सितारा देवी ( मृत्यु- 25 नवम्बर, 2014)

November 25, 2017

सितारा देवी (जन्म- 8 नवम्बर, 1920, कोलकाता; मृत्यु- 25 नवम्बर, 2014, मुम्बई, महाराष्ट्र) भारत की प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। उनका नाम कथक नृत्यांगना के रूप में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे जिस मुकाम पर थीं, वहाँ तक पहुँचने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया था। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि मात्र सोलह साल की उम्र में उनका नृत्य देखकर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें "कथक क्वीन" के खिताब से सम्मानित किया था। आज भी लोग इसी खिताब से उनका परिचय कराते हैं। इसके अतिरिक्त सितारा देवी के खाते में 'पद्मश्री' और 'कालिदास सम्मान' भी हैं, जो कथक के प्रति उनकी सच्ची लगन और मेहनत को दर्शाते हैं।


जीवन परिचय
सितारा देवी का जन्म 8 नवम्बर, 1920 में दीपावली की पूर्वसंध्या पर 'कलकत्ता' (आधुनिक कोलकाता) में एक वैष्णव ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका मूल नाम 'धनलक्ष्मी' था, जबकि घर में प्यार से इन्हें 'धन्नो' कहकर पुकारा जाता था। कथक इन्हें अपने पिता आचार्य सुखदेव से विरासत में मिला था। सितारा देवी को बाल्यकाल में ही माता-पिता के प्यार से वंचित होना पड़ा। मुँह टेढ़ा होने के कारण भयभीत अभिभावकों ने इन्हें एक दाई को सौंप दिया था, जिसने आठ साल की उम्र तक इनका पालन-पोषण किया। इसके बाद ही सितारा देवी अपने घर आ सकीं। सितारा देवी के एक भाई और दो बहनें अलकनन्दा और तारा हैं।


उस समय की परम्परा के अनुसार सितारा देवी का विवाह आठ वर्ष की आयु में ही कर दिया गया था। उनके ससुराल वाले चाहते थे कि वह घरबार संभाल लें, किंतु वह स्कूल जाकर शिक्षा ग्रहण करना चाहती थीं। स्कूल जाने के लिए जिद पकड़ लेने पर उनका विवाह टूट गया और उन्हें 'कामछगढ़ हाई स्कूल' में प्रवेश दिला दिया गया। यहाँ सितारा देवी ने एक अवसर पर नृत्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन करके सत्यवान और सावित्री की पौराणिक कहानी पर आधारित एक नृत्य नाटिका में भूमिका प्राप्त करने के साथ ही अपने साथी कलाकारों को भी नृत्य सिखाने की ज़िम्मेदारी प्राप्त की। कुछ समय बाद सितारा देवी का परिवार मुम्बई चला आया। फ़िल्मों में कथक को लाने में इनका प्रमुख योगदान रहा था। बाद के दिनों में प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक के आसिफ़ और फिर प्रदीप बरोट से इन्होंने विवाह किया।


75 साल पहले कोई भी यह नहीं सोचता था कि एक शरीफ़ घराने की लड़की नाच-गाना सीखे। धार्मिक और परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में सितारा देवी के पिता और दादा-परदादा सभी संगीतकार हुआ करते थे, लेकिन परिवार में लड़कियों को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने की परंपरा नहीं थी। सितारा देवी के पिता आचार्य सुखदेव ने यह क्रांतिकारी कदम उठाया और पहली बार परिवार की परंपरा को तोड़ा। सुखदेव जी नृत्य कला के साथ-साथ गायन से भी ज़ुडे हुए थे। वे नृत्य नाटिकाएँ लिखा करते थे। उन्हें हमेशा एक ही परेशानी होती थी कि नृत्य किससे करवाएँ, क्योंकि इस तरह के नृत्य उस समय पुरुष ही करते थे। इसलिए अपनी नृत्य नाटिकाओं में वास्तविकता लाने के लिए उन्होंने घर की बेटियों को नृत्य सिखाना शुरू किया। उनके इस फैसले पर पूरे परिवार ने कड़ा विरोध प्रदर्शित किया था, किंतु वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। इस तरह सितारा देवी और उनकी बहनें अलकनंदा, तारा और उनका भाई भी नृत्य सीखने लगे।


किसी रूढ़ी को तोड़कर कला की साधना में लीन होने का पुरस्कार उन्हें बिरादरी के बहिष्कार के रूप में मिला। समाज से बहिष्कृत होने के बाद भी सितारा देवी के पिता बिना विचलित हुए अपने काम में लगे रहे। बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें फ़िल्म में काम करने का मौका मिल गया। फ़िल्म निर्माता निरंजन शर्मा को अपनी फ़िल्म के लिए एक कम उम्र की नृत्यांगना लड़की चाहिए थी। किसी परिचित की सलाह पर वे बनारस आए और सितारा देवी का नृत्य देखकर उन्हें फ़िल्म में भूमिका दे दी। सितारा देवी के पिता इस प्रस्ताव पर राजी नहीं थे, क्योंकि तब वे छोटी थीं और सीख ही रही थीं। परंतु निरंजन शर्मा ने आग्रह किया और इस तरह वे अपनी माँ और बुआ के साथ मुम्बई आ गईं। कुछ फ़िल्मों में काम करने के अलावा उन्होंने फ़िल्मों में कोरियोग्राफ़ी का काम भी किया।


ऊपर से बाईं ओर- जबीन जलील, सुनीता प्रसाद, अज़रा, निशि, शशिकला, निम्मी, यासमिन
नीचे से बाईं ओर- बेगम पारा, श्यामा, सितारा देवी
सितारा देवी ने अपने सुदीर्घ नृत्य कार्यकाल के दौरान देश-विदेश में कई कार्यक्रमों और महोत्सवों में चकित कर देने वाले लयात्मक और ऊर्जा से भरपूर नृत्य प्रदर्शनों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। वह लंदन में प्रतिष्ठित 'रॉयल अल्बर्ट' और 'विक्टोरिया हॉल' तथा न्यूयार्क के 'कार्नेगी हॉल' में अपने नृत्य का जादू बिखेर चुकी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि सितारा देवी न सिर्फ़ कथक, बल्कि भरतनाट्यम सहित कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और लोक नृत्यों में पारंगत हैं। उन्होंने रूसी बैले और पश्चिम के कुछ और नृत्य भी सीखें हैं। सितारा देवी के कथक में बनारस और लखनऊ के घरानों के तत्वों का सम्मिश्रण दिखाई देता है। वह उस समय की कलाकार हैं, जब पूरी-पूरी रात कथक की महफिल जमी रहती थी।


अपनी कला और नृत्य के प्रति उनके विशेष योगदान ने उन्हें कई पुरस्कार व सम्मान दिलाये हैं-


'पद्मश्री' - 1970
'संगीत नाटक अकादमी सम्मान' - 1987
'शिखर सम्मान' - 1991
'राष्ट्रीय कालिदास सम्मान' - 1994

भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों मधुबाला, रेखा, माला सिन्हा और काजोल जैसी बॉलीवुड की अभिनेत्रियों ने सितारा देवी से ही कथक नृत्य की शिक्षा ली। सितारा देवी ने कई फ़िल्मों में भी काम किया था। उनकी फ़िल्मों में 'शहर का जादू' (1934), 'जजमेंट ऑफ़ अल्लाह' (1935), 'नगीना', 'बागबान', 'वतन' (1938), 'मेरी आंखें' (1939) 'होली', 'पागल', 'स्वामी' (1941), 'रोटी' (1942), 'चांद' (1944), 'लेख' (1949), 'हलचल' (1950) और 'मदर इंडिया' (1957) प्रमुख हैं।


सितारा देवी का निधन 25 नवम्बर, 2014 में मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ। उन्हें पेट दर्द की शिकायत के बाद मुम्बई के जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया था।


Sitara Devi (8 November 1920 – 25 November 2014) was an eminent Indian dancer of the classical Kathak style of dancing. Rabindranath Tagore described her as Nritya Samragni ( नृत्य सम्राज्ञी ), meaning the empress of dance, after watching her performance when she was just 16 years old. The epithet continues, and she is still described as the Kathak queen.


She gave performances in several parts of India, and in several other countries, including at the Royal Albert Hall, London in 1967; and at the Carnegie Hall, New York in 1976.Sitara Devi was born in Kolkata (then Calcutta) on the Dhanteras, 8 November 1920, the eve of the Indian festival of Dipavali.Being born around Dipavali, she was named Dhanalakshmi, an epithet of goddess Lakshmi who is worshiped especially during Dipawali. She could return to live with her parents' only when she was eight. She was born in a Brahmin family, originally from Varanasi, and later settled in Kolkata. Her father, Sukhadev Maharaj, a Vaishanavite scholar of Sanskrit, earned his livelihood by teaching and performing kathak dances in different parts of India. Her mother was Matsya Kumari, who held a relationship with the royal family of Nepal. Sukhadev Maharaj, while serving in the royal court of Nepal had studied Sanskrit and had done an in-depth study of the Bharatanatyashastra; he also practised and performed kathak dancing in which he excelled. Kathak became a source of his living, as also a passion, which he passed on to his daughters, Alaknanda, Tara, and Dhanno; and his sons, Chaube and Pande.


She had met Rabindranath Tagore, and was encouraged by him to revive the lost Indian performing arts (like kathak), after that he passed away, and ensure elevation of them to a dignified status. Sukhadev Maharaj decided to realise this goal by contributing to reforming the kathak style of dancing. At that time, kathak was being performed by nautch girls or boys, and girls of decent families were not expected to learn this style of dancing. He decided to give religious input to the content, which was quite different from the content used by the nautch girls. Moreover, he decided to teach this form of dancing to his daughters and sons. Elders of his community were scandalised, and Sukhadev Maharaj was virtually excommunicated.


Maharaj and his family members had to face the ire of the community members, and his daughters were called prostitutes. This did not deter him in his determination. Devi, recalling those moments, said: “My father used to say that when Radha could have danced for Krishna why not our girls? Why should men appropriate the right to dance?”[citation needed] Maharaj changed his residence, and came to another area of Varanasi. He established a school to teach children including his own daughters and sons dancing. He admitted children of prostitutes who came to the school to learn dancing. Once, the law enforcement authorities came to enquire about the affairs of the school, and Maharaj presented a performance based on the tales of the Mahabharata. She had been watching her sister, twenty years senior to her, learning dance, and she had managed to learn dancing well just by observation and self-practice.


Like the tradition of the time, Devi was to be married when she was a small girl of eight, and her child bridegroom's family wanted to solemnise the marriage. However, she resisted, and wanted to be in a school. At her insistence, the marriage did not take place, and she was admitted into the Kamachhagarh High School. While at this school, a dance drama based on the mythological story of Savitri and Satyavan was to be enacted in a cultural program to be conducted by the students of the school. The school was searching amongst the students for someone to do a dance sequence embedded in the dance drama. Dhanno prevailed upon her teacher by showing her an impromptu dance performance. The performance clinched the role for her and she was also assigned the task to teach the dance to her co-performers in the sequence. After the dance drama, a local newspaper named the Aaj reported about the cultural program emphasising that a little girl name Dhanno had enchanted the audience by her dance performance. Her father saw the news, and this changed his perception about his girl with the "twisted mouth". Dhanno was re-christened as Sitara, and she was entrusted into the charge of her elder sister, Tara for imparting her dancing lessons. Incidentally, Tara is the mother of famous kathak dancer, Gopi Krishna.


By the time Devi had turned ten, she was giving solo performances, mostly during the fifteen-minute recess during movies in a cinema of her father's friend. Her commitment to learning dance left her with very little time, and she did not continue her schooling. By the time she was eleven, her family shifted to Bombay (now called Mumbai). Soon after reaching Bombay, Devi gave a kathak performance in Atiya Begum Palace before a select audience, which included Rabindranath Tagore, Sarojini Naidu and Sir Cowasji Jehangir. She impressed Tagore who wanted her to give a special performance in Tata Palace of the Tata Group. There the eleven-year-old dancing damsel studied kathak, with all its nuances, for three hours. Tagore called her to felicitate her in the traditional Indian style of giving her a shawl and a gift of Rs. 50 as a token of her appreciation. Recalling those moments, Devi once said: “But as I thrust out my hand to receive gifts, I remember my father nudged me and whispered in my ear: ‘Don’t take only the gifts! He is a great man: ask for his blessings, girl!’ Obediently, I asked Gurudev to bless me that I would become a great dancer some day.”


Her debut was at Jehangir Hall (Mumbai), then the centre of metro’s cultural life. When she was a twelve-year-old girl, Devi was recruited by Niranjan Sharma, a filmmaker and a dance director, and she gave dance sequences in some Hindi movies including her debut in Usha Haran 1940, Nagina 1951, Roti, Vatan 1938, Anjali 1957 (directed by Chetan Anand, brother of Dev Anand). In Mother India 1957, she performed a Holi dance dressed as a boy, and this was her last dance in any movie. She stopped performing dances in movies, as they were adversely affecting her study in the classical dance, kathak.
Devi received a number of awards, including Sangeet Natak Akademi Award (1969) and the Padma Shree (1973), Kalidas Samman (1995) and Nritya Nipuna.[citation needed]


She refused to accept the Padma Bhushan award, declaring, "it is an insult, not an honor," and as a report from the Press Trust of India quoted her saying: "is this government not aware of my contribution to Kathak? I will not accept any award less than Bharat Ratna."


On 8 November 2017, Google showed a Doodle in India for Sitara Devi’s 97th Birthday.
Although her forte was kathak, she was also an accomplished dancer in many other styles of dancing including Bharatanatyam and many forms of folk dances of India. She also learned the Russian ballet, and other dances of the western world. With advancing age, her dancing activities diminished, and she was working on compiling a book encapsulating the research done by her father and her in the field of dancing, especially in kathak style of dancing. She taught kathak dancing to Bollywood celebrities such as Madhubala, Rekha, Mala Sinha, and Kajol. She envisioned formalizing her teaching, and planned to set up a Kathak training academy.


She died on 25 November 2014, at Jaslok Hospital in Mumbai, after a prolonged illness.