डॉ. धर्मवीर भारती ( जन्म- 25 दिसंबर, 1926)

December 25, 2017

डॉ. धर्मवीर भारती ( जन्म- 25 दिसंबर, 1926 - 4 सितंबर, 1997) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। वे साप्ताहिक पत्रिका 'धर्मयुग' के प्रधान संपादक भी रहे। डॉ. धर्मवीर भारती को 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनका उपन्यास 'गुनाहों का देवता' हिन्दी साहित्य के इतिहास में सदाबहार माना जाता है।


धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर 1926 को इलाहाबाद के 'अतरसुइया' नामक मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री. चिरंजीवलाल वर्मा और माता का नाम श्रीमती चंदादेवी था। भारती के पूर्वज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शाहजहाँपुर ज़िले के 'ख़ुदागंज' नामक क़स्बे के ज़मीदार थे। पेड़, पौधों, फूलों और जानवरों तथा पक्षियों से प्रेम बचपन से लेकर जीवन पर्यन्त रहा। संस्कार देते हुए बड़े लाड़ प्यार से माता पिता अपने दोनों बच्चों धर्मवीर और उनकी छोटी बहन वीरबाला का पालन कर रहे थे कि अचानक उनकी माँ सख्त बीमार पड़ गयीं दो साल तक बीमारी चलती रही। बहुत खर्च हुआ और पिता पर कर्ज़ चढ़ गया। माँ की बीमारी और कर्ज़ से वे मन से टूट से गये और स्वयं भी बीमार पड़ गये। 1939 में उनकी मृत्यु हो गई ।[1]


इन्हीं दिनों पाढ्य पुस्तकों के अलावा कविता पुस्तकें तथा अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ने का बेहद शौक़ जागा। स्कूल ख़त्म होते ही घर में बस्ता पटक कर वाचनालय में भाग जाते वहाँ देर शाम तक किताबें पढ़ते रहते। इंटरमीडियेट में पढ़ रहे थे कि गांधी जी के आह्वान पर पढ़ाई छोड़ दी ओर आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े। सुभाष के प्रशंसक थे, बचपन से ही शस्त्रों के प्रति आकर्षण भी जाग उठा था सो हर समय हथियार साथ में लेकर चलने लगे और 'सशस्त्र क्रांतिकारी दल' में शामिल होने के सपने मन में सँजोने लगे, पर अंतत: मामा जी के समझाने बुझाने के बाद एक वर्ष का नुक़सान करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई के लिए दाख़िला लिया। कोर्स की पढ़ाई के साथ साथ उन्हीं दिनों शैली, कीट्स, वर्ड्सवर्थ, टॅनीसन, एमिली डिकिन्सन तथा अनेक फ़्रांसीसी, जर्मन और स्पेन के कवियों के अंग्रेज़ी अनुवाद पढ़े, एमिल ज़ोला, शरदचंद्र, गोर्की, क्युप्रिन, बालज़ाक, चार्ल्स डिकेन्स, विक्टर हयूगो, दॉस्तोयव्स्की और तॉल्सतोय के उपन्यास ख़ूब डूब कर पढ़े।


स्नातक, स्नातकोत्तर की पढ़ाई ट्युशनों के सहारे चल रही थी। उन्हीं दिनों कुछ समय श्री पद्मकांत मालवीय के साथ 'अभ्युदय' में काम किया, इलाचन्द्र जोशी के साथ 'संगम' में काम किया। इन्हीं दोनों से उन्होंने 'पत्रकारिता' के गुर सीखे थे। कुछ समय तक 'हिंदुस्तानी एकेडेमी' में भी काम किया। उन्हीं दिनों ख़ूबकहानियाँ भी लिखीं। 'मुर्दों का गाँव' और 'स्वर्ग और पृथ्वी' नामक दो कहानी संग्रह छपे। छात्र जीवन में भारती पर शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, जयशंकर प्रसाद और ऑस्कर वाइल्ड का बहुत प्रभाव था। उन्ही दिनों वे माखन लाल चतुर्वेदी के सम्पर्क में आये और उन्हे पिता तुल्य मानने लगे। दादा माखनलाल चतुर्वेदी ने भारती को बहुत प्रोत्साहित किया।


स्नातक में हिन्दी में सर्वाधिक अंक मिलने पर प्रख्यात 'चिंतामणि गोल्ड मैडल' मिला। स्नातकोत्तर अंग्रेज़ी में करना चाहते थे पर इस मैडल के कारण डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के कहने पर उन्होंने हिन्दी में नाम लिखा लिया। स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते समय 'मार्क्सवाद' का उन्होंने धुंआधार अध्ययन किया। 'प्रगतिशील लेखक संघ' के स्थानीय मंत्री भी रहे लेकिन कुछ ही समय बाद साम्यवादियों की कट्टरता तथा देशद्रोही नीतियों से उनका मोहभंग हुआ। तभी उन्होंने छहों भारतीय दर्शन, वेदांत तथा बड़े विस्तार से वैष्णव और संत साहित्य पढ़ा और भारतीय चिंतन की मानववादी परम्परा उनके चिंतन का मूल आधार बन गयी।


डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन में 'सिद्ध साहित्य' पर शोध कार्य चल रहा था। साथ ही साथ उस समय कई कवितायें लिखी गई जो बाद में 'ढंडा लोहा' नामक पुस्तक के रूप में छपी। और उन्हीं दिनों 'गुनाहों का देवता' उपन्यास लिखा। साम्यवाद से मोहभंग के बाद 'प्रगतिवाद: एक समीक्षा' नामक पुस्तक लिखी। कुछ अंतराल बाद ही 'सूरज का सातवाँ घोड़ा' जैसा अनोखा उपन्यास भी लिखा।


शोधकार्य पूरा करने के बाद वहीं विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति हो गई। देखते ही देखते बहुत लोकप्रिय अध्यापक के रुप में उनकी प्रशंसा होने लगी। उसी दौरान 'नदी प्यासी थी' नामक 'एकांकी नाटक संग्रह' और 'चाँद और टूटे हुए लोग' नाम से कहानी संग्रह छपे। 'ठेले पर हिमालय' नाम से ललित रचनाओं का संग्रह छपा और शोध प्रबंध 'सिध्द साहित्य' भी छप गया। मौलिक लेखन की गति बड़ी तेज़ी से बढ़ रही थी। साथ ही अध्ययन भी पूरी मेहनत से किया जाता रहा। उस दौरान 'अस्तित्ववाद' तथा पश्चिम के अन्य नये दर्शनों का विशद अध्ययन किया। रिल्के की कविताओं, कामू के लेख और नाटकों, ज्याँ पॉल सार्त्र की रचनाओं और कार्ल मार्क्स की दार्शनिक रचनाओं में मन बहुत डूबा। साथ ही साथ महाभारत, गीता, विनोबा और लोहिया के साहित्य का भी गहराई से अध्ययन किया। गांधीजी को नयी दृष्टि से समझने की कोशिश की। भारतीय संत और सूफ़ी काव्य और विशेष रूप से कबीर, जायसी और सूर को परिपक्व मन और पैनी हो चुकी समझ के साथ पुन: और समझा।


इसी बीच 1954 में श्रीमती कौशल्या अश्क द्वारा सुझाई गई एक पंजाबी शरणार्थी लड़की 'कांता कोहली' से विवाह हो गया। संस्कारों के तीव्र वैषम्य के कारण वह विवाह असफल रहा। बाद में सम्बंध विच्छेद हो गया। लेखन का काम अबाध चल रहा था। 'सात गीत वर्ष', 'अंधायुग', 'कनुप्रिया ' और 'देशांतर' प्रकाशित हो चुके थे। कुछ ही समय बाद बम्बई से एक प्रस्ताव 'धर्मयुग' के संपादन का आया। 'निकष' को आगे न चला पाने की कसक मन में थी ही, संपादन की ललक ने प्रस्ताव पर विचार किया और विश्वविद्यालय से एक वर्ष की छुट्टी लेकर 1960 मे बम्बई चले आये।


धर्मयुग के संपादन में नये क्षितिज नज़र आने लगे, साहित्यिक लेखन से इतर अपने देश के लिये बहुत कुछ बड़े काम किये जा सकते हैं यह समझ में आने लगा तो विश्वविद्यालय की नौकरी से त्यागपत्र देकर पूरे समर्पण के साथ धर्मयुग के संपादन में ध्यान केंद्रित किया। इस दौरान एक अत्यंत शिक्षित और संभ्रांत परिवार में जन्मी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शोध छात्रा जो कलकत्ता के 'शिक्षायतन कॉलेज' में हिन्दी की प्राध्यापक बन चुकी थी, उससे विवाह किया। यही 'पुष्पलता शर्मा' बाद में पुष्पा भारती नाम से प्रख्यात हुईं।


धर्मवीर भारती के द्वारा संपादित 'धर्मयुग' पत्रकारिता की कसौटी बन चुका है। आज के पत्रकारिता के विद्यार्थी उनकी शैली को 'धर्मवीर भारती स्कूल ऑफ़ जर्नलिज़्म' के नाम से जानते हैं। सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, खेलकूद, साहित्यिक सभी पक्षों को समेटते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर हर अंक में सामग्री दी जाती थी। बच्चों और महिलाओं के लिये भी रोचक और ज्ञानप्रद सामग्री 'धर्मयुग' की अतिरिक्त विशेषता थी। उच्चतम स्तर का निर्वाह करते हुए असाधारण लोकप्रियता के साथ लाखों की संख्या में सर्वाधिक बिक्री के आँकड़े किसी चमत्कार से कम नहीं थे।[1]


1961 में 'कॉमनवेल्थ रिलेशन्स कमेटी' के आमंत्रण पर प्रथम विदेश यात्रा - इंग्लैंड तथा यूरोप के कई देशों की की।
1962 में 'पश्चिम जर्मन सरकार' के आमंत्रण पर जर्मनी गये।
1966 में 'भारतीय दूतावास' के निमंत्रण पर इंडोनेशिया तथा थाइलैंड गये।
1971 मुक्तिवाहिनी के साथ बाँग्लादेश की गुप्त यात्रा करने के बाद क्रांति का आँखों देखा वर्णन लिखा।
1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान भारतीय सेना के साथ स्वयं युद्ध क्षेत्र में जा कर वास्तविक युद्ध होते देखा और विस्तृत रिपोर्ताज लिखा।
1974 मॉरिशस यात्रा के दौरान भारतीय मूल की जनता से सीधा सम्पर्क करके 'धर्मयुग' का जो अंक निकाला, उससे दोनों देशों के बीच मज़बूत सांस्कृतिक पुल बना।
1976 पुन: मॉरिशस यात्रा की।
1978 'चीन सरकार' के आमंत्रण पर चीन और सिंगापुर की यात्रा की।
1990 अमरीका की निजी यात्रा की।
रचनाएँ
कविता
ठंडा लोहा (1952)
सात गीत वर्ष (1959)
कनुप्रिया (1959)
सपना अभी भी (1993)
आद्यन्त (1999)
पद्यनाटक
अंधायुग (1954)
कहानी संग्रह
मुर्दों का गाँव (1946)
स्वर्ग और पृथ्वी (1949)
चाँद और टूटे हुए लोग (1955)
बंद गली का आख़िरी मकान (1969)
साँस की क़लम से (पुष्पा भारती द्वारा संपादित सम्पूर्ण कहानियाँ ) (2000)
रेखाचित्र
कुछ चेहरे कुछ चिंतन (1997)
संस्मरण
शब्दिता (1997)
उपन्यास
गुनाहों का देवता(1949)
सूरज का सातवाँ घोडा (1952)
ग्यारह सपनों का देश (प्रारंभ और समापन) 1960
निबंध
ठेले पर हिमालय (1958)
कहनी अनकहनी (1970)
पश्यंती (1969)
साहित्य विचार और स्मृति (2003)
रिपोर्ताज
मुक्त क्षेत्रे : युद्ध क्षेत्रे (1973)
युद्ध यात्रा (1972)
आलोचना
प्रगतिवाद: एक समीक्षा (1949)
मानव मूल्य और साहित्य (1960)
एकांकी नाटक
नदी प्यासी थी (1954)
अनुवाद
ऑस्कर वाइल्ड की कहानियाँ (1946)
देशांतर (21 देशों की आधुनिक कवितायें ) 1960
यात्रा विवरण
यात्रा चक्र (1994)
मृत्यु के बाद प्रकाशित
धर्मवीर भारती की साहित्य साधना (संपादन पुष्पा भारती) 2001
धर्मवीर भारती से साक्षात्कार (संपादन पुष्पा भारती) (1998)
अक्षर अक्षर यज्ञ (पत्र : संपादन पुष्पा भारती 1998)
संपादन
अभ्युदय
संगम
हिन्दी साहित्य कोष (कुछ अंश)
आलोचना
निकष
धर्मयुग
अवकाश ग्रहण
धर्मयुग को पत्रकारिता का आकाश छूती ऊँचाइयों तक पहुंचा कर सत्ताईस वर्षों तक लगातार पूरी एकाग्रता के साथ काम करने के उपरांत 1987 में अवकाश ग्रहण कर लिया।


1989 में हृदय रोग से गंभीर रूप से बीमार हो गये। बम्बई अस्पताल के डॉ. बोर्जेस के अथक प्रयासों और गहन चिकित्सा के बाद बच तो गये किंतु स्वास्थ्य फिर कभी पूरी तरह सुधरा नहीं। कई प्रकार के तनावों को झेलते हुए सत्ताईस बरस की रात और दिन की बेइंतिहा दिमाग़ी मेहनत से शरीर काफ़ी अशक्त हो चुका था। वे केवल अद्भुत इच्छा शक्ति के साथ काम करते रहे थे।अंतत: 4 सितंबर 1997 को नींद में ही मृत्यु को वरण कर लिया।


सम्मान एवं पुरस्कार
डॉ. धर्मवीर भारती को मिले सम्मान एवं पुरस्कार 
1967 संगीत नाटक अकादमी सदस्यता - दिल्ली
1984 हल्दीघाटी श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार - राजस्थान
1985 साहित्य अकादमी रत्न सदस्यता - दिल्ली
1986 संस्था सम्मान - उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
1988 सर्वश्रेष्ठ नाटककार पुरस्कार - संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली
1988 सर्वश्रेष्ठ लेखक सम्मान - महाराणा मेवाड़ फ़ाउंडेशन - राजस्थान
1989 गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार - केंद्रीय हिन्दी संस्थान - आगरा
1989 राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान - बिहार सरकार
1990 भारत भारती सम्मान - उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
1990 महाराष्ट्र गौरव - महाराष्ट्र सरकार
1991 साधना सम्मान - केडिया हिन्दी साहित्य न्यास - मध्यप्रदेश
1992 महाराष्ट्राच्या सुपुत्रांचे अभिनंदन - वसंतराव नाईक प्रतिष्ठान- महाराष्ट्र
1994 व्यास सम्मान - के. के. बिड़ला फ़ाउंडेशन - दिल्ली
1996 शासन सम्मान - उत्तर प्रदेश सरकार - लखनऊ
1997 उत्तर प्रदेश गौरव - अभियान संस्थान - बम्बई


Dr. Dharamvir Bharati  (25 December 1926 – 4 September 1997) was a renowned Hindi poet, author, playwright and a social thinker of India. He was the chief editor of the popular Hindi weekly magazine Dharmayug, from 1960 till his death in 1997.


Bharati was awarded the Padma Shree for literature in 1972 by the Government of India. His novel Gunaho Ka Devta became a classic. Bharati's Suraj ka Satwan Ghoda is considered a unique experiment in story-telling and was made into a National Film Award-winning movie by the same name in 1992 by Shyam Benegal. Andha Yug, a play set immediately after the Mahabharata war, is a classic that is frequently performed in public by drama groups.


He was awarded the Sangeet Natak Akademi Award in Playwriting (Hindi) in 1988, given by Sangeet Natak Akademi, India's National Academy of Music, Dance and Drama.
Dharamvir Bharati was born on 25 December 1926 in a Kayastha Family of Allahabad to Chiranji Lal and Chanda devi. The family underwent considerable financial hardships after his father died early. He had a sister, Dr. Veerbala.


He did his MA in Hindi from Allahabad University in 1946 and won the "Chintamani Ghosh Award" for securing highest marks in Hindi.


Dharamvir Bharati was the sub-editor for magazines Abhyudaya and Sangam during this period. He completed his PhD in 1954 under Dr. Dhirendra Verma on the topic of "Siddha Sahitya" and was appointed lecturer in Hindi at Allahabad University. The 1950s were the most creative period in Bharati's life: He wrote many novels, dramas, poems, essays, and critical works during this phase.
In 1960 he was appointed as chief-editor of the popular Hindi weekly magazine Dharmayug by the Times Group and moved to Bombay. He remained the editor of Dharmayug till 1987. During this long phase the magazine became the most popular Hindi weekly of the country and reached new heights in Hindi journalism. As a field reporter, Bharati personally covered the Indo-Pak war that resulted in the liberation of Bangladesh.



Dr Bharati married in 1954 and later divorced Kanta Bharati with whom he had a daughter: Parmita. A few years later he remarried and had a son Kinshuk Bharati and a daughter Pragya Bharati with Pushpa Bharati.


Bharati developed heart ailments and died after a brief illness in 1997.



Prominent works
Novels
Gunaho Ka Devta (गुनाहों का देवता) (1949)
Suraj ka Satwan Ghoda (सूरज का सातवां घोड़ा, 1952) (The Seventh Steed of the Sun) — A short novel published in 1952 that may be viewed as a set of connected mini-narratives can be called one of the foremost instances of metafiction in 20th century Hindi literature. The protagonist is a young man named Manik Mulla who recounts these tales to his friends. The name of the work is an allusion to Hindu mythology according to which the chariot of the Sun-God Surya is said to be drawn by seven horses. (viz. seven days in a week). This novella has been translated into Bengali by poet Malay Roy Choudhury of Hungry generation fame, for which he was bestowed with the Sahitya Academy Award. Shyam Benegal's film by the same name (1992), based on the novel, won the National Film Award for Best Actor.
Giyara sapno ka desh (ग्यारह सपनों का देश)
Prarambh va Samapan (प्रारंभ व समापन)


Poetry
Kanupriya, Thanda Loha, Saat Geet Varsh, Sapana Abhi Bhi and Toota Pahiya are amongst his most popular works of poetry. Toota Pahiya tells a story of how a broken wheel helped Abhimanyu in the Mahabharata war.


Play in poetry
Andha Yug (The Age of Blindness) is a poetic play. Structured on events in the Mahabharata, Andha Yug focuses on the last day of the Mahabharata war. It is a powerful metaphorical work. It has been directed by Ebrahim Alkazi, Raj Bisaria, M.K. Raina, Ratan Thiyam, Arvind Gaur, Ram Gopal Bajaj, Mohan Maharishi, Bhanu Bharti and many other Indian theatre directors.


Story collections
Drow Ka gaon (र्दों का गाव), Swarg aur Prathvhi (स्वर्ग और पृथ्वी), Chand aur Tute hue Log (चाँद और टूटे हुए लोग), Band gali Ka Aakhkri Makaan (बंद गली का आखिरी मकान), Saas ki Kalam se (सास की कलम से), Samasta Kahaniya ek Saath (समस्त कहानियाँ एक साथ)


Essays
Thele par Himalayas (ठेले पर हिमालय), Pashyanti stories: Ankahi (पश्यंती कहानियाँ :अनकही), The river was thirsty (नदी प्यासी थी), Neel Lake (नील झील), Human values and literature (मानव मूल्य और साहित्य), Cold iron (ठंडा लोहा)


Film about Bharati
Dr. Bharati: documentary directed by young story writer Uday Prakash for Sahitya Akademi, Delhi, 1999


Awards
Padma Shri by the Government of India, 1972
Rajendra Prasad Shikhar Samman
Bharat Bharati Samman
Maharashtra Gaurav, 1994
Kaudiya Nyas
Vyasa Samman
1984, Valley turmeric best journalism awards
1988, best playwright Maharana Mewar Foundation Award
1989, the Sangeet Natak Akademi, Delhi

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