वी. के. मूर्ति ( जन्म: 26 नवम्बर, 1923 )

November 26, 2017

वी. के. मूर्ति ( जन्म: 26 नवम्बर, 1923 - मृत्यु: 7 अप्रॅल, 2014) भारतीय सिने जगत में एक जाना-पहचाना नाम है। वे हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध सिनेमेटोग्राफ़र हैं। एक कैमरामैन के रूप में वी. के. मूर्ति ने बहुत नाम कमाया है। उनके कैमरे का जादू मुस्कुराते होठों की उदासी, आँखों के काले घेरों की स्याह नमी, गुलाबी सर्दियों की गुनगुनाती गर्माहट और किताबों में छुपी चिठ्ठियों से उठती प्रेम की खुशबू आदि सब कुछ कैद कर सकता है। वी. के. मूर्ति कला और तकनीक के अद्भूत सम्मिश्रण तथा हिन्दी सिनेमा में प्रकाश और छाया के अतुलनीय प्रयोगों का नाम है। वे ऐक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त की टीम के साथ जुड़े थे। 'प्यासा', 'काग़ज़ के फूल', 'चौंदहवीं का चांद' और 'साहब बीबी और ग़ुलाम' जैसी गुरुदत्त की ब्लैक ऐंड वाइट फ़िल्मों में उन्होंने लाइट और कैमरे से चमत्कार उत्पन्न करके दर्शकों का मन मोह लिया था। उन्हें देश के सबसे बड़े सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (2008) के लिए भी चुना गया।


वी. के. मूर्ति का जन्म 26 नवम्बर, 1923 को मैसूर, कर्नाटक में हुआ था। अपने स्कूली जीवन में ही अभिनेता या फिर एक फ़िल्म तकनीशियन बनने के लिये वह मुंबई आ गए। यहाँ किसी भी तरह का कोई उत्साहवर्धन उन्हें नहीं मिला और वे वापस घर आ गये। बाद में वी. के. मूर्ति मैसूर के दीवान, विश्वेश्वरैया द्वारा स्थापित 'बैंगलोर इंस्टीट्यूट' से जुड़ गये। यहाँ इन्होंने सिनेमाटोग्राफी की शिक्षा ली और डिप्लोमा लिया।


इंस्टीट्यूट छोडऩे के बाद भी वायलिन वादक की उनकी ट्रेनिंग ने मूर्ति को फ़िल्मों में काम दिलाने में मदद की। एक कैमरामैन के रूप में उन्हें पहला मौका सिनेमाटोग्राफर द्रोणाचार्य के सहायक की तरह काम करते हुये मिला। पश्चिमी फ़िल्मों में प्रकाश और छाया के कलात्मक प्रयोगों से प्रेरणा लेते हुये वी. के. मूर्ति ने भारतीय फ़िल्मों में भी कई प्रयोग किये। वी. के. मूर्ति फाली मिस्त्री की कला से भी ख़ासे प्रभावित हुए। प्रकाश के स्त्रोतों का निश्चित फ़्रेमों ओर जीवंत प्रारूपों में प्रयोग और इन पर ख़ास फ़ोकस भारतीय सिनेमा को मिस्त्री की अनमोल देन है। इन्होंने 'आरजू' और 'उडऩ खटोला' जैसी फ़िल्मों में मिस्त्री के सहायक की तरह काम किया और प्रकाश-बिंबों के साथ नये प्रयोग करने सीखे।


एक स्वतंत्र कैमरामैन के रूप में वी. के. मूर्ति की पहली फ़िल्म 1952 में गुरुदत्त के साथ 'जाल' रही। गुरुदत्त बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म 'बाजी' बना रहे थे और वी. के. मूर्ति मुंबई के प्रसिद्ध स्टूडियो में सहयोगी थे। वी. के. मूर्ति ने उन्हें कई शॉट्स के दौरान सुझाव दिए तो गुरुदत्त ने उनसे शॉट लेने के लिए कहा। इस तरह मूर्ति को गुरुदत्त की पहली फ़िल्म में मौका मिला। उनकी कलात्मकता, तकनीकी गुणवत्ता और प्रभावी प्रयोगों की क्षमता ने गुरुदत्त का दिल जीत लिया। इसके बाद मूर्ति ने गुरुदत्त की लगभग सभी फ़िल्मों में काम किया। अंत तक दोनों लोगो का साथ बना रहा। 'काग़ज़ के फूल' और 'साहिब, बीबी और ग़ुलाम' सरीखी फ़िल्में विस्तृत फ़्रेमों और प्रकाश के बहुप्रयोगों के साथ अद्वितीय सिद्ध हुईं, जिनमें प्रकाश और छाया के प्रयोग कहानी का हिस्सा प्रतीत होते हैं। इन दोनों फ़िल्मों ने 1959 और 1962 में मूर्ति को 'सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र' का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' दिलवाया।


हमेशा नये प्रयोग करने वाले मूर्ति ने भारत की पहली सिनेमास्कोप फ़िल्म 'काग़ज़ के फूल' में काम किया। अपनी एक योजना के तहत उन्होंने स्टूडियो की छत के एक हिस्से को हटा दिया, ताकि प्राकृतिक प्रकाश अंदर आ सके। इस तरह फ़िल्म का गाना 'वक्त ने किया क्या हंसी सितम....' शूट हुआ। 'चौहदवी का चांद' में रंगों के विभिन्न प्रयोगों का सफल प्रयास वी. के. मूर्ति ने किया। यहाँ भी मूर्ति ने प्रकाश और रंगों का विभिन्न तापक्रम पर उपयोग किया। इनकी अन्य ध्यान आकर्षण करने वाली फ़िल्मों में शामिल हैं- राज खोसला की थ्रीलर फ़िल्म 'सीआईडी' और श्याम बेनेगल की फ़िल्में 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' तथा 'तमस'। फ़िल्म इंडस्ट्री के पहले ऐसे कैमरामैन, जिन्हें 2008 में पहली बार जब 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' देने की घोषणा की गई तो वी. के. मूर्ति की आँखें भीगी हुई थीं, क्योंकि पहली बार किसी कैमरामैन के रचनात्मक योगदान का सही अर्थों में मूल्यांकन किया गया था। सिनेमा सृजन में निर्माण, लेखन, निर्देशन, अभिनय, संपादन और संगीत आदि को ही शायद असल माना जाता रहा। लेकिन सिनेमेटोग्राफ़ी की अद्भुत कला को वी. के. मूर्ति के माध्यम से सम्मान दिया गया।


वी. के. मूर्ति को फ़िल्म 'काग़ज़ के फूल' तथा 'साहिब, बीबी और ग़ुलाम' के लिए सन 1959 और 1962 में 'सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़र' का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' मिला। 2005 के लिए 'आईआईएफ़ए लाइफ़ टाइम एचीवमेंट अवार्ड' से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (2008) के लिए भी उन्हें चुना गया। ये पुरस्कार उन्हें भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने प्रदान किया।


फ़िल्में


जाल - 1952
प्यासा - 1957
काग़ज़ के फूल - 1959
साहिब, बीबी और ग़ुलाम - 1962
डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया
तमस
सीआईडी

छह दशक तक अपनी कलात्मक तकनीकी प्रतिभा से हिन्दी सिनेमा को उर्वर बनाने वाले वी. के. मूर्ति के अनुसार- "समय के साथ लोगों की पसंद और सिनेमा का स्तर भी बदल गया है। भारतीय सिनेमा के सौ बरस के सुनहरे सफर में तकनीशियनों की भूमिका धीरे-धीरे कम से कमतर होती जा रही है। अब फ़िल्मों में मेरे जैसे तकनीशियनों की जगह आधुनिक मशीनों ने ले ली है। जनरुचि बदल गई है और इसी के हिसाब से सिनेमा का सृजन हो रहा है।"


दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित वी. के. मूर्ति का 7 अप्रॅल, 2014 को निधन हो गया। 91 वर्ष के मूर्ति गुरुदत्त की 'प्यासा' और 'साहब, बीबी और ग़ुलाम' जैसी फ़िल्मों में कैमरे के काम के लिए प्रसिद्ध थे। वी. के. मूर्ति की भतीजी नलिनी वासुदेव के अनुसार, 'इनका बेंगलुरु अपने शंकरपुरम आवास पर सोमवार सुबह निधन हो गया। उन्हें केवल उम्र संबंधी परेशानियां थीं।' इस प्रसिद्ध सिनेमेटॉग्राफर के परिवार में उनकी बेटी छाया मूर्ति हैं। ख़ास बात यह है कि मूर्ति भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से पुरस्कृत पहले टेक्निशन थे। उन्हें वर्ष 2008 में इस सम्मान से नवाजा गया था।


Venkatarama Pandit Krishnamurthy (26 November 1923 – 7 April 2014) known professionally as V. K. Murthy, was an Indian cinematographer.[1] Murthy, a one-time violinist and jailed freedom fighter, was Guru Dutt's regular cameraman on his movies. He provided some of Indian cinema's most notable images in starkly contrasted black and white. He also shot India's first cinemascope film, Kaagaz Ke Phool. For his contribution to film industry, particularly Indian film industry he was awarded the IIFA Lifetime Achievement Award in 2005. In 2010, he was honoured with the Dada Saheb Phalke Award for his contributions to Indian cinema.



Murthy was born on 26 November 1923 in Mysore. He studied at the Lakshmipuram school, where he chose music as his elective subject and learned to play the violin. He obtained his Diploma in Cinematography from Sri Jayachamarajendra Polytechnic (the present Government Film and Television Institute) in Bangalore in 1946. As a student, he took part in the Indian freedom struggle and was jailed in 1943.[3] Feeling strongly attracted to the visual medium and wishing to pursue a career in the field, he quit his studies and left for Bombay (now Mumbai).



Murthy began his career in films with Maharana Prathap. He worked as an assistant to cinematographer V. Ratra in the 1951 film Baazi which was Guru Dutt's first as a director. Dutt, impressed by Murthy's smooth and fluid captures with the camera, took him on for his next film Jaal (1952), which was Murthy's first film as a chief cinematographer.[4] Murthy, then became a part of the Guru Dutt team, till the latter's death in 1964.


In 1959 came Guru Dutt's Kaagaz Ke Phool, a film critically acclaimed as one of the director's best. More than anything else, it won many accolades for its cinematography and created unparalleled history in the field. V. K. Murthy, as the cinematographer won widespread praise and received the Filmfare Award for Best Cinematographer. He repeated the feat with Sahib Bibi Aur Ghulam winning the award again in 1962. He worked exclusively with Dutt until the director's death. Some of Murthy's best work came in Guru Dutt's movies like Pyaasa, Sahib Bibi Aur Ghulam and Aar Paar. Following Dutt's death, Murthy worked with Kamal Amrohi on his masterpiece, Pakeezah and Razia Sultan. Post Guru Dutt, he like many of the director's team was not able to give any pinnacle work. In later years, he worked with directors like Pramod Chakravarthy (Naya Zamana, Jugnu), Shyam Benegal and Govind Nihalani (Tamas).


Murthy was also the cinematographer for one of the most acclaimed Kannada film Hoovu Hannu, a directorial production of Rajendra Singh Babu and also appeared in that film in a role. Murthy was also the principal cinematographer of the widely acclaimed television series produced by Doordarshan and directed by Shyam Benegal, Bharat Ek Khoj.



Awards
Filmfare Best Cinematographer Award - Kaagaz Ke Phool (1959)
Filmfare Best Cinematographer Award - Sahib Bibi Aur Ghulam (1962)
IIFA Lifetime Achievement Award - Amsterdam, 2005.
Dada Saheb Phalke Award for 2008
d 80, Murthy moved back to Bangalore from Mumbai in 2001 to lead a retired life. He died of natural causes aged 91 on 7 April 2014 at his residence in Bangalore.



Selected filmography
Deedar (1992)
Khule Aam (1992)
Kalyug Aur Ramayan (1987)
Nastik (1983)
Jugnu (1973)
Naya Zamana (1971)
Suraj (1966)
Love in Tokyo (1966)
Ziddi (1964)
Sahib Bibi Aur Ghulam (1962)
Chaudhvin Ka Chand (1960)
Kaagaz Ke Phool (1959)
12 O'Clock (1958)
Pyaasa (1957)
C.I.D. (1956)
Mr. & Mrs. '55 (1955)
Aar-Paar (1954)
Jaal (1952)
Baazi (1951)