खुदीराम बोस ( जन्म: 3 दिसंबर, 1889)

December 03, 2017

खुदीराम बोस ( जन्म: 3 दिसंबर, 1889 - मृत्यु : 11 अगस्त, 1908) भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र 19 साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये। भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास क्रांतिकारियों के सैकड़ों साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है। ऐसे ही क्रांतिकारियों की सूची में एक नाम खुदीराम बोस का है।


जीवन परिचय
खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 ई. को बंगाल में मिदनापुर ज़िले के हबीबपुर गाँव में त्रैलोक्य नाथ बोस के यहाँ हुआ था। खुदीराम बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। खुदीराम बोस की बड़ी बहन ने उनका लालन-पालन किया था। सन् 1905 ई. में बंगाल का विभाजन होने के बाद खुदीराम बोस देश के मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था।


खुदीराम बोस राजनीतिक गतिविधियों में स्कूल के दिनों से ही भाग लेने लगे थे। उन दिनों अंग्रेज़ों से छोटे-छोटे हिन्दुस्तानी स्कूली बच्चे भी नफ़रत किया करते थे। वे जलसे जलूसों में शामिल होते थे तथा अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ नारे लगाते थे। बोस को ग़ुलामी की बेड़ियों से जकड़ी भारत माता को आज़ाद कराने की ऐसी लगन लगी कि उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफ़न बांधकर जंग-ए-आज़ादी में कूद पड़े।


वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम पंफलेट वितरित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चलाए गए आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर भाग लिया।


पुलिस ने 28 फ़रवरी, सन् 1906 ई. को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बाँटते हुए बोस को दबोच लिया। लेकिन बोस मज़बूत थे। पुलिस की बोस ने पिटाई की और उसके शिकंजे से भागने में सफल रहे। 16 मई, सन् 1906 ई. को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। 6 दिसम्बर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे। उन्होंने अंग्रेज़ी चीज़ों के बहिष्कार आन्दोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया।


भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक चरण में कई क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्‍होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध आवाज़ उठाई। खुदीराम बोस भारत की स्‍वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास में संभवतया सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे, जो भारत माँ के सपूत कहे जा सकते हैं। बंगाल के विभाजन के बाद दुखी होकर खुदीराम बोस ने स्‍वतंत्रता के संघर्ष में अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से एक मशाल चलाई। उन्‍होंने ब्रिटिश राज के बीच डर फैलाने के लिए एक ब्रिटिश अधिकारी के वाहन पर बम डाल दिया।


कलकत्ता में उन दिनों किंग्सफोर्ड चीफ प्रेंसीडेसी मजिस्ट्रेट था। वह बहुत सख़्त और क्रूर अधिकारी था। वह अधिकारी देश भक्तों, विशेषकर क्रांतिकारियों को बहुत तंग करता था। उन पर वह कई तरह के अत्याचार करता। क्रान्तिकारियों ने उसे मार डालने की ठान ली थी। युगान्तर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेन्द्र कुमार घोष]ने घोषणा की कि किंग्सफोर्ड को मुज़फ्फरपुर में ही मारा जाएगा। इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रपुल्ल चाकी को चुना गया।


ये दोनों क्रांतिकारी बहुत सूझबूझ वाले थे। इनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। देश भक्तों को तंग करने वालों को मार डालने का काम उन्हें सौंपा गया था। एक दिन वे दोनों मुज़फ्फरपुर पहुँच गए। वहीं एक धर्मशाला में वे आठ दिन रहे। इस दौरान उन्होंने किंग्सफोर्ड की दिनचर्या तथा गतिविधियों पर पूरी नज़र रखी। उनके बंगले के पास ही क्लब था। अंग्रेज़ी अधिकारी और उनके परिवार अक्सर सायंकाल वहाँ जाते थे।


30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्स फोर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुँचे। रात्रि के साढे़ आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उसके साथी ने किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंक दिया। देखते ही देखते बग्घी के परखचे उड़ गए। उसमें सवार माँ बेटी दोनों की मौत हो गई। क्रांतिकारी इस विश्वास से भाग निकले कि किंग्सफोर्ड को मारने में वे सफल हो गए है।


खुदीराम बोस और घोष 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। खुदीराम बोस पर पुलिस को इस बम कांड का संदेह हो गया और अंग्रेज़ पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मारकर शहादत दे दी पर खुदीराम पकड़े गए। उनके मन में तनिक भी भय की भावना नहीं थी। खुदीराम बोस को जेल में डाल दिया गया और उन पर हत्या का मुक़दमा चला। अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफोर्ड को मारने का प्रयास किया था। लेकिन उसे इस बात पर बहुत अफ़सोस है कि निर्दोष कैनेडी तथा उनकी बेटी ग़लती से मारे गए।


मुक़दमा केवल पाँच दिन चला। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें प्राण दण्ड की सज़ा सुनाई गई। इतना संगीन मुक़दमा और केवल पाँच दिन में समाप्त। यह बात न्याय के इतिहास में एक मज़ाक बना रहेगा। 11 अगस्त, 1908 को इस वीर क्रांतिकारी को फाँसी पर चढा़ दिया गया। उन्होंने अपना जीवन देश की आज़ादी के लिए न्यौछावर कर दिया


मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे। इनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। इनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। इनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं।


इतिहासकार शिरोल के अनुसार- बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह शहीद और अधिक अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। स्कूल-कॉलेज बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था। खुदीराम बोस को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है। अपनी निर्भीकता और मृत्यु तक को सोत्साह वरण करने के लिए वे घर-घर में श्रद्धापूर्वक याद किए जाते हैं।


Khudiram Bose Bengali (3 December 1889 – 11 August 1908) was an Indian Bengali revolutionary, one of the youngest revolutionaries early in the revolutionary movement for Indian independence. On the day of his hanging, he was only 18 years, 8 months and 8 days old.


Khudiram Bose was born on December 3, 1889 in the small village named "Habibpur" situated under Keshpur Police Station in Midnapore district of Bengal. His father was a Tehsildar in the Nerajol. Khudiram was the fourth child in a family of three daughters. His parents, Trailokyanath Bose and Lakshmipriya Devi had two sons before the birth of Khudiram but both of them died prematurely. Following the traditional believes and customs, the new born child was symbolically sold to his eldest sister in exchange of three handful of food grains locally known as Khud, in an attempt to save him from dying at an early age. This way he acquired the name Khudiram. He lost his mother when he was six year old. His father died a year after. Aparupa Roy, his elder sister, brought him to her house at Hatgachha village under Daspur police station. Aparupa's husband, Amritalal Roy got him admitted to Tamluk's Hamilton High School.


In 1902 and 1903, when Sri Aurobindo and Sister Nivedita respectively visited Medinipur and held a series of public lectures along with secret planning sessions with the revolutionary groups; Khudiram was among the teenage student community of the town which was fired up with a burning inspiration of revolution. Apparently he joined Anushilan Samiti, and came into contact with the network of Barindra Kumar Ghosh of Calcutta. He became a volunteer at the age of 15, and was arrested for distributing pamphlets against the British rule in India. At the young age of sixteen, Khudiram took part in planting bombs near police stations and targeted government officials.


In 1907, Barindra Kumar Ghosh arranged to send to Paris one of his associates by the name of Hem Chandra Kanungo (Hem Chandra Kanungo Das), who was to learn the art of bomb making from Nicholas Safranski, a Russian revolutionary in exile in the French Capital.[8] Returning to Bengal, Hem began working with Barin Ghosh again. With Fraser alerted, a new target was selected in Douglas Kingsford. Kingsford was the Chief Magistrate of the Presidency court of Alipore, and had overseen the trials of Bhupendranath Dutta and other editors of Jugantar, sentencing them to rigorous imprisonment.Jugantar itself responded with defiant editorials.The defiance of Jugantar saw it face five more prosecutions that left it in financial ruins by 1908. These prosecutions brought the paper more publicity, and helped disseminate the Anushilan Samiti's ideology of revolutionary nationalism. Shukla Sanyal notes in 2014 that revolutionary terrorism as an ideology began to win support among a significant populace in Bengal, tacitly even if not overt Kingsford also earned notoriety among nationalists when he ordered the whipping of a young Bengali boy by the name of Sushil Sen for participating in the protests that followed the Jugantar trial. Thus during his posting as Chief Magistrate of Calcutta Presidency, Kingsford had become unpopular for passing harsh and cruel sentences on young political workers. He was also noted for inflicting corporal punishments on such workers


The historical trial started on 21 May 1908 in the court of Mr. Corndoff, the Judge and two Indians, Nathuni Prasad and Janak Prasad, were appointed as jury. Along with Khudiram, two others were tried for assisting the boys in their mission — Mrityunjay Chakraborty and Kishorimohan Bandopadhyay, who had accommodated Khudiram Bose and Prafulla Chaki in his dharmashala for their mission. Mrityunjay died during the trial, and subsequently the trail of Kishorimohan was separated from that of Khudiram.


Mr. Mannuk and Binodbihari Majumdar became the prosecutors for the British government, while eminent lawyers Kalidas Basu, Upendranath Sen and Kshetranath Bandopadhyay took up Khudiram's defense. They were joined later in the trial by Kulkamal Sen, Nagendra Lal Lahiri and Satischandra Chakraborty—all of them fighting the case without any fees, fighting for their country.


On 23 May, Khudiram resubmitted his statement to magistrate E.W. Bredhowd, denying any involvement or responsibility in any aspect or stage of the entire mission and operation down to the bombing. Initially Khudiram was not ready to sign in this statement, but sign at length on persuasion from his lawyers. On 13 June, the scheduled date for the verdict and sentence, the judge and the prosecutors received an anonymous letter of warning, which told them that there was one more bomb coming for them from Kolkata, and that henceforth it will be the Biharis, and not the Bengalis, who are going to kill them. On the other hand, that made the defense lawyers more confident, that it was proof that there could be other masterminds and executors of the Muzaffarpur bombing other than Khudiram, and that along with Khudiram's age, should make the judge deliver a sentencing other than death. But to the disappointment to all, the Judge pronounced the death sentence for Khudiram.


Khudiram's immediate and spontaneous response was to smile. The judge, surprised, asked Khudiram whether he had understood the meaning of the sentence that was just pronounced. Khudiram replied that he surely had. When the judge asked him again whether he had anything to say, in front of a packed audience, Khudiram replied with same smile that if he could be given some time, he could teach the judge the skill of bomb-making. By then the Judge was instructing the police to escort the boy out of the courtroom.


As per the legal system, Kudiram had 7 days time to appeal to the High Court. Khudiram refused to make appeal. He was by then on a different mental plane, and was fully prepared to embrace his destiny. However, after some persuasion by his counsellors — with the logic that if he receives a life sentence instead of getting hanged because of this appeal, he would live to serve his nation once free and he would have age on his side when that happens — Khudiram finally agreed, in a detached manner to go along with his defense team.


The High Court hearing took place on 8 July. Narendrakumar Basu came to Khudiram's defense, and concentrated all his legal skills and experience on this case to save the precious life of a boy who had overnight become a wonder and a hero for the whole country. He challenged the verdict of the session court by saying that the judging was not according to law and was flawed. He reasoned that according to article 164 of the penal code, the accused is required to submit his statement in front of a first class magistrate (which Mr. Woodman) was not, and moreover during the first statement Khudiram was not told anything of the person's identity and position. Secondly, pointed out Basu, the article 364 requires that all questions to the accused be made in the mother tongue of the same, and all answers from the accused in his mother tongue be documented verbatim in that language, but which was done in English in Khudiram's case. Moreover, Khudiram's signature was required to be given on the statement on the same date and at the time of the statement in the presence of the magistrate, but in reality Khudiram was made to sign the day after, and in front of a different person, who was an additional magistrate. Lastly, since such a statement are by definition required to be totally voluntary, with the magistrate being sure that it was so, there was no proof that Khudiram was allowed to give a voluntary statement without any direct or indirect manipulation after his capture. Lastly Narendrakumar Basu said that Prafulla aka "Dinesh" (the name used in the trial) was stronger than Khudiram was, and he was the bomb-expert among the two of them, thus it is highly likely that the actual thrower of the bomb was "Dinesh". Further Prafulla's suicide on the verge of capture only reinforces the possibility of his being the actual thrower of the bombs.


After the defense, it was announced by the two British judges that the final verdict would be passed on the 13th of July, 1908.