चन्दूलाल जयसिंह भाई शाह (मृत्यु- 25 नवम्बर, 1975)

November 25, 2017

चन्दूलाल जयसिंह भाई शाह (जन्म- 13 अप्रैल, 1898, गुजरात; मृत्यु- 25 नवम्बर, 1975, मुंबई) हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक, निर्माता और पटकथा लेखक थे। उन्हें भारतीय सिने इतिहास की प्रसिद्ध हस्तियों में गिना जाता है। वह एक प्रकार से संयोगवश ही फ़िल्मों में आये थे। उन्होंने अपने दौर के सबसे कुशल व्यावसायिक फ़िल्मकार बनकर सबको चमत्कृत कर दिया था। संयोग से ही सही, लेकिन इस क्षेत्र में आने के बाद चन्दूलाल शाह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह इस क्षेत्र में नहीं आये होते तो हिन्दी के व्यावसायिक सिनेमा का नुकसान ही होता, क्योंकि आज हिन्दी का व्यावसायिक सिनेमा जिस तरह का है, उसमें एक बड़ी भूमिका चन्दूलाल शाह जैसे प्रयोगवादी फ़िल्मकारों की भी रही है।


चन्दूलाल शाह का जन्म 13 अप्रैल, 1898 में जामनगर, गुजरात में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा कॉमर्स विषय के साथ स्नातक की डिग्री प्राप्त करके पूर्ण की थी। शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे शेयर बाज़ार के कारोबार में लग गये। चन्दूलाल के बड़े भाई दयाराम शाह भी यद्यपि शेयरों की ख़रीद-फरोख्त का काम करते थे, लेकिन इसके साथ ही वे फ़िल्मों के लिए कहानियाँ भी लिखा करते थे। बीच-बीच में चन्दूलाल अपने बड़े भाई का हाथ बंटा दिया करते थे।


चन्दूलाल शाह को सन 1925 में संयोग से एक फ़िल्म के निर्देशन का मौका मिला। दरअसल वह अपने बड़े भाई की लिखी कहानियों पर होने वाली शूटिंग को देखने स्टूडियो जाया करते थे। वहाँ वे निर्देशकों के साथ बड़े दोस्ताना स्वभाव से वक्त गुजारते थे। कभी-कभी अपने सुझाव भी देते, जो बेहद ताजगी भरे और पहली ही नजर में निर्देशकों को पसंद आने वाले होते थे। निर्देशक उनकी तारीफ़ करते, और कहते थे एक दिन वे ज़रूर बड़े निर्देशक बनेंगे। यह वाक्य सच हुआ और जल्द ही वह दिन आ गया। 'लक्ष्मी फ़िल्म कंपनी' की 'विमला' नामक फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी, अचानक फ़िल्म के निर्देशक मणिलाल जोशी बीमार पड़ गये। जोशी जी ने निर्माता को सुझाव दिया कि वह चन्दूलाल को निर्देशक के तौर पर रख लें। निर्माता ने ऐसा ही किया और चन्दूलाल शाह अपने से लगायी गई उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरे। उन्होंने तय समय पर फ़िल्म पूरी कर दी। 'लक्ष्मी फ़िल्म कंपनी' को उनका काम बहुत पसंद आया और उसी वर्ष कंपनी ने उन्हें दो और फ़िल्में निर्देशन के लिए दे दीं।


अपनी इन दोनों फ़िल्मों के पूरा होते ही चन्दूलाल शाह फिर से वापस शेयर बाज़ार की दुनिया में लौट आये, किंतु उनकी किस्मत में तो फ़िल्म निर्देशक बनना ही लिखा था। दूसरी बार भी फ़िल्म निर्देशन में उनका आना संयोग से हुआ, लेकिन इस बार वे हमेशा के लिए इस क्षेत्र में आ गये। हुआ यह कि होमी मास्टर फ़िल्म 'शीरी फ़रहाद' का निर्देशन कर रहे थे। एक दिन जब वह कलाकारों को कुछ दृश्य समझा रहे थे, तभी फिसल कर गिर पड़े और उनकी टांग टूट गयी। उन्होंने दर्द में कराहते हुए चन्दूलाल शाह को याद किया और चन्दूलाल हाजिर हो गये। उन्होंने फ़िल्म का निर्देशन करना स्वीकार कर लिया, लेकिन उसकी पटकथा बदल दी। फ़िल्म हिट हुई और चन्दूलाल शाह भी फ़िल्मी क्षेत्र में स्थापित हो गये।


चन्दूलाल शाह बड़े माहिर निर्देशक सिद्ध हुए थे। उनके पास अपनी हर योजना का मजबूत आधार होता था। यही वजह है कि उनसे अभिनेता हमेशा संतुष्ट रहते थे, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने उस जमाने के बड़े-बड़े अभिनेताओं, अभिनेत्रियों से छोटी-छोटी भूमिकाएँ तक करा लीं। 1926 में बनी फ़िल्म 'टाइपिस्ट गर्ल' में नायिका सुलोचना थीं। अभिनेत्री गौहर ने उस फ़िल्म में एक छोटी-सी भूमिका निभाई थी। जबकि इसके पहले गौहर ने नायिका के अलावा कभी दूसरी कोई भूमिका ही नहीं निभाई थी।


चन्दूलाल शाह अपने तमाम सामयिक निर्देशकों से इसलिए भी आगे निकल गये और ख़ास बने, क्योंकि उन्होंने तय किया कि वह दूसरे फ़िल्मकारों की तरह पौराणिक फ़िल्में नहीं बनायेंगे। उन्होंने सामाजिक मुद्दे वाली फ़िल्में बनाने का भी निश्चय किया। यह निर्णय उन दिनों कोई मामूली निर्णय नहीं था, क्योंकि पौराणिक फ़िल्में बनाना उन दिनों कारोबारी नजरिए से सबसे ज्यादा सुरक्षित था। चन्दूलाल शाह ने ही हॉलीवुड फ़िल्मों की नकल करके हिन्दी फ़िल्में बनाने का चलन शुरू किया था। सन 1928 में उन्होंने 'जगदीश फ़िल्म कंपनी' के लिए 'विश्व मोहनी', 'गृह लक्ष्मी', 'चंद्रमुखी' और 'राज लक्ष्मी' नाम की चार फ़िल्में बनायीं। ये चारों फ़िल्में आदर्श अबला के फ़ार्मूले पर आधारित थीं। उनकी इन सभी फ़िल्मों में एक केन्द्रीय संदेश यह था कि पत्नियों को पतियों की सेविका नहीं, बल्कि दोस्त होना चाहिए। तत्कालीन समाज में यह सोचना कल्पनातीत था। इसलिए भारत की जनता को यह विचार बहुत ही ताज़ा और आकर्षक प्रतीत हुआ।


1929 में चन्दूलाल शाह और गौहर ने मिलकर अपने मित्र बिट्ठलदास ठाकुर के साथ 'रणजीत फ़िल्म कंपनी' की स्थापना की। दोनों की यह व्यावसायिक साझेदारी 35 सालों तक लगातार चलती रही। चन्दूलाल शाह बहुत नियमबद्ध तरीके से फ़िल्में बनाते थे। उनकी और गौहर की साझेदारी भी बहुत शानदार थी। उन दोनों ने बड़ी कुशलता से अपने व्यापार को आगे बढ़ाया। उनके स्टूडियो में उन दिनों 600 लोग काम करते थे, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कारोबार कितने बड़े पैमाने का रूप ले चुका था। चन्दूलाल शाह मूलत: दो किस्म की फ़िल्में बनाते थे- पहला सामाजिक फ़िल्में, जो एक तरह से भावुकता से भरपूर होती थीं, और दूसरी स्टंट फ़िल्में, जिनमें मारधाड़ अधिक होती थी। स्टंट फ़िल्मों का बजट सामाजिक फ़िल्मों से ज़्यादा होता था, क्योंकि उन दिनों उनमें बड़ी संख्या में घोड़े, राजकुमार और राजकुमारियों की पोशाकें आदि की आवश्यकता पड़ती थी।


चन्दूलाल शाह की व्यावसायिक कुशलता का अंदाज इससे भी हो जाता है कि ध्वनि के आगमन के बावजूद मूक युग का उनका साम्राज्य ढहा नहीं, बल्कि पूरी पहचान के साथ खड़ा रहा। 1931-1946 के बीच चन्दूलाल शाह ने 100 से भी ज़्यादा फ़िल्में बनायीं। भारत में किसी भी एक स्टूडियो द्वारा इतनी अधिक फ़िल्में नहीं बनायी गयी थीं।


फ़िल्म निर्देशन
टाइपिस्ट गर्ल - 1925
विश्वमोहिनी - 1928
गृहलक्ष्मी - 1928
राजपूतानी - 1929
बिखारन - 1929
राजलक्ष्मी - 1930
सती सावित्री - 1932
राधा रानी - 1932
मिस 1933 - 1933
गुणसुन्दरी - 1934
कीमती आँसू - 1935
सिपाही की सजनी - 1936
प्रभू का प्यारा - 1936
अछूत - 1940
पापी - 1953

फ़िल्म निर्देशन के साथ-साथ चन्दूलाल शाह ने फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन का कार्य भी किया था, जैसे-


सती सावित्री - 1932
गुणसुन्दरी - 1934
अछूत - 1940
पापी - 1953

चन्दूलाल शाह की अंतिम फ़िल्म 'पापी' थी, जिसे उन्होंने 1953 में बनाया था। फ़िल्म निर्देशन में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले चन्दूलाल शाह का 25 नवम्बर, 1975 को 77 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हुआ।