मेजर ध्यान चन्द (मृत्यु: 3 दिसंबर, 1979)

December 03, 2017

मेजर ध्यान चन्द ( जन्म: 29 अगस्त, 1905, इलाहाबाद; मृत्यु: 3 दिसंबर, 1979, नई दिल्ली) एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे, जिनकी गिनती श्रेष्ठतम कालजयी खिलाड़ियों में होती है। मानना होगा कि हॉकी के खेल में ध्यानचंद ने लोकप्रियता का जो कीर्त्तिमान स्थापित किया है उसके आसपास भी आज तक दुनिया का कोई खिलाड़ी नहीं पहुँच सका।


हॉकी में ध्यानचंद सा खिलाड़ी न तो हुआ है और न होगा। वह जितने बडे़ खिलाड़ी थे उतने ही नेकदिल इंसान थे। हॉकी के इस जादूगर का असली नाम ध्यानसिंह था, लेकिन जब फ़ौज में उन्होंने बाले तिवारी के मार्गदर्शन में हॉकी संभाली तो सभी स्नेह से उन्हें ध्यानचंद कहने लगे और इस तरह उनका नाम ही ध्यानचंद पड़ गया।[1]



जीवन परिचय
ध्यानचंद का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) के एक साधारण राजपूत परिवार में 29 अगस्त, 1905 को हुआ। कालांतर में उनका परिवार इलाहाबाद से झांसी आ गया। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी।


साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की अवस्था में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए। जब 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट' में भरती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रुचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है। मेजर तिवारी स्वंय भी हॉकी प्रेमी और खिलाड़ी थे। उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए।


ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है। गेंद इस क़दर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई। ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर हॉकी के मुरीद तो वाह-वाह कह ही उठते थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई और दिखाया कि ध्यानचंद कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे। सुनने में ये सभी घटनाएं भले अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, लेकिन ये सभी बातें कभी हकीकत रही हैं।


ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। आँकड़ों से भी पता चलता है कि वह वास्तव में हॉकी के जादूगर थे। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वह छह ओलिंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते ही और इस बात में शक की क़तई गुंजाइश नहीं इन सभी ओलिंपिक का गोल्ड मेडल भी भारत के ही नाम होता।


1933 में एक बार वह रावलपिण्डी में मैच खेलने गए। इस घटना का उल्लेख यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि आज हॉकी के खेल में खिलाड़ियों में अनुशासनहीनता की भावना बढ़ती जा रही है और खेल के मैदान में खिलाड़ियों के बीच काफ़ी तेज़ी आ जाती है। 14 पंजाब रेजिमेंट (जिसमें ध्यानचंद भी सम्मिलित थे) और सैपर्स एण्ड माइनर्स टीम के बीच मैच खेला जा रहा था। ध्यानचंद उस समय ख्याति की चरम सीमा पर पहुँच चुके थे। उन्होंने अपने शानदार खेल से विरोधियों की रक्षापंक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस पर विरोधी टीम का सेंटर-हाफ अपना संतुलन खो बैठा और असावधानी में उसके हाथों ध्यानचंद की नाक पर चोट लग गई। खेल तुरंत रोक दिया गया। प्राथमिक चिकित्सा के बाद ध्यानचंद अपनी नाक पर पट्टी बंधवाकर मैदान में लौटे। उन्होंने चोट मारने वाले प्रतिद्वंदी की पीठ थपथपाई और मुस्कराकर कहा-"सावधानी से खेलो ताकि मुझे दोबारा चोट न लगे।" उसके बाद ध्यानचंद प्रतिशोध पर उतर आए। उनका प्रतिशोध कितना आर्दश है, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। उन्होंने एक साथ 6 गोल कर दिए। ये सचमुच एक महान खिलाड़ी का गुण है। इससे खेल-खिलाड़ी का स्तर और प्रतिष्ठा ऊँची होती है।


1928 में एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय टीम ने भाग लिया। एम्स्टर्डम में खेलने से पहले भारतीय टीम ने इंगलैंड में 11 मैच खेले और वहाँ ध्यानचंद को विशेष सफलता प्राप्त हुई। एम्स्टर्डम में भारतीय टीम पहले सभी मुकाबले जीत गई। भारत ने आस्ट्रेलिया को 6-0 से, बेल्जियम को 9-0 से, डेनमार्क को 6-0 से, स्विटज़लैंड को 6-0 से हराया और इस प्रकार भारतीय टीम फाइनल में पहुँच गई। फाइनल में भारत और हालैंड का मुकाबला था। फाइनल मैच में भारत ने हालैंड को 3-0 से हरा दिया। इसमें दो गोल ध्यानचंद ने किए।


1932 में लास एंजिल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में भी ध्यानचंद को टीम में शामिल कर लिया गया। उस समय सेंटर फॉरवर्ड के रूप में काफ़ी सफलता और शोहरत प्राप्त कर चुके थे। तब सेना में वह 'लैंस-नायक' के बाद नायक हो गये थे। इस दौरे के दौरान भारत ने काफ़ी मैच खेले। इस सारी यात्रा में ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल स्वयं किए। निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। तब एक अमेरिका समाचार पत्र ने लिखा था कि भारतीय हॉकी टीम तो पूर्व से आया तूफ़ान थी। उसने अपने वेग से अमेरिकी टीम के ग्यारह खिलाड़ियों को कुचल दिया।


 


कहा जाता है कि मैच के दौरान गेंद हर समय ध्यानचंद की स्टिक के साथ ही चिपकी रहती। यह देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन कुछ अधिकारियों को बीच में संदेह होने लगा कि कहीं ध्यानचंद की स्टिक में कोई ऐसी वस्तु तो नहीं लगी है, जो बराबर गेंद को अपनी ओर खींचे जाती है। बात बढ़ गई और शंका-समाधान आवश्यक समझा गया। सैनिक को दूसरी स्टिक से खेलने को कहा गया, लेकिन जब दूसरी स्टिक से भी ध्यानचंद ने दनादन गोलों का तांता बांधकर समा बांध दिया तो जर्मन अधिकारियों को विश्वास हो गया कि जादू स्टिक का नहीं उनकी लोचदार और सशक्त कलाइयों का है। वहाँ के दर्शकों ने तभी ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूगर' कहना शुरू कर दिया। 1936 के ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने कुल मिलाकर 38 गोल किए जिनमें से 11 गोल ध्यानचंद ने ही किए।
1936 के बर्लिन ओलम्पिक खिलों के बाद द्वितीय विश्व-युद्ध के कारण 1946 और 1944 के ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हो सका। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद ध्यानचंद ने हॉकी से सन्न्यास ले लिया, लेकिन हॉकी तो उनकी जीवनसंगिनी थी। उन्होंने नवयुवकों को गुरु-मंत्र सिखाने शुरू कर दिए। काफ़ी समय तक वह राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान (पटियाला) में भारतीय टीमों को प्रशिक्षित करते रहे।


केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती गई। 1938 में उन्हें 'वायसराय का कमीशन' मिला और वे जमादार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया।


वह 1922 में भारतीय सेना में शामिल हुए और 1926 में सेना की टीम के साथ न्यूज़ीलैंड के दौरे पर गए। 1928 और 1932 के ओलंपिक खेलों में खेलने के बाद 1936 में बर्लिन ओलम्पिक में ध्यानचंद ने भारतीय टीम का नेतृत्व किया और स्वयं छ्ह गोल दाग़कर फ़ाइनल में जर्मनी को पराजित किया। 1932 में भारत के विश्वविजयी दौरे में उन्होंने कुल 133 गोल किए। ध्यांनचंद ने अपना अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए।


1948 और 1952 में भारत के लिए खेलने वाले नंदी सिंह का कहना है कि ध्यानचंद के खेल की ख़ासियत थी कि वो गेंद को अपने पास ज़्यादा देर तक नहीं रखते थे। उनके पास बहुत नपे-तुले होते थे और वो किसी भी कोण से गोल कर सकते थे। 1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान एक मैच में ध्यानचंद ने केडी सिंह बाबू को एक ज़बरदस्त पास दिया और उनकी तरफ़ पीठ कर अपने ही गोल की तरफ चलने लगे। बाद में बाबू ने उनकी इस अजीब हरकत का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर तुम उस पास पर भी गोल नहीं मार पाते तो तुम्हें भारतीय टीम में बने रहने का कोई हक़ नहीं है। उनके पुत्र ओलंपियन अशोक कुमार भी बताते हैं कि 50 वर्ष की उम्र में भी अभ्यास के दौरान वो डी (D) के अंदर से दस में दस शॉट भारतीय गोलकीपर को छकाते हुए मार सकते थे। ओलंपियन केशवदत्त कहते हैं कि ध्यानचंद हॉकी के मैदान को इस तरह देखते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है। उनको हमेशा मालूम रहता था कि उनकी टीम का हर खिलाड़ी कहाँ है और अगर उनकी आँख पर पट्टी भी बाँध दी जाए, तब भी उनका पास बिल्कुल सही जगह पर पहुँचता था। 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रहे गुरुबक्श सिंह भी याद करते हुए कहते है कि 1959 में जब ध्यानचंद 54 वर्ष के थे, तब भी भारतीय टीम का कोई सदस्य बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था।


ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंदर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है, जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। ब्रैडमैन हाकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं। यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद।


1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।


चौथाई सदी तक विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को सुबह चार बजकर पच्चीस मिनट पर नई दिल्ली में देहांत हो गया। झाँसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहाँ वो हॉकी खेला करते थे। अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, "आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूँ" वो साधारण आदमी नहीं थे लेकिन वो इस दुनिया से गए बिल्कुल साधारण आदमी की तरह।


Dhyan Chand (29 August 1905 – 3 December 1979) was an Indian field hockey player, who is unarguably the greatest field hockey player of all time.He is known for his extraordinary goal-scoring feats, in addition to earning three Olympic gold medals (1928, 1932, and 1936) in field hockey, during an era where India was the most dominant team in Hockey. His influence extended beyond these victories, as India's won the men's field hockey gold medal in seven out of eight Olympics from 1928 to 1964.


Known as "The Wizard" for his superb ball control, Chand played his final international match in 1948, having scored more than 400 goals (highest goal scorer in history of hockey) during his international career. The Government of India awarded him the second highest civilian honour of Padma Bhushan in 1956. His birthday, 29'th August, is celebrated as National Sports Day in India every year.



Dhyan Chand was born on 29 August 1905 in Allahabad in an agriculturist Kushwaha family. He was the elder brother of another hockey player Roop Singh. He was born to mother Sharadha Singh and father Sameshwar Singh. His father was in the British Indian Army, and he played hockey in the army. Dhyan Chand had two brothers – Mool Singh and Roop Singh.Because of his father's numerous army transfers, the family had to move to different cities and as such Chand had to terminate his education after only six years of schooling. The family finally settled in Jhansi, Uttar Pradesh, India. Being in the military, his father got a small piece of land for a house.


Young Chand had no serious inclination towards sports, though he loved wrestling. He stated that he did not remember whether he played any hockey worth mentioning before he joined the Army, though he said that he occasionally indulged in casual games in Jhansi with his friends.


Chand joined the Indian Army at the age of 16. The Hindi word Chand literally means the moon. Since Dhyan Singh used to practice a lot during the night after his duty hours, he used to wait for the moon to come out so that the visibility in the field (during his era there were no flood lights) improved. He was hence called "Chand", by his fellow players, as his practice sessions at night invariably coincided with the coming out of the moon.


Between 1922 and 1926, Chand exclusively played army hockey tournaments and regimental games. Chand was ultimately selected for the Indian Army team which was to tour New Zealand. The team won 18 matches, drew 2 and lost only 1, receiving praise from all spectators. Following this, in the two Test matches against the New Zealand squad, the team won the first and narrowly lost the second. Returning to India, Chand was immediately promoted to Lance Naik.


After successfully lobbying for reintroducing field hockey in the Olympics, the newly formed Indian Hockey Federation (IHF) made preparations to send its best possible team for the 1928 Amsterdam Olympics. In 1925, an Inter-Provincial Tournament was held to select India's national field hockey team. Five teams participated in the inaugural nationals – United Provinces (UP), Punjab, Bengal, Rajputana and Central Provinces. Chand got permission from the Army to play for the United Provinces team.


In its first game in the tournament. Dhyan Chand as the centre-forward, and Marthins, their inside-right, were particularly happy in their understanding of each other. Dhyan Chand attracted much attention by his clever stick-work. His penetrating runs and judicious passes seemed to assure for him a position in the team that is to take part in the Olympic Games.


Quite early in the game, it became evident that Dhyan Chand was again at his best. In combination with Marthins he took the ball away to the right and Marthins did well to give him a good pass. Quick as lightning, Dhyan Chand shot a goal. The ball struck one of the defenders' stick and went into the net, giving goalkeeper Collie no chance. A goal within 3 minutes of the start was more than what the most optimistic of the UP supporters could expect. At the interval, UP led by three goals to nil.


On their part, Rajputana put every ounce of their efforts to score. The UP goal had more than one narrow escape, but were the winners of a fine exhibition match (3-1).


Buoyed by the success of the Tournament, it was decided that it would be held every two years. After two more trial matches between various hopefuls, the Olympic team (including Chand as center-forward) was announced and assembled in Bombay. Center-half Broome Eric Pinniger was selected as the captain. The IHF was initially low on funds since the provinces of Bombay, Madras and Burma had turned a deaf ear to their financial appeal, but they managed to scrape enough money. The Olympic team then played a match against the Bombay XI, and amazingly lost 3-2, even though Singh scored both his team's goals. With a quiet send-off, the team left for England on 10 March, to play 11 matches against local sides as well in the London Folkestone Festival in 1927, winning all. It was also said that Great Britain did not send a team in 1928 to the Amsterdam Olympics after their national team was defeated by the Indian team at Folkestone. This is best cited in Kapur's book "Romance of Hockey" where a despatch of H. Sutherland Stark, London representative of "Sports", a magazine of Lahore, tells the story better than any other comment : "For reasons it is difficult to understand the English Hockey Association have taken up a very stiff attitude towards Indian Hockey in recent years and have repeatedly been twitted about it by even their own supporters. The Editor of a leading sports newspaper described them to me as an intensely conservative body, but there seems to be something more than conservative behind their unwillingness apparently ever to meet India ina full international encounter"Finally, on 24 April, the team arrived in Amsterdam to embark on a tour of the Low Countries. In all the pre-Olympic matches against local Dutch, German and Belgian teams, the Indian team won by large margins.


In the 1928 Amsterdam Summer Olympics, the Indian team was put in the division A table, with Austria, Belgium, Denmark and Switzerland . On 17 May the Indian national hockey team made its Olympic debut against Austria, winning 6-0, with Chand scoring 3 goals. The next day India defeated Belgium 9-0; however Chand only scored once. On 20 May, Denmark lost to India 5-0, with Chand netting 3. Two days later, he scored 4 goals when India defeated Switzerland 6-0 in the semi-finals.


The final match took place on 26 May, with India facing the home team of the Netherlands. The Indian team's better players Feroze Khan, Ali Shaukat and Kher Singh were on the sick list and Chand himself was ill. However, even with a skeletal side, India managed to defeat the hosts 3-0 (with Singh scoring 2), and the Indian team won its country's first Olympic gold medal. Keeper Richard Allen did not concede any goals. Chand was the top scorer of the tournament, scoring 14 goals in 5 matches. A newspaper report about India's triumph said,


“ This is not a game of hockey, but magic. Dhyan Chand is in fact the magician of hockey. ”
On returning to India, the team was received by thousands of people at the Bombay harbor, compared to the three people who had seen them off.


Posted in Waziristan in the North-West Frontier Province (now in Pakistan) with his new 2/14 Punjab Regiment, Chand was cut off from the IHF, which was by now controlled by civilians. The Inter-Provincial Tournament was being held to select the new Olympic team; the IHF wrote to the Army Sports Control Board to grant Singh leaves to participate in the nationals. His platoon refused. Chand received news that he had been selected by the IHF for the Olympic team without any formalities. The rest of his teammates however, had to prove their skills in the Inter-Provincial Tournament, which was won by Punjab. As such, seven players from Punjab were selected for the Olympic team. Apart from Chand, Broome Eric Pinnigar, Leslie Hammond and Richard Allen were the other 1928 Olympians retained in the team. Chand's brother Roop Singh was also included in the squad as a left-in. Lal Shah Bokhari was selected as captain.


The Olympic team then played practice matches in India before heading for Colombo. In two matches in Ceylon, the Olympic team beat the All Ceylon XI 20-0 and 10-0. Wrote one newspaper on the first match, "Perfection is perilous, for it tempts the gods. For once, this was proved wrong for even the god of weather paid tribute to the genius of the Indian players. Rain clouds, which had threatened to ruin the game, vanished into the blue, and thousands of spectators spent a happy hour marveling at the incomparable artistry of the Indian team."


The India team set sail for San Francisco on 30 May, and arrived on 6 July. They reached Los Angeles three weeks before the opening ceremony of the Olympics, which took place on 30 July. On 4 August 1932, India played its first match against Japan and won 11-1. Chand, Roop Singh, Gurmit Singh each scored thrice, and Dickie Carr once. In the final on 11 August, India played against hosts USA. India won 24-1, a world record at that time (until it was broken in 2003), and once again clinched the gold medal. Chand scored 8 times, Roop Singh 10, Gurmit Singh 5 and Pinniger once. In fact, Chand along with his brother Roop, scored 25 out of the 35 goals scored by India. This led to them being dubbed the 'hockey twins'.


One Los Angeles newspaper wrote, "The All-India field hockey team which G. D. Sondhi brought to Los Angeles to defend their 1928 Olympic title, was like a typhoon out of the east. They trampled under their feet and all but shoved out of the Olympic stadium the eleven players representing the United States."


The team then embarked on a tour of the United States. They played a match on 20 August against a United States XI, almost the same team that they had faced in Los Angeles. Even after loaning its second keeper Arthur Hind, for a half, the team won 24-1.


After setting sail from New York, the team arrived at England. The then embarked on a hectic tour, playing nine matches in various countries in a fortnight, commencing on 2 September. They played four internationals-against the Netherlands, Germany, Czechoslovakia and Hungary. The team then reached Ceylon and India, playing a number of matches to pay for their expenses. At the end of the tour, India had played 37 matches, winning 34, drawing 2, with one abandoned. Chand scored 133 of the 338 Indian goals.


In India he is often referred to as 'Hockey ka Jaadugar' with translates to "Magician of the game of Hockey". It is also rumored Chand used to practice ball control by sprinting along the length of railway tracks while balancing the ball on the track rail.


He has studied at Aligarh Muslim University.