देवकी कुमार बोस ( जन्म- 25 नवम्बर, 1898/)

November 25, 2017

देवकी कुमार बोस ( जन्म- 25 नवम्बर, 1898, पश्चिम बंगाल; मृत्यु- 11 नवम्बर, 1971, कोलकाता) 'मूक युग' के बाद भारतीय सिनेमा के इतिहास में आये थियेटर्स युग के बेहद कल्पनाशील फ़िल्म निर्देशक थे। वे ध्वनि और संगीत के अद्भुत जानकार थे। यही कारण है कि उनके द्वारा निर्देशित सभी फ़िल्मों में संगीत का माधुर्य बिखरा पड़ा है। उनकी अधिकतर फ़िल्मों में राय चन्द बोराल ने संगीत दिया था। देवकी बोस ही वह पहले बंगाली फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्होंने 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' के साथ 'रवीन्द्र संगीत' को मिला कर फ़िल्मों में एक अद्भुत ध्वनि माधुर्य पैदा किया। यदि देवकी बोस 'न्यू थियेटर्स' से न जुड़ते तो संभव था कि 'न्यू थियेटर्स' की वह प्रसिद्धि नहीं होती जो आज है।


देवकी बोस का जन्म 25 नवम्बर, 1898 ई. को वर्धमान ज़िला, पश्चिम बंगाल में हुआ था। उनके पिता अपने समय के एक नामी वकील थे। जिन दिनों देवकी बोस अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रहे थे, उस समय देश को स्वतंत्रता दिलाने के कई क्रांतिकारी अपनी गतिविधियाँ चला रहे थे। इनमें राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी सर्वप्रमुख थे।


भारत की आज़ादी के लिए महात्मा गाँधी द्वारा चलाया गया 'असहयोग आन्दोलन' अपने चरम बिन्दू पर था। इस आन्दोलन से देवकी बोस स्वयं भी बहुत प्रभावित थे। इसके परिणामस्वरूप आन्दोलन में हिस्सा लेने के लिए देवकी बोस ने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी। पढ़ाई छोड़ने के बाद वह कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में रह कर एक छोटे-से अख़बार "शक्ति" का संपादन करने लगे।


इन्हीं दिनों पत्रकारिता करते हुए उनकी मुलाकात धीरेन गांगुली से हुई। देवकी बोस ने धीरेन गांगुली की 'ब्रिटिश डोमिनियन कम्पनी' के लिए कई मूक फ़िल्मों की पटकथा लिखी। इसके साथ ही कुछ फ़िल्मों का निर्देशन भी किया, चूँकि इन तमाम फ़िल्मों का छायांकन कृष्ण गोपाल ने किया था, इसलिए देवकी बोस से उनकी मित्रता हो गयी। कृष्ण गोपाल नवाबों के शहर लखनऊ के थे, इसलिए वह चाहते थे कि लखनऊ में रहते हुए ही फ़िल्म बनायें। लखनऊ की एक फ़िल्म कम्पनी 'यूनाइटेड फ़िल्म कारपोरेशन' एक फ़िल्म बनाना चाहती थी, जिसमें छायांकन का काम कृष्ण गोपाल को सौंपा गया था। उन्होंने फ़िल्म को निर्देशित करने के लिए देवकी बोस को कलकत्ता से बुला लिया।


वर्ष 1930 में 'द शैडो ऑफ़ डैड' फ़िल्म बन कर तैयार हुई। लेकिन यह फ़िल्म बुरी तरह से असफल हो गयी। देवकी बोस तो लखनऊ से वापस कलकत्ता चले गये, लेकिन फ़िल्म के छायाकार कृष्ण गोपाल को कम्पनी ने बंधक बना लिया और कहा कि 'वह कम्पनी छोड़ कर तब ही जा सकते हैं, जब पूरे घाटे की भरपाई करें'। यह कृष्ण गोपाल के बस में नहीं था। इसलिए वह कम्पनी के बंधक बने रहे और उम्मीद करते रहे कि देवकी बोस उन्हें छुड़ाने के लिए पैसे लेकर आएँगे। देवकी बोस ने प्रथमेश बरूआ से उन्हें अपनी फ़िल्म कम्पनी में रखने की गुजारिश की और फिर कृष्ण गोपाल को छुड़वाने के लिए भी उनसे पैसा हासिल कर लिया। इस तरह कृष्ण गोपाल देवकी बोस की वजह से ही कम्पनी के बन्धन से छूट सके।


'न्यू थियेटर्स' की फ़िल्म 'चंडीदास' की कामयाबी से देवकी बोस का नाम अचानक ही रातों रात चमक उठा। 'न्यू थियेटर्स' में उनके प्रवेश की कहानी भी फ़िल्मी-सी है। जब 'न्यू थियेटर्स' की एक के बाद एक सात फ़िल्में फ़्लॉप हो गईं, तब देवकी बोस ने 'न्यू थियेटर्स' के मालिक वीरेन्द्रनाथ सरकार से मिलने की कोशिश की। वीरेन्द्रनाथ सरकार उनसे मिल तो लिए, लेकिन जब देवकी बोस अपने साथ लाई हुई एक पटकथा उन्हें सुनाने लगे तो उन्होंने कहा कि वे यह पटकथा छायाकार नितिन बोस को सुनाएँ। नितिन बोस से देवकी बोस तीन दिनों तक मिलने की कोशिश करते रहे, लेकिन उन्होंने पलट कर देखा तक नहीं। इतना अवश्य था कि वे ये देखते रहे कि कोई सफ़ेद रंग की धोती-कुर्ता पहने युवक कई दिनों से उनके पीछे रहता है। आखिरकार चौथे दिन हिम्मत करके देवकी बोस ने नितिन बोस को अपना परिचय दिया और बताया कि उन्हें वीरेन्द्रनाथ सरकार ने उनसे मिलने के लिए कहा है


नितिन बोस ने दोपहर में लंच के समय देवकी बोस के हाथ में मौजूद कहानी को सुना और सुनते ही अभिभूत हो गये। यह कहानी और कोई नहीं, बल्कि फ़िल्म "चंडीदास" की ही पटकथा थी। 'चंडीदास' के बनते ही 'न्यू थियेटर्स' की टूटती साँसे लौट आयीं। फ़िल्म सुपरहिट हो चुकी थी, और इसके साथ ही देवकी बोस भी 'न्यू थियेटर्स' के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व बन गये।


देवकी बोस ने चार दर्जन से भी ज़्यादा फ़िल्मों का सफल निर्देशन किया, जिसमें हिन्दी से अधिक बांग्ला भाषा की फ़िल्में थीं। उनके द्वारा निर्देशित प्रमुख फ़िल्मों में से कुछ निन्मलिखित हैं-


देवकी बोस द्वारा निर्देशित प्रमुख फ़िल्में
1. द शैडो ऑफ़ डैड 2. अपराधी
3. निशिर डाक 4. चंडीदास
5. राजरानी मीरा 6. पूरन भगत
7. मीराबाई 8. दुलारी बीवी
9. सीता 10. जीवन नाटक
11. इंकलाब 12. सोनार संसार
13. विद्यापति 14. सपेरा
15. नर्तकी 16. अभिनव
17. अपना घर 18. श्रीरामानुज
19. स्वर्ग से सुन्दर देश हमारा 20. मेघदूत
21. कृष्णलीला 22. अलकनंदा
23. चंद्रशेखर 24. सर शंकरनाथ
25. कवि 26. रत्नदीप
27. पथिक 28. भालोबाशा
29. नवजन्मा 30. चिरकुमार सभा
31. सोनार काठी 32. सागर संगम
33. अर्घ्य 34. अपराधी

देवकी बोस मन के बड़े उदार और सरल व्यक्तित्व के इंसान थे। वह हमेशा उन्हीं विषयों पर फ़िल्म बनाते थे, जो विषय उन्हें अपने स्वभाव और सोच के अनुकूल लगते थे। उनकी जिन फ़िल्मों ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किए थे, उनमें 'चंडीदास' और 'पूरन भगत' के साथ-साथ फ़िल्म 'सीता' भी शामिल थी। उनके द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'सीता' भारत की पहली ऐसी फ़िल्म थी, जिसे 'वेनिस फ़िल्म समारोह' में प्रदर्शन के लिए चुना गया था। फ़िल्म 'सीता' में राम की भूमिका अपने समय के मशहूर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने और सीता की भूमिका दुर्गा खोटे ने निभाई थी। देवकी बोस की एक अन्य फ़िल्म जिसकी बहुत चर्चा होती है, वह है "विद्यापति"। इस फ़िल्म ने भी भारतीय जनता के बीच अच्छी सफलता प्राप्त की थी।


उनकी फ़िल्मों की सबसे बड़ी निधि उनका संगीत है। ये फ़िल्में अपनी ध्वनि और संगीत के लिए भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती हैं। देवकी बोस को ध्वनियों की अद्भुत समझ थी और संगीत में वह बेहद प्रयोगधर्मी शिल्पकार के रूप में जाने जात थे। उन्होंने 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' के साथ 'रवीन्द्र संगीत' को मिलाकर फ़िल्मों में ध्वनि और संगीत का बहुत ही माधुर्य प्रयोग किया था।


देवकी बोस ने जिस अंतिम फ़िल्म को निर्देशित किया, वह थी बांग्ला भाषा में बनी फ़िल्म 'अर्घ्य'। यह फ़िल्म उन्होंने वर्ष 1961 में बनाई थी। 'न्यू थियेटर्स' से अलग होने के बाद देवकी बोस ने 1942 से 1961 के बीच यूँ तो बीस से भी अधिक फ़िल्में बनायी थीं, लेकिन उनमें से कोई भी फ़िल्म 'चंडीदास' या 'पूरन भगत' जैसी सफलता अर्जित नहीं कर सकी, और न ही 'सीता' जैसी बौद्धिक प्रशंसा ही पाप्त कर सकी।


सन 1958 में देवकी बोस को भारत की सरकार ने प्रतिष्ठित "पद्मश्री" से सम्मानित किया था।


11 नवम्बर, 1971 को देवकी बोस का निधन कोलकाता में हुआ।


Debaki Bose  (1898 – 1971), also known as Debaki Kumar Bose, was a top director, writer, and actor of Bengali cinema/Indian cinema. He was born on 25 November 1898 in Akalpoush, Burdwan, Bengal, British India. He died on 17 November 1971 in Calcutta, West Bengal, India. He is known for his innovative use of sound and music in Indian Cinema. He worked first under the banner of British Dominion Films of Dhiren Ganguly and later with Pramathesh Barua's Barua Pictures and finally he joined New Theatres banner in 1932. He started his own production company, Debaki Productions, in 1945.


Debaki Bose was son of a successful advocate in Burdwan. Inspired by Mahatma Gandhi's call for non-co-operation movement, he walked out of an examination and started living on his own. He opened a shop in local market selling towels and he was also an editor of a local weekly named Shakti. Dhiren Ganguly, better known as DG, an established film director from Calcutta, was visiting Burdwan at that time. DG met Debaki and as he came know about Debaki's writing skill, he invited Debaki to come to Calcutta and to write film scripts for him. This culminated into the first film made by British Dominion Films named Kamonar Agun (or Flames of Flesh).



Career highlights
Debaki Bose was a top Indian film director in his time. During this period, many of the Bengali films made by him were also released in Hindi and even in Marathi and Tamil.
Chandidas(1932), directed by him, contained background Music for the first time in Indian Cinema. Music Director was Raichand Boral, also known as R.C. Boral.
Seeta (1934), made under the banner of East India Film Company, was the first Indian talkie shown in any international film festival. It was shown in Venice Film Festival, where it won an Honorary Diploma.He was the 1st Indian director to receive any international award.
Sagar Sangamey (1959) was nominated for Golden Bear at the 9th Berlin International Film Festival (1959).[4] This film got National Film Award for Best Feature Film at the 6th National Film Awards ceremony in 1959.
Arghya (1961) was a very special documentary film, produced by the Government of West Bengal on the occasion of Rabindranath Tagore's birth centennial. It was based on four poems of Tagore: Pujarini, Puratan Bhritya, Abhisar and Dui Bigha Jami.
He received Sangeet Natak Akademi Award for Film Direction in 1957.
He received Padma Shri in Arts in 1958.


Filmography
Director
Panchasar (1930)
Shadows of the Dead (1931)
Aparadhi (1931) (Hindi Title: Aparadhi Abla, English Title: The Culprit)
Nishir Dak (1932)
Chandidas (1932)
Puran Bhagat (1933) (English title: The Devoted)
Meerabai (1933)
Rajrani Meera (1933)
Dulari Bibi (1933)
Seeta (1934)
Jeevan Natak (1935)
Inquilab (1935)
Sonar Sansar (1936) (Hindi Title: Sunhera Sansar)
Bidyapati (1937) (Hindi Title: Vidyapati)
Sapera (1939) (English Title: The Snake-Charmer, Bengali Title: Sapurey)
Nartaki (1940) (Hindi Title: Nartaki)
Abhinava (1940)
Apna Ghar (1942) (Marathi Title: Apule Ghar)
Shri Ramanuja (1943)
Swarg Se Sundar Desh Hamara (1945)
Meghdoot (1945)
Krishna Leela (1946)
Alakananda (1947)
Chandrashekhar (1947)
Sir Sankarnath (1948)
Kavi (1949)
Ratnadeep (1951) (Tamil title: Ratnadeepam)
Pathik (1953)
Kavi (1954)
Bhagaban Shrikrishna Chaitanya (1954) (Hindi Title: Bhagaban Shrikrishna Chaitanya or Chaitanya Mahaprabhu)
Bhalobasa (1955)
Nabajanma (1956)
Chirakumar Sabha (1956)
Sonar Kathi (1958)
Sagar Sangamey (1959) (English Title: Holy Island)
Arghya (1961)


Writer
Flames of Flesh (1930) (screenplay) (Bengali title: Kamonar Agun)
Aparadhi/Aparadhi Abla/The Culprit (1931) (story)
Chandidas (1932) (writer)
Meerabai/Rajrani Meera (1933) (screenplay) (story)
Jeevan Natak (1935) (screenplay) (story)
Inquilab (1935) (screenplay) (story)
Sonar Sansar /Sunehra Sansar (1936) (writer)
Bidyapati (1937) (writer + screenplay)
Sapurey/Sapera (1939) (writer)
Nartaki (1940) (story + screenplay)
Chandrashekhar (1947) (screenplay)
Sagar Sangamey (1959) (English Title: Holy Island)


Actor
Flames of Flesh (1930) (Bengali title: Kamonar Agun)
Panchasar (1930)
Charitraheen (1931)


Awards
National Film Awards
1953: All India Certificate of Merit for Best Feature Film – Bhagavan Sri Krishna Chaitanya.