देवानंद ( मृत्यु- 3 दिसम्बर 2011 )

December 03, 2017

देवानंद पूरा नाम धर्मदेव आनंद (जन्म- 26 सितंबर, 1923 पंजाब - मृत्यु- 3 दिसम्बर 2011 लंदन) भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के प्रसिद्ध अभिनेता थे जो जीवन भर सक्रिय और चर्चित रहे। वे अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक भी थे। वे बॉलीवुड में 'देव साहब' के नाम से एक ज़िन्दादिल और भले इंसान के रूप में प्रसिद्ध थे। भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नाम उभरता है और वह है देव आनंद। कभी अपनी एक फ़िल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद का नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है। सदाबहार अभिनेता देव आनंद को लोग 'एवरग्रीन देव साहब' कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरक़रार है। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पड़ता है और 88 वर्ष की उम्र हृदयगति रुक जाने से 3 दिसम्बर 2011 को उनका देहावसान हुआ।


बॉलीवुड सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं, का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिद्ध वकील पिशौरीमल आनंद नामक एक संपन्न घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीमल आनंद था।


उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आज़ादी के लिए लड़ने वाले पिशौरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित 'फ़िल्म इंडिया' के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फ़िल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पड़े।


देव आनंद ने अंग्रेज़ी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फ़िल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख़्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे।


देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहाँ उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रुपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रुपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रुपये जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया।


देव आनंद और उनके छोटे भाई विजय आनंद को फ़िल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा कि कामयाबी इतनी जल्दी उनके क़दम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक शेखर कपूर की माँ है।


फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फ़िल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फ़िल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फ़िल्म निर्माता-निर्देशक गुरुदत्त से हुई जो उन दिनों फ़िल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरुदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे।


देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र


वर्ष फ़िल्म
1952 जाल
आँधियाँ
तमाशा
जलजला
1953 पतिता
राही
हमसफर
अरमान
1954 बादबान
टैक्सी ड्राइवर
फेरी
1955 फरार
हाउस नंबर 44
मुनीम जी
इंसानियत
मिलाप
1956 फंटूश
सीआईडी
पॉकेटमार
1957 पेइंग गेस्ट
दुश्मन
बारिश
नौ दो ग्यारह
1958 सोलहवाँ साल
अमर दीप
काला पानी
1959 लव मैरिज
1960 जाली नोट
एक के बाद एक
मंज़िल
सरहद
बम्बई का बाबू
काला बाज़ार
1961 जब प्यार किसी से होता है
हम दोनों
1962 बात एक रात की
माया
रूप की रानी चोरों का राजा
1963 असली नकली
तेरे घर के सामने
1964 शराबी
किनारा किनारे
1965 तीन देवियाँ
गाइड
1966 प्यार मोहब्बत
1967 ज्वेलथीफ
1968 कहीं और चल
फरेब
1969 दुनिया
महल
1970 जॉनी मेरा नाम
प्रेम पुजारी
1971 गैम्बलर
तेरे मेरे सपने
1972 अच्छा बुरा
हरे रामा हरे कृष्णा
यह गुलिस्तां हमारा
1973 छुपा रुस्तम
शरीफ़ बदमाश
जोशीला
1974 इश्क इश्क इश्क
हीरा पन्ना
प्रेम शास्त्र
अमीर ग़रीब
1975 वारंट
1976 जानेमन
1977 कलाबाज
डार्लिंग डार्लिंग
बुलेट
1978 देस परदेस
1980 मनपसंद
साहेब बहादुर
लूटमार
1982 स्वामी दादा
1984 आनंद और आनंद
1986 हम नौजवान
1989 सच्चे का बोलबाला
लश्कर
1990 अव्वल नंबर
1991 सौ करोड़
1995 गैंगस्टर
1996 रिटर्न ऑफ ज्वेलथीफ
1998 मैं सोलह बरस की
2001 सेंसर
2003 लव एट टाइम्स स्क्वेयर
2005 मि.प्राइम मिनिस्टर
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फ़िल्मी कैरियर की पहली हिट फ़िल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयाँ दिलायी। इस फ़िल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में क़दम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फ़िल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फ़िल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फ़िल्म 'अफसर' का निर्माण किया जिसके निर्देशन की ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फ़िल्म के लिए उन्होंने उस ज़माने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई।


इसके बाद उनका ध्यान गुरुदत्त को किए गए वायदे की तरफ़ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फ़िल्म 'बाज़ी' के निर्देशन की ज़िम्मेदारी गुरुदत्त को सौंप दी। फ़िल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाज़ी फ़िल्म की सफलता के बाद देव आनंद फ़िल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फ़िल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फ़िल्म "टैक्सी ड्राइवर" बड़ी हिट फ़िल्म थी।


बाज़ी' के हिट होने के बाद देव आनंद ने गुरुदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फ़िल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फ़िल्म के निर्देशन के बाद गुरुदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फ़िल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फ़िल्मों के निर्देशन की ज़िम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया। इन फ़िल्मों में काला बाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रुस्तम प्रमुख हैं।


देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफ़ी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फ़िल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फ़िल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा अभिनेत्री वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में फ़िल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कैरियर की पहली रंगीन फ़िल्म थी। इस फ़िल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया 'राजू गाइड', जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फ़िल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फ़िल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फ़िल्मों में से एक मानी जाती है।


वर्ष 1970 में फ़िल्म 'प्रेम पुजारी' के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी क़दम रख दिया। हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई, बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फ़िल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फ़िल्में शामिल हैं।


देव आनंद ने कई फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फ़िल्म 'आंधियां' के अलावा 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'हम नौजवान', 'अव्वल नंबर', 'प्यार का तराना' (1993 में), 'गैंगेस्टर', 'मैं सोलह बरस की', 'सेन्सर' आदि फ़िल्में शामिल हैं।


देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। 'हरे रामा हरे कृष्णा' के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फ़िल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फ़िल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीता बाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजयंती माला, मुमताज़, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और ज़ीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया।


हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फ़िल्में बनाने में व्यस्त थे। वह लगातार अपने बैनर के तले फ़िल्में बना रहे थे जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते थे। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फ़िल्में दी हैं।



हॉलीवुड अभिनेता ग्रेगरी पॅक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फ़िल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फ़िल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पॅक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पॅक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पॅक की झलक मिलती थी।



देव आनंद अपनी ख़ास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में हर मौसम का लुत्फ लिया और नौजवानों के चहेते बन गए।


कहते हैं बॉलीवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल ज़िंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले ख़ूबसूरत देव हमेशा ही ख़ूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या ज़ीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और ज़ीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फ़िल्म की नायिका सुरैया थी।



भारतीय सिनेमा के सदाबहार अभिनेता देवानंद का लंदन में दिल का दौरा पड़ने से 3 दिसंबर 2011 को 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।


Dharam Devdutt Pishorimal Anand (26 September 1923 – 3 December 2011), known as Dev Anand, was an Indian film actor, writer, director, producer, and comedian known for his work in the history of Indian cinema.


Dev was born Dharam Dev Anand on 26 September 1923 in the Shakargarh tehsil of the Gurdaspur district in Punjab (British India). His father Pishori Lal Anand was a well-to-do advocate in Gurdaspur District Court. Dev was the third of four sons born to Anand. One of Dev's younger sisters is Sheel Kanta Kapur, who is the mother of film director Shekhar Kapur. His older brothers were Manmohan Anand (Advocate, Gurdaspur Dist. Court) and Chetan Anand and the younger one was Vijay Anand. He did his schooling till matriculation from Sacred Heart School, Dalhousie, (then in Punjab) and went to college in Dharamsala before going to Lahore to study.Later Dev completed a BA degree in English Literature from the Government College, Lahore in British India. 


Part of the Anand family, he co-founded Navketan Films in 1949 with his elder brother Chetan Anand.
Dev Anand had an intense emotional love affair with actress Suraiya from 1948-1951, but it could not come to the marriage altar, because of great opposition by Suraiya's maternal grandmother. Suraiya remained unmarried throughout her life till she died on 31 January 2004. In 1954, Dev married Kalpana Kartik (actual name Mona Singha), a Bollywood actress from Shimla, in a very private marriage during the shooting of the film "Taxi Driver". Kartik was Christian. They have two children, Suneil Anand, who is unmarried and Devina Anand (Narang). Devina married in 1985, but was divorced a few years later. Devina has a daughter, Gina (Narang) (born 1986), who is married to a fashion stylist, Prayag Menon. Gina is a professional photographer.


After completing his BA degree in English Literature from the Government College, Lahore (then in British India, now in Pakistan), Dev Anand left his home-town for Bombay in the early 1940s. He began his career in the military censor's office at Churchgate, for a monthly salary of Rs. 165. Later he joined as a clerk in an accounting firm for a salary of Rs. 85.He joined his older brother, Chetan, as a member of the Indian People's Theatre Association (IPTA). Dev Anand aspired to become a performer after seeing Ashok Kumar's performance in films like Achhut Kanya and Kismet. Dev Anand quoted in an interview that "I remember when I gate-crashed into the office of the man who gave me the first break, he kept looking at me – Babu Rao Pai of Prabhat Film Studios. At that time he made up his mind that this boy deserves a break and later mentioned to his people that ‘this boy struck me because of his smile and beautiful eyes and his tremendous confidence.'" Then he was soon offered the lead role in Prabhat Films' Hum Ek Hain (1946), a film about Hindu-Muslim unity, where Dev Anand played a Hindu boy and was paired opposite Kamala Kotnis. While shooting the film in Pune, Anand befriended the actor Guru Dutt. Between them, they agreed that if one of them were to become successful in the film industry, he would help the other also to be successful. They formed a mutual understanding that when Anand produced a film, Dutt would direct it and when Dutt directed a film, Anand would act in it.
Dev Anand died in his room at The Washington Mayfair Hotel in London at the age of 88 on 3 December 2011 (4 December 2011 I.S.T) of a cardiac arrest.His death came just months after the release of his last film Chargesheet. Anand was reportedly in London for a medical checkup at the time of his death. Condolences poured in from all corners of the Indian film industry, with most of them remembering his positive attitude towards life. On 10 December, his funeral service was held at a small chapel in London after which his casket was taken to the Putney Vale Crematorium in southwest London. His ashes were returned to India for immersion burial in the Godavari River.



Awards, honours and recognitions
The Government of India honoured him with the Padma Bhushan in 2001 and the Dadasaheb Phalke Award in 2002 for his contribution to Indian cinema. His career spanned more than 65 years, acting in 114 Hindi films, of which 92 had him play the main solo lead hero, and he did two English films. He was the recipient of the Filmfare Award for Best Actor for his performances in Kala Pani and Guide, the latter being India's official entry to the Oscars. He also received critical acclaim for his performances in films like Baazi, Tere Ghar Ke Samne, Nau Do gyarah, CID, Kala Pani, Kala Bazar, Munimji, Duniya, Teen Deviyaan, Maya, Asli-Naqli, Jab Pyar Kisise Hota Hai, Pocketmaar, Nau Do Gyaraah, Solva Saal, Jewel Thief, Johnny Mera Naam, Tere Mere Sapne, Hare Rama Hare Krishna, Gambler, Amir Garib, Banarasi Babu.


Critics and audiences have frequently regarded Anand as one of Bollywood's definitive Leading Men: Charismatic, Debonaire, Urban, Handsome and Charming. Dev Anand was titled as Mr.Evergren by film critics and analysts. He is remembered as an energetic person, through-out the Industry.


Civilian award
2001 – Padma Bhushan (India's third highest civilian award from the Government of India)
National Film Awards
Winner


1965 – National Film Award for Best Feature Film in Hindi for Guide
2002 – Dadasaheb Phalke Award, India's highest award for cinematic excellence



Filmfare Awards
Winner


1959 – Best Actor for Kala Pani
1967 – Best Film for Guide
1967 – Best Actor for Guide
1991 – Filmfare Lifetime Achievement Award
National honours and recognitions
1995 – Star Screen Lifetime Achievement Award
1997 – Mumbai Academy of Moving Images Award for his Outstanding Services to the Indian Film Industry
1998 – Lifetime Achievement Award by the Ujala Anandlok Film Awards Committee in Calcutta
1999 – Sansui Lifetime Achievement Award for his "Immense Contribution to Indian Cinema" in New Delhi
2000 – Film Goers' Mega Movie Maestro of the Millennium Award in Mumbai
2001 – Special Screen Award for his contribution to Indian cinema
2001 – Evergreen Star of the Millennium Award at the Zee Gold Bollywood Awards on 28 April 2001 at the Nassau Coliseum, New York
2003 – Lifetime Achievement Award for "Outstanding Achievement in Indian Cinema" at IIFA Award in Johannesburg, South Africa
2004 – Legend of Indian Cinema Award at Atlantic City (United States)
2004 – Living Legend Award by the Federation of Indian Chamber of Commerce and Industry (FICCI) in recognition of his contribution to the Indian entertainment industry
2005 – Sony Gold Award
2006 – ANR National Award by the Akkineni International Foundation
2006 – Glory of India Award by IIAF, London
2007 – Punjab Ratan (Jewel of Punjab) Award by the World Punjabi Organisation (European Division) for his outstanding contribution in the field of art and entertainment.
2008 – Lifetime Achievement Award by Ramya Cultural Academy in association with Vinmusiclub
2008 – Lifetime Achievement Award by Rotary Club of Bombay
2008 – Awarded at the IIJS Solitaire Awards
2009 – Outstanding contribution to Indian cinema at the Max Stardust Awards
2009 – Legend Award given to Dev Anand by Rajinikanth
2010 – Phalke Ratna Award by Dadasaheb Phalke Academy
2010 – Rashtriya Gaurav Award
2011 – Rashtriya Kishore Kumar Samman from the Government of Madhya Pradesh
2011 – NDTV Indian of the Year's Lifetime Achievement Award with Rahul Dravid
Lifetime Achievement Maestro Award by the Whistling Woods International Institute.
2013 – To honour him, a brass statue in his likeness was unveiled at Walk of the Stars at Bandra Bandstand in Mumbai in February 2013.
2013 – On the occasion of 100 years of the Indian cinema, a postage stamp bearing his likeness was released by India Post to honour him on 3 May 2013.



International honours and recognitions
In July 2000, in New York City, he was honoured by an Award from the hands of the then First Lady of the United States of America, Hillary Clinton, for his "Outstanding Contribution to Indian Cinema".
In 2000, he was awarded the Indo-American Association "Star of the Millennium" Award in Silicon Valley, California.
Donna Ferrar, Member of the New York State Assembly, honoured him with a "New York State Assembly Citation" for his "Outstanding Contribution to the Cinematic Arts Worthy of the Esteem and Gratitude of the Great State of New York" on 1 May 2001.
In 2005, he was honoured with a "Special National Film Award" by the Government of Nepal at Nepal’s first National Indian film festival in Stockholm.
In 2008, he was guest of honour at a dinner hosted by the Provost of Highland Council in Inverness, Scotland to celebrate 10 years since he first worked in the Scottish Highlands. He spent several days in the area, en route to Cannes, as a guest of the Highlands and Islands Film Commission.