक्खों के गुरु नियुक्त हुए थे और 24 नवंबर, 1675 तक गद्दी पर आसीन रहे।


जीवन परिचय
गुरु तेग़ बहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर नगर में हुआ था। ये गुरु हरगोविन्द जी के पाँचवें पुत्र थे। आठवें गुरु इनके पोते 'हरिकृष्ण राय' जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा ये नवम गुरु बनाए गए। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। उनका बचपन का नाम त्यागमल था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुग़लों के हमले के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया। उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेग़ बहादुर (तलवार के धनी) रख दिया।


युद्धस्थल में भीषण रक्तपात से गुरु तेग़ बहादुर जी के वैरागी मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका का मन आध्यात्मिक चिंतन की ओर हुआ। धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेग़ बहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक 'बाबा बकाला' नामक स्थान पर साधना की। आठवें गुरु हरकिशन जी ने अपने उत्तराधिकारी का नाम के लिए 'बाबा बकाले' का निर्देश दिया। गुरु जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। आनंदपुर साहब से कीरतपुर, रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुँचे। यहाँ उपदेश देते हुए दमदमा साहब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे। कुरुक्षेत्र से यमुना के किनारे होते हुए कड़ामानकपुर पहुँचे और यहीं पर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया।


इसके बाद गुरु तेग़ बहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहाँ उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, उन्नयन के लिए रचनात्मक कार्य किए। आध्यात्मिकता, धर्म का ज्ञान बाँटा। रूढ़ियों, अंधविश्वासों की आलोचना कर नये आदर्श स्थापित किए। उन्होंने परोपकार के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि कार्य भी किए। इन्हीं यात्राओं में 1666 में गुरुजी के यहाँ पटना साहब में पुत्र का जन्म हुआ। जो दसवें गुरु- गुरु गोविंद सिंह बने।


गुरु तेग़ बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु माने जाते हैं। औरंगज़ेब के शासन काल की बात है। औरंगज़ेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगज़ेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन किन श्लोकों का अर्थ राजा से सामने नहीं करना था। पंडित के बेटे ने जाकर औरंगज़ेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया। गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगज़ेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि वह अपने के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी। औरंगज़ेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया और संबंधित अधिकारी को यह कार्य सौंप दिया। औरंगज़ेब ने कहा -'सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें।' इस प्रकार की ज़बर्दस्ती शुरू हो जाने से अन्य धर्म के लोगों का जीवन कठिन हो गया।


जुल्म से ग्रस्त कश्मीर के पंडित गुरु तेग़ बहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार ‍इस्लाम को स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएँ दी जा रही हैं। हमें मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। गुरु तेग़ बहादुर जब लोगों की व्यथा सुन रहे थे, उनके 9 वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) वहाँ आए और उन्होंने पिताजी से पूछा-


'पिताजी, ये सब इतने उदास क्यों हैं? आप क्या सोच रहे हैं?'
गुरु तेग़ बहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्याएं बाला प्रीतम को बताईं तो उन्होंने पूछा- 'इसका हल कैसे होगा?'
गुरु साहिब ने कहा- 'इसके लिए बलिदान देना होगा।'
बाला प्रीतम ने कहा-' आपसे महान पुरुष कोई नहीं है। बलिदान देकर आप इन सबके धर्म को बचाइए।'
उस बच्चे की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित लोगों ने पूछा- 'यदि आपके पिता बलिदान देंगे तो आप यतीम हो जाएँगे। आपकी माँ विधवा हो जाएगीं।'
बाला प्रीतम ने उत्तर दिया- 'यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है।'


तत्पश्चात गुरु तेग़ बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेग़ बहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग़ बहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे'। औरंगज़ेब ने यह स्वीकार कर लिया।


गुरु तेग़ बहादुर दिल्ली में औरंगज़ेब के दरबार में स्वयं गए। औरंगज़ेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेग़ बहादुर जी नहीं माने तो उन पर ज़ुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेग़ बहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने। उन्होंने औरंगजेब से कहा- 'यदि तुम ज़बर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए।'


औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया। उसने दिल्ली के चाँदनी चौक पर गुरु तेग़ बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु जी ने 24 नवम्बर 1675 को हँसते-हँसते बलिदान दे दिया। गुरु तेग़ बहादुरजी की याद में उनके 'शहीदी स्थल' पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा 'शीश गंज साहिब' है।


गुरु तेग़ बहादुर जी की बहुत सी रचनाएँ ग्रंथ साहब के महला 9 में संग्रहित हैं। इन्होंने शुद्ध हिन्दी में सरल और भावयुक्त 'पदों' और 'साखी' की रचनायें की। सन् 1675 में गुरु जी धर्म की रक्षा के लिए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध अपने चार शिष्यों के साथ धार्मिक और वैचारिक स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गए। उनके अद्वितीय बलिदान ने देश की 'सर्व धर्म सम भाव' की संस्कृति को सुदृढ़ बनाया और धार्मिक, सांस्कृतिक, वैचारिक स्वतंत्रता के साथ निर्भयता से जीवन जीने का मंत्र भी दिया।


Guru Tegh Bahadur (1 April 1621 – 24 November 1675,), revered as the ninth Nanak, was the ninth of ten Gurus of the Sikh religion. Tegh Bahadur continued in the spirit of the first guru, Nanak; his 115 poetic hymns are in the text Guru Granth Sahib. Tegh Bahadur resisted the forced conversions of Kashmiri Pandits and non-Muslims to Islam, and was publicly beheaded in 1675 on the orders of Mughal emperor Aurangzeb in Delhi for refusing to convert to Islam.Gurudwara Sis Ganj Sahib and Gurdwara Rakab Ganj Sahib in Delhi mark the places of execution and cremation of the Guru's body. The martyrdom of Guru Tegh Bahadur is remembered as the Shaheedi Divas of Guru Tegh Bahadur every year on 24 November, according to the Nanakshahi calendar released by the Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee in 2003.



Guru Tegh Bahadur was born in a Sodhi Khatri Family. The Sixth guru, Guru Hargobind had one daughter Bibi Viro and five sons: Baba Gurditta, Suraj Mal, Ani Rai, Atal Rai and Tyaga Mal. Tyaga Mal was born in Amritsar in the early hours of 1 April 1621, who came to be known by the name Tegh Bahadur (Mighty Of The Sword), given to him by Guru Hargobind after he had shown his valour in a battle against the Mughals.


Amritsar at that time was the centre of Sikh faith. As the seat of the Sikh Gurus, and with its connection to Sikhs in far-flung areas of the country through the chains of Masands or missionaries, it had developed the characteristics of a state capital. Guru Tegh Bahadur was brought up in Sikh culture and trained in archery and horsemanship. He was also taught the old vedic text such as vedas, upanishadas and Puranas. He underwent prolonged spells of seclusion and contemplation. Tegh Bahadur was married on 3 February 1633, to Mata Gujri.



In March 1664 Guru Har Krishan contracted smallpox. When asked by his followers who would lead them after him, he replied Baba Bakala, meaning his successor was to be found in Bakala. Taking the advantage of the ambiguity in the words of the dying Guru, many installed themselves in Bakala, claiming themselves as the new Guru. Sikhs were puzzled to see so many claimants.


The Sikh tradition has a legend on how Tegh Bahadur was selected the ninth guru. A wealthy trader, Baba Makhan Shah Labana, had once prayed for his life and had promised to gift 500 gold coins to the Sikh guru if he survived. He arrived in search of the ninth Guru. He went from one claimant to the next making his obeisance and offering two gold coins to each Guru, believing that the right guru would know that his silent promise was to gift 500 coins for his safety. Every "guru" he met accepted the 2 gold coins and bid him farewell.Then he discovered that Tegh Bahadur also lived at Bakala. Labana gifted Tegh Bahadur the usual offering of two gold coins. Tegh Bahadur gave him his blessings and remarked that his offering was considerably short of the promised five hundred. Makhan Shah Labana forthwith made good the difference and ran upstairs. He began shouting from the rooftop, "Guru ladho re, Guru ladho re" meaning "I have found the Guru, I have found the Guru".


In August 1664 a Sikh Sangat arrived in Bakala and anointed Tegh Bahadur as the ninth guru of Sikhs. The Sangat was led by Diwan Durga Mal, and a formal "Tikka ceremony" was performed by Bhai Gurditta on Tegh Bahadur conferring Guruship on him.


As had been the custom among Sikhs after the execution of Guru Arjan by Mughal Emperor Jahangir, Guru Tegh Bahadur was surrounded by armed bodyguards.He himself lived an austere life.
Guru Tegh Bahadur contributed many hymns to Granth Sahib including the Saloks, or couplets near the end of the Guru Granth Sahib.Guru Tegh Bahadur toured various parts of Mughal Empire, and was asked by Gobind Sahali to construct several Sikh temples in Mahali. His works include 116 shabads, 15 ragas and his bhagats are credited with 782 compositions that are part of bani in Sikhism.


His works are included in the Guru Granth Sahib (pages 219-1427).[23] They cover a wide range of topics, such as the nature of God, human attachments, body, mind, sorrow, dignity, service, death and deliverance. For example, in Sorath rag, Guru Tegh Bahadur describes what an ideal human being is like,


jo nar dukh mein dukh nahin manney, sukh snehh ar phey nahi ja kai, kanchan maati manney
na nindya nehn usttat ja kai lobh moh abhimana
harakh sog tey rahey niaro nahen maan apmana, aasa mansa sagal tyagey
jagg tey rahey nirasa, kaam krodh jeh parsai nahin teh ghatt brahma niwasa


One who is not perturbed by misfortune, who is beyond comfort, attachment and fear, who considers gold as dust. He neither speaks ill of others nor feels elated by praise and shuns greed, attachments and arrogance. He is indifferent to ecstasy and tragedy, is not affected by honors or humiliations. He renounces expectations, greed. He is neither attached to the worldliness, nor lets senses and anger affect him. In such a person resides God.


— Guru Tegh Bahadur, Sorath 633 (Translated by Gopal Singh),
Guru Tegh Bahadur travelled extensively in different parts of the country, including Dhaka and Assam, to preach the teachings of Nanak, the first Sikh guru. The places he visited and stayed in, became sites of Sikh temples.[24]


During his travels, Guru Tegh Bahadur spread the Sikh ideas and message, as well as started community water wells and langars (community kitchen charity for the poor).


The Guru made three successive visits to Kiratpur. On 21 August 1664, Guru went there to console with Bibi Rup upon the death of her father, Guru Har Rai, the seventh Sikh guru, and of her brother, Guru Har Krishan.[citation needed] The second visit was on 15 October 1664, at the death on 29 September 1664, of Bassi, the mother of Guru Har Rai. A third visit concluded a fairly extensive journey through northwest Indian subcontinent. His son Guru Gobind Singh, who would be the tenth Sikh guru, was born in Patna, while he was away in Dhubri, Assam in 1666, where stands the Gurdwara Sri Guru Tegh Bahadur Sahib. He there helped end the war between Raja Ram Singh of Bengal and Raja Chakardwaj of Ahom state (later Assam). He visited the towns of Mathura, Agra, Allahabad and Varanasi.


After his visit to Assam, Bengal and Bihar, the Guru visited Rani Champa of Bilaspur who offered to give the Guru a piece of land in her state. The Guru bought the site for 500 rupees. There, Guru Tegh Bahadur founded the city of Anandpur Sahib in the foothills of Himalayas.In 1672, Tegh Bahadur traveled through Kashmir and the North-West Frontier, to meet the masses, as the persecution of non-Muslims reached new heights.