रामानन्द सागर (मृत्यु: 12 दिसम्बर 2005)

December 12, 2017

रामानन्द सागर ( जन्म: 29 दिसम्बर 1917; मृत्यु: 12 दिसम्बर 2005) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। रामानन्द सागर सबसे लोकप्रिय धारावाहिक रामायण बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके कैरियर की शुरुआत "राइडर्स ऑफ़ द रैलरोड" (1936) नामक फ़िल्म के साथ हुई थी।


जीवन परिचय
बहुमुखी प्रतिभा के धनी रामानन्द सागर का जन्म अविभाजित भारत के लाहौर ज़िले के "असलगुरु" ग्राम नामक स्थान पर 29 दिसम्बर 1927 में एक धनी परिवार में हुआ था। उन्हें अपने माता पिता का प्यार नहीं मिला, क्योंकी उन्हें उनकी नानी ने गोद ले लिया था। पहले उनका नाम चंद्रमौली चोपड़ा था लेकिन नानी ने उनका नाम बदलकर रामानंद रख दिया। 1947 में देश विभाजन के बाद रामानन्द सागर सबकुछ छोड़कर सपरिवार भारत आ गए। उन्होंने विभाजन की जिस क्रूरतम, भयावह घटनाओं का दिग्दर्शन किया, उसे कालांतर में "और इंसान मर गया" नामक संस्मरणों के रूप में लिपिबद्ध किया। यह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वे जब अपनी मातृभूमि से बिछुड़कर युवावस्था में शरणार्थी बन भारत आए, उनकी जेब में मात्र 5 आने थे, किन्तु साथ में था अपने धर्म और संस्कृति के प्रति असीम अनुराग-भक्तिभाव। शायद इसी का परिणाम था कि आगे चलकर उन्होंने रामायण, श्रीकृष्ण, जय गंगा मैया और जय महालक्ष्मी जैसे धार्मिक धारावाहिकों का निर्माण किया। दूरदर्शन के द्वारा प्रसारित इन धारावाहिकों ने देश के कोने-कोने में भक्ति भाव का अद्भुत वातावरण निर्मित किया।


16 साल की अवस्था में उनकी गद्य कविता श्रीनगर स्थित प्रताप कालेज की मैगजीन में प्रकाशित होने के लिए चुनी गई। युवा रामानंद ने दहेज लेने का विरोध किया जिसके कारण उन्हें घर से बाहर कर दिया गया। इसके साथ ही उनका जीवन संघर्ष आरंभ हो गया। उन्होंने पढ़ाई जारी रखने के लिए ट्रक क्लीनर और चपरासी की नौकरी की। वे दिन में काम करते और रात को पढ़ाई। मेधावी छात्र होने के कारण उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय पाकिस्तान से स्वर्ण पदक मिला और फ़ारसी भाषा में निपुणता के लिए उन्हें मुंशी फ़ज़ल के ख़िताब से नवाज़ा गया। इसके बाद सागर एक पत्रकार बन गए और जल्द ही वह एक अखबार में समाचार संपादक के पद तक पहुंच गए। इसके साथ ही उनका लेखन कर्म भी चलता रहा।


रामानंद सागर का झुकाव फ़िल्मों की ओर 1940 के दशक से ही था। लेकिन उन्होंने बाक़ायदा फ़िल्म जगत में उस समय एंट्री ली, जब उन्होंने राज कपूर की सुपरहिट फ़िल्म 'बरसात' के लिए स्क्रीनप्ले और कहानी लिखी। भारत के अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता पाने के बाद वर्ष 1950 में रामानन्द सागर ने एक प्रोडक्शन कंपनी "सागर आर्ट कॉरपोरेशन" शुरू की थी और 'मेहमान' नामक फ़िल्म के द्वारा इस कंपनी की शुरुआत की। बाद में उन्होंने इंसानियत, कोहिनूर, पैगाम, आँखें, ललकार, चरस, आरज़ू, गीत और बग़ावत जैसी हिट फ़िल्में बनाईं। वर्ष 1985 में वह छोटे परदे की दुनिया में उतर गए। फिर 80 के दशक में रामायण टीवी सीरियल के साथ रामानंद सागर का नाम घर-घर में पहुँच गया।


रामानन्द सागर ने उस समय इतिहास रचा जब उन्होंने टेलीविज़न धारावाहिक "रामायण" बनाया और जो भारत में सबसे लंबे समय तक चला और बेहद प्रसिद्ध हुआ। जो भगवान राम के जीवन पर आधारित और रावण और उसकी लंका पर विजय प्राप्ति पर बना था।


रामानन्द सागर ने कुछ फ़िल्मों तथा कई टेलीविज़न कार्यक्रमों व धारावाहिकों का निर्देशन और निर्माण किया। इनके द्वारा बनाए गए प्रसिद्ध टीवी धारावाहिकों में रामायण, कृष्णा, विक्रम बेताल, दादा-दादी की कहानियाँ, अलिफ़ लैला और जय गंगा मैया आदि बेहद प्रसिद्ध हैं। धारावाहिकों के अलावा उन्होंने आंखें, ललकार, गीत आरजू आदि अनेक सफल फ़िल्मों का निर्माण भी किया। 50 से अधिक फ़िल्मों के संवाद भी उन्होंने लिखे। कैरियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने पत्रकारिता भी की। पत्रकार, साहित्यकार, फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, संवाद लेखक आदि सभी का उनके व्यक्तित्व में अनूठा संगम था। और तो और, रामायण धारावाहिक की प्रत्येक कड़ी में उनके द्वारा रामचरित मानस की घटनाओं, पात्रों की भक्तिपूर्ण, सहज-सरस और मधुर व्याख्या ने उन्हें एक लोकप्रिय प्रवचनकर्ता के रूप में भी स्थापित किया।


उन्होंने 22 छोटी कहानियां, तीन वृहत लघु कहानी, दो क्रमिक कहानियां और दो नाटक लिखे। उन्होंने इन्हें अपने तखल्लुस चोपड़ा, बेदी और कश्मीरी के नाम से लिखा लेकिन बाद में वह सागर तखल्लुस के साथ हमेशा के लिए रामानंद सागर बन गए। बाद में उन्होंने अनेक फ़िल्मों और टेलीविज़न धारावाहिकों के लिए भी पटकथाएँ लिखी।


पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी एवं बॉलीवुड के कलाकारों के साथ रामानंद सागर


सन् 2001 में रामानन्द सागर को उनकी इन्हीं सेवाओं के कारण पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें फ़िल्म 'आँखें' के निर्देशन के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार और 'पैग़ाम' के लिए लेखक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला।



देश में शायद ही कोई ऐसा फ़िल्म निर्माता-निर्देशक हो जिसे न केवल अपने फ़िल्मी कैरियर में भारी सफलता मिली वरन् जिसे करोड़ों दर्शकों, समाज को दिशा देने वाले संतों-महात्माओं का भी अत्यंत स्नेह और आशीर्वाद मिला। डा. रामानन्द सागर ऐसे ही महनीय व्यक्तित्व के धनी थे। सारा जीवन भारतीय सिने जगत की सेवा करने वाले रामानन्द सागर शायद भारतीय फ़िल्मोद्योग के ऐसे पहले टी.वी. धारावाहिक निर्माता व निर्देशक थे, जिनके निधन की खबर सुनते ही देश के कला प्रेमियों, करोड़ों दर्शकों सहित हजारों सन्त-महात्माओं में शोक की लहर दौड़ गई। गत 12 दिसम्बर 2005 की देर रात मुंबई, महाराष्ट्र के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। 87 वर्षीय रामानंद सागर ने तीन महीने बीमार रहने के बाद अंतिम साँस ली। जूहु के विले पार्ले स्थित शवदाह गृह में उनके बड़े पुत्र सुभाष सागर ने उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी। इस अवसर पर उनके चाहने वाले सैकड़ों लोग, कलाकार, निर्माता- निर्देशक उपस्थित थे।


उनकी जनप्रियता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरिद्वार में आयोजित धर्मसंसद में शोकाकुल संतों, देश के चोटी के धर्माचार्यों ने उनकी स्मृति में मौन रखा। विश्व हिन्दू परिषद ने रामजन्म भूमि आन्दोलन में रामानन्द सागर के योगदान को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि इतिहास में उनका नाम सदैव अमर रहेगा। उनके द्वारा निर्मित और निर्देशित धारावाहिक "रामायण" ने देश में अद्भुत सांस्कृतिक जागरण पैदा किया।


Ramanand Sagar (29 December 1917 – 12 December 2005) (born Chandramauli Chopra)[1] was an Indian film director. He is most famous for making the Ramayan television series, a 78-part TV adaptation of the ancient Hindu epic of the same name, starring Arun Govil as Lord Ram and Deepika Chikhalia as Sita. This TV serial was then widely watched and liked across the country. It teaches the mankind holy and shrine values of life marking an indelible impression of the high ideals of heavenly culture to be imbibed for all mankind on this earth. The Government of India awarded him the civilian honour of Padma Shri in 2000.


Ramanand Sagar was born at Asal Guru Ke near Lahore. His great-grandfather, Lala Shankar Das Chopra, migrated from Peshawar to Kashmir. Ramanand was adopted by his maternal grandmother, who had no sons, at which point his name was changed from 'Chandramouli Chopra' to 'Ramanand Sagar'. After Sagar's biological mother died, his father took a second wife and had further children by her, including Vidhu Vinod Chopra, who is thus Sagar's half-brother, albeit thirty-five years younger than him. Sagar worked as a peon, truck cleaner, soap vendor, goldsmith apprentice etc. during the day and studied for his degree at night.


He was a gold medalist in Sanskrit and Persian from the University of Punjab in 1942. He was also editor of newspaper Daily Milap. He wrote many short stories, novels, poems, plays, etc. under names like "Ramanand Chopra", "Ramanand Bedi" and "Ramanand Kashmiri".In 1942 when he caught tuberculosis he wrote a subjective column "Diary of a T.B. patient" about his fight. The column was published in series in the magazine Adab-e-Mashriq in Lahore.


In 1932, Sagar started his film career as a clapper boy in a silent film, Raiders of the Rail Road.He then shifted to Bombay in 1949 after India's partition.


In 1940's, Ramanand Sagar started out as an assistant stage manager in Prithvi Theatres of Prithviraj Kapoor. Also, directed a few plays under the fatherly guidance of Kapoor.


Along with other films that Sagar himself directed, he wrote the story and screenplay for Raj Kapoor's superhit Barsaat. He founded the film and television production company known as Sagar Films (Pvt. Ltd.) a.k.a. Sagar Arts in 1950. He produced and directed many films. He won the 1960 Filmfare Best Dialogue Award for Paigham which was directed by S. S. Vasan and starred Dilip Kumar, Vyjayanthimala and Raaj Kumar in lead roles. In 1964 he directed the classic Zindagi starring Rajendra Kumar, Vyjanthimala, Prithviraj Kapoor and Raaj Kumar.In 1968 he won the Filmfare Best Director Award for Ankhen. Ankhen was a spy-thriller starring Dharmendra and Mala Sinha. It was amongst the Top 10 Hindi films of the 1960s.


In 1985 Sagar turned towards television. His Sagar Arts began producing serials based on Indian history. His Ramayan aired its first episode on 25 January 1987.His next mythological tele-serials were Krishna and Luv Kush. He made fantasy dramas like Vikram Aur Betaal and Alif Laila.


Based on his experiences of Indo-Pak partition, Sagar published a Hindi-Urdu book Aur Insaan Mar Gaya (English: And Humanity Died) in 1948.


The government of India honoured Sagar with the Padma Shri in 2000.


Awards


Civilian awards
Padma Shri-2000
Won
1960 – Filmfare Best Dialogue Award for Paigham
1969 – Filmfare Best Director Award for Aankhen
Nominated
1966 – Filmfare Award for Best Story for Arzoo
1966 – Filmfare Award for Best Director for Arzoo
1969 – Filmfare Award for Best Story for Aankhen



Filmography
Year Title Film / TV serial Roles Notes
2005 Sai Baba TV series Director
1993 Alif Laila TV Series Director Original telecast on DD National
Repeat telecast on SAB TV
1992 Krishna TV series Director
1988-89 Luv Kush TV series Director
1986 Vikram Aur Betaal TV series Director



Producer
1987 Ramayan TV series Director
Producer


Writer
1985 Salma Film Director
Producer
1983 Romance Film Director
Producer
1982 Bhagawat Film Director
Producer
1981 Armaan Film Producer
1979 Hum Tere Ashiq Hain Film Dialogue writer
Screenplay writer
1979 Prem Bandhan Film Director
1976 Charas Film Director
Producer
Writer
1973 Jalte Badan Film Director
Producer
Writer
1972 Lalkaar Film Director
Producer
Writer
1970 Geet Film Director
Producer
1968 Aankhen Film Director
Producer
Writer
1965 Arzoo Film Director
Producer
Writer
1964 Zindagi Film Director
Producer
1964 Rajkumar Film Dialogue writer
Screenplay writer
1960 Ghunghat Film Director
1959 Paigham Film Dialogue writer
1958 Raj Tilak Film Writer
Dialogue writer
1956 Mem Sahib Film Dialogue writer
1954 Bazooband Film Director
1952 Sangdil Film Dialogue writer
Screenplay writer
1953 Mehmaan Film Director
1950 Jan Pahchan Film Dialogue writer
Screenplay writer
1949 Barsaat Film Writer
Dialogue writer
Screenplay writer