यशपाल (जन्म- 3 दिसम्बर, 1903)

December 03, 2017

यशपाल (जन्म- 3 दिसम्बर, 1903 ई., फ़िरोजपुर छावनी; मृत्यु- 26 दिसंबर, 1976) हिन्दी के यशस्वी कथाकार और निबन्ध लेखक हैं। यशपाल राजनीतिक तथा साहित्यिक, दोनों क्षेत्रों में क्रान्तिकारी हैं। उनके लिए राजनीति तथा साहित्य दोनों साधन हैं और एक ही लक्ष्य की पूर्ति में सहायक हैं।


जीवन परिचय
हिन्दी के यशस्वी कथाकार और निबन्धकार यशपाल का जन्म 3 दिसम्बर, 1903 ई. में फ़िरोजपुर छावनी में हुआ था। इनके पूर्वज कांगड़ा ज़िले के निवासी थे और इनके पिता 'हीरालाल' को विरासत के रूप में दो-चार सौ गज़ तथा एक कच्चे मकान के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त हुआ था। इनकी माँ प्रेमदेवी ने उन्हें आर्य समाज का तेजस्वी प्रचारक बनाने की दृष्टि से शिक्षार्थ 'गुरुकुल कांगड़ी' भेज दिया। गुरुकुल के राष्ट्रीय वातावरण में बालक यशपाल के मन में विदेशी शासन के प्रति विरोध की भावना भर गयी।


क्रान्तिकारी आन्दोलन
लाहौर के 'नेशनल कॉलेज' में भर्ती हो जाने पर इनका परिचय भगतसिंह और सुखदेव से हो गया। वे भी क्रान्तिकारी आन्दोलन की ओर आकृष्ट हुए। सन् 1921 ई. के बाद तो ये सशस्त्र क्रान्ति के आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने लगे। सन् 1929 ई. में वाइसराय की गाड़ी के नीचे बम रखने के लिए घटनास्थल पर उनको भी जाना पड़ा, बाद में कुछ ग़लतफ़हमी के कारण वे अपने दल की ही गोली के शिकार होते-होते बचे।


चन्द्रशेखर आज़ाद के शहीद हो जाने पर वे 'हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातंत्र' के कमाण्डर नियुक्त हुए। इसी समय दिल्ली और लाहौर में दिल्ली तथा लाहौर षड्यंत्र के मुक़दमें चलते रहे। यशपाल इन मुक़दमों के प्रधान अभियुक्तों में थे। पर ये फ़रार थे और पुलिस के हाथ में नहीं आ पाये थे। 1932 ई. में पुलिस से मुठभेड़ हो जाने पर गोलियों का भरपूर आदान-प्रदान करने के अनन्तर, ये गिरफ़्तार हो गये। उन्हें चौदह वर्ष की सख़्त सज़ा हुई। सन् 1938 ई. में उत्तर प्रदेश में जब कांग्रेस मंत्रिमण्डल बना तो अन्य राजनीतिक बन्दियों के साथ इनको भी मुक्त कर दिया गया।


जेल से मुक्त होने पर इन्होंने 'विप्लव' मासिक निकाला, जो थोड़े ही दिनों में काफ़ी लोकप्रिय हो गया। 1941 ई. में इनके गिरफ़्तार हो जाने पर 'विप्लव' बन्द हो गया, किन्तु अपनी विचारधारा के प्रचार में इन्होंने विप्लव का भरपूर प्रयोग किया। विभिन्न ज़िलों में उन्हें पढ़ने-लिखने का जो अवकाश मिला था, उसमें उन्होंने देश-विदेश के बहुत से लेखकों का मनोयोगपूर्ण अध्ययन किया। 'पिंजरे की उड़ान' और 'वो दुनियाँ' की कहानियाँ प्राय: जेल में ही लिखी गयी।


यशपाल में लिखने की प्रवृत्ति विद्यार्थी काल से ही थी, पर उनके क्रान्तिकारी जीवन ने उन्हें अनुभव सम्बद्ध किया, अनेकानेक संघर्षों से जूझने का बल दिया। राजनीतिक तथा साहित्यिक, दोनों क्षेत्रों में वे क्रान्तिकारी हैं। उनके लिए राजनीति तथा साहित्य दोनों साधन हैं और एक ही लक्ष्य की पूर्ति में सहायक हैं। साहित्य के माध्यम से उन्होंने वैचारिक क्रान्ति की भूमिका तैयार करने का प्रयास किया है। विचारों से वे काफ़ी दूर तक मार्क्सवादी हैं, पर कट्टरता से मुक्त होने के कारण इससे उनकी साहित्यिकता को प्राय: क्षति नहीं पहुँची है, उससे वे लाभान्वित ही हुए हैं।


यशपाल पहले-पहल कहानीकार के रूप में हिन्दी जगत में आये। अब तक उनके लगभग सोलह 'कहानी संग्रह' प्रकाशित हो चुके हैं। यशपाल मुख्यत: मध्यमवर्गीय जीवन के कलाकार हैं और इस वर्ग से सम्बद्ध उनकी कहानियाँ बहुत ही मार्मिक बन पड़ीं हैं। मध्यवर्ग की असंगतियों, कमज़ोरियों, विरोधाभासों, रूढ़ियों आदि पर इतना प्रबल कशाघात करने वाला कोई दूसरा कहानीकार नहीं है। दो विरोधी परिस्थितियों का वैषम्य प्रदर्शित कर व्यंग्य की सर्जना उनकी प्रमुख विशेषता है। यथार्थ जीवन की नवीन प्रसंगोदभावना द्वारा वे अपनी कहानियों को और भी प्रभावशाली बना देते हैं।


मध्यवर्ग अपनी ही रूढ़ियों में जकड़ा हुआ कितना दयनीय हो जाता है, इसका अच्छा ख़ासा उदाहरण 'चार आने' है। झूठी और कृत्रिम प्रतिष्ठा के बोझ को ढोते-ढोते यह वर्ग अपने दैन्य और विवशता में उजागर हो उठा है। 'गवाही' और 'सोमा का साहस' में समाज के ग़लीज़, नक़ाब और कृत्रिमता की तस्वीरें खींची गयीं हैं। इस वर्ग के वैमनस्य में निम्न वर्ग को रखकर उसके अंहकार और अमानवीय व्यवहार को बहुत ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करने में यशपाल ख़ूब कुशल हैं। 'एक राज़' में मालकिन और नौकर की मनोवृत्तियों की विषमताओं को इस तरह से उभारा गया है कि पाठक नौकर की सहानुभूति में तिलमिला उठता है। 'गुडबाई दर्द दिल' में रिक्शेवाले के प्रति की गयी अमानुषिकता पाठकों के मन में गहरी कचोट पैदा करती है। इस प्रकार की विषमता को अंकित करने के लिए यशपाल ने प्राय: उच्च मध्यवर्गीय व्यक्तियों को सामने रखा है, क्योंकि सामान्य मध्यवर्गीय व्यक्ति तो अपनी उलझनों से ही ख़ाली नहीं हो पाता।


यशपाल के व्यंग्य का तीखा रूप '80/100', 'ज्ञानदान' आदि में देखा जा सकता है। सामान्यत: कहा जाता है कि उन्होंने अपनी कथा के लिए रोटी और सेक्स की समस्याएँ चुनी हैं। यशपाल की कहानियों में कोई न कोई जीवन्त समस्या है, पर वे पूर्णत: कलात्मक आवरण में व्यक्त हुई हैं। जहाँ उनकी समस्या को कलात्मक आच्छादन नहीं मिल सका, वहाँ कहानी का कहानीपन संदिग्ध हो गया है।


उपन्यास में यशपाल का दृष्टिकोण और भी अधिक अच्छी तरह उभर सका है। उनका पहला उपन्यास 'दादा कामरेड' क्रान्तिकारी जीवन का चित्रण करते हुए मज़दूरों के संघठन को राष्ट्रोद्धार का अधिक संगत उपाय बतलाया है। 'देश द्रोही' कला की दृष्टि से 'दादा कामरेड' से कई क़दम आगे है। इस उपन्यास में गांधीवाद तथा कांग्रेस की तीव्र आलोचना करते हुए लेखक ने समाजवादी व्यवस्था का आग्रह किया है। 'दिव्या' यशपाल के श्रेष्ठ उपन्यासों में एक से है। इस उपन्यास में युग-युग की उस दलित-पीड़ित नारी की करुण कथा है, जो अनेकानेक संघर्षों से गुज़रती हुई अपना स्वस्थ मार्ग पहचान लेती है। 'मनुष्य के रूप' में परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से मनुष्य के बदलते हुए रूपों को प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है। 'अमिता' उपन्यास 'दिव्या' की भाँति ऐतिहासिक है।


कुछ समय पहले ही यशपाल का अत्यन्त विशिष्ट उपन्यास 'झूठा-सच' प्रकाशित हुआ है। विभाजन के समय देश में जो भीषण रक्तपात और अव्यवस्था उत्पन्न हुई, उसके व्यापक फलक पर झूठ-सच का रंगीन चित्र खींचा गया है। इसके दो भाग हैं- वतन और देश तथा देश का भविष्य। प्रथम भाग में विभाजन के फलस्वरूप लोगों के वतन छूटने और द्वितीय भाग में बहुत सी समस्याओं के समाधान का चित्रण हुआ है। देश के समसामयिक वातावरण को यथासम्भव ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में रखा गया है। विविध समस्याओं के साथ-साथ इस उपन्यास में जिन नये नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है, वे रूढ़िग्रस्त विचारों को प्रबल झटका देते हैं।


एक सफल कथाकार होने के साथ-साथ यशपाल अच्छे व्यक्तित्व-व्यंजक निबन्धकार भी हैं। वे अपने दृष्टिकोण के आधार पर सड़ी-गली रूढ़ियों, ह्रासोन्मुखी, प्रवृत्तियों पर जमकर प्रहार करते हैं। उन्होंने सरस तथा व्यंग्य-विनोद, गर्भ संस्मरण और रेखाचित्र भी लिखे हैं। 'न्याय का संघर्ष', 'देखा सोचा, समझा', 'सिंहावलोकन' (तीन भाग) आदि में उनके निबन्ध, संस्मरण और रेखाचित्र संग्रहीत हैं।


इनकी साहित्य सेवा तथा प्रतिभा से प्रभावित होकर रीवा सरकार ने 'देव पुरस्कार' (1955), सोवियत लैंड सूचना विभाग ने 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' (1970), हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने 'मंगला प्रसाद पारितोषिक' (1971) तथा भारत सरकार ने 'पद्म भूषण' की उपाधि प्रदान कर इनको सम्मानित किया है।



यशपाल हिन्दी के अतिशय शक्तिशाली तथा प्राणवान साहित्यकार थे। अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने के लिए उन्होंने साहित्य का माध्यम अपनाया था। लेकिन उनका साहित्य-शिल्प इतना ज़ोरदार है कि विचारों की अभिव्यक्ति में उनकी साहत्यिकता कहीं पर भी क्षीण नहीं हो पाई है। यशपाल जी का सन् 26 दिसंबर, 1976 ई. में निधन हो गया।


Yash Pal (26 November 1926 – 24 July 2017) was an Indian scientist, educator and educationist. He was known for his contributions to the study of cosmic rays, as well as for being an institution-builder. In his later years, he became one of the leading science communicators of the country.


Starting his career at Tata Institute of Fundamental Research (TIFR), he later remained Chairman of the University Grants Commission from 1986 to 1991. In 2013, he was awarded India's second highest civilian honour, the Padma Vibhushan.



Yash Pal was born in 1926 in Jhang, Punjab Province, British India, now in Pakistan. The town Jhang was also the place of birth of Yash Pal's contemporary, Abdus Salam, the renowned theoretical physicist and the only Pakistani Nobel laureate. He had a peaceful life in the town of Quetta with his parents until the disastrous 1935 Quetta earthquake (the deadliest earthquake in South Asia until 2005 with over 60,000 casualties) when young Yash Pal and his siblings (a brother and a sister) were rescued from beneath the remains of the buildings that were razed down to ground. Since the town was recovering and being rebuilt, he could not attend school for an year.



During 1945-1947, he studied for BSc Honours in Physics at the Lahore campus of the undivided University of the Punjab, where he also participated in the Students Union at Lahore as a student activist. As he was entering the final year of BSc in 1947, his studies were disrupted once again due to partition. He was then visiting Delhi due to his father's job transfer and could not return to Lahore to resume his studies due to the riots that broke out after partition. Eventually, a group of students including Yash Pal and their teachers who had all migrated from Lahore, were able to convert some obsolete WW2 army barracks in Delhi into operational classrooms, supported by Prof. D.S. Kothari (a professor of physics at Delhi University) among others.


During 1947-1949, he continued his studies in the Delhi campus of the newly carved up Panjab University. He received the M.Sc. degree in Physics from Panjab University in 1949. Later on, he moved to Boston, United States to pursue doctoral studies and obtained the Ph.D. degree in Physics from the Massachusetts Institute of Technology in 1958.



Yash Pal started his career at the Tata Institute of Fundamental Research (TIFR), Bombay (now Mumbai), as a member of the Cosmic Rays group. He went to Massachusetts Institute of Technology for his PhD and returned to TIFR, where he remained until 1983.


In 1972, the Government of India set up its Department of Space and embarked on an independent space programme. Yash Pal took charge as the first Director of the newly set up Space Applications Centre, Ahmedabad, in 1973. At the same time, he continued to be on the faculty of TIFR.


Yash Pal's administrative assignments at the government-level and beyond began with his appointment as the Secretary General of the Second United Nations Conference on Peaceful Uses of Outer Space (1981–82). He held the posts of Chief Consultant, Planning Commission (1983–84) and Secretary, Department of Science and Technology (1984–1986), after which he was appointed chairman, University Grants Commission (UGC) (1986–91).[6] During his tenure as UGC chairman, he advocated the setting up of Inter-University Centres funded by the UGC, on the model of the Nuclear Science Centre (now Inter-University Accelerator Centre), New Delhi. Institutions such as the Inter-University Centre for Astronomy and Astrophysics (IUCAA) emerged from this vision.


Pal was a member of UN Advisory Committee on Science and Technology for Development, Scientific Council, International Centre for Theoretical Physics, Trieste and Executive Committee and United Nations University.


Pal was Vice President of International Union of Pure and Applied Physics Indian National Science Academy in the year 1980-1981.



Pal's involvement in school education dates back to the early 1970s, with the pathbreaking Hoshangabad Science Teaching Programme.


In 1993, the Ministry of Human Resource Development (MHRD), Government of India, set up a National Advisory Committee, with Yash Pal as chairman, to go into the issue of overburdening of school children. The report of the committee, entitled "Learning without Burden", is now regarded as a seminal document in Indian education.


When the National Council of Educational Research and Training embarked on the exercise of drawing up the National Curriculum Framework, Pal was asked to chair its Steering Committee.The Executive Summary of the NCF 2005 document states that the curriculum review exercise was undertaken "in the light of the report, Learning Without Burden (1993)
Pal' role as UGC chairman has already been described above.


In 2009, the MHRD set up a Committee on Higher Education with Pal as the chairman, for examining reform of higher education in India. In its report, the Committee laid emphasis on the idea of a university, and advocated a number of major structural changes. However, it is not clear whether the Government intends to take any action on the basis of the report.


He submitted a report on "Renovation and Rejuvenation of Higher Education in India" to the Ministry of Human Resource Development on June 24, 2009. He filed the case, Prof. Yashpal & Anr vs State Of Chhattisgarh & Ors in the Supreme Court against a law, Chhattisgarh Niji Kshetra Vishwavidyalaya (Sthapana Aur Viniyaman) Adhiniyam, 2002 which is used to establish universities without regulatory approvals and necessary infrastructure. He won the case in February 2005 and 112 private universities formed unded the said law in Chhattisgarh had to be closed.



Yash Pal is known for regular appearances on the science programme Turning Point telecast on Doordarshan and for explaining scientific concepts in layman's language, along with participation on advisory boards for televised science programmes such as Bharat ki Chaap.


For the English daily The Tribune, he answered readers' science-relate questions.
He died due to old age related illnesses on 24 July 2017 in Noida, Uttar Pradesh.



Awards and honours
In 1976, the Indian government awarded Pal the Padma Bhushan for his contribution to science and space technology. A fellow of Indian National Science Academy, Pal was made a Marconi Fellow in 1980 for his work at the Space Applications Centre in Ahmedabad. In 2009, he received the Kalinga Prize, awarded by UNESCO for the popularisation of science.In October 2011 he was also awarded the Lal Bahadur Shastri National Award for excellence in public administration, academics and management.


He was the Chancellor of Jawaharlal Nehru University, New Delhi from March 2007 to March 2012.


Pal was honoured with the Padma Bhushan (1976) and the Padma Vibhushan (2013), the third and second highest Indian civilian honours.                 


Pal received the Indira Gandhi Prize for Popularization of Science (2000) and the Meghnad Saha Medal (2006) for his outstanding contribution to science.