नौशाद अली (जन्म: 25 दिसंबर, 1919)

December 25, 2017

नौशाद अली (जन्म: 25 दिसंबर, 1919 – मृत्यु: 5 मई, 2006) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। पहली फ़िल्म में संगीत देने के 64 साल बाद तक अपने साज का जादू बिखेरते रहने के बावजूद नौशाद ने केवल 67 फ़िल्मों में ही संगीत दिया, लेकिन उनका कौशल इस बात की जीती जागती मिसाल है कि गुणवत्ता संख्याबल से कहीं आगे होती है। भारतीय सिनेमा को समृद्ध बनाने वाले संगीतकारों की कमी नहीं है लेकिन नौशाद अली के संगीत की बात ही अलग थी। नौशाद ने फ़िल्मों की संख्या को कभी तरजीह नहीं देते हुए केवल संगीत को ही परिष्कृत करने का काम किया।


जीवन परिचय
हम जिन्हें संगीतकार नौशाद के नाम जानते हैं, उनका सही नाम था नौशाद अली। उन्हें संगीत से लगाव बचपन में ही हो गया था। चौथे दशक में वे फ़िल्मों से जुडे़, लेकिन इससे पहले उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। सिनेमा संगीत को हिंदुस्तानियत का जामा पहनाने वाले नौशाद का जन्म तहजीब और नजाकत के लिए मशहूर नवाबों के शहर लखनऊ में 25 दिसंबर 1919 को हुआ था। घर वालों का मुख्य काम था मुंशीगीरी, लेकिन बालक नौशाद का मन तो पूरी तरह संगीत में बसता था। जब वे नौ साल के थे, तब लखनऊ के अमीनाबाद के मुख्य बाज़ार की एक दुकान, जहाँ वाद्ययंत्र बिकते थे, के क़रीब वे रोज जाने लगे। जब कई दिनों तक ऐसा हुआ, तो मालिक ने एक दिन पूछ ही लिया। बातचीत के बाद नौशाद ने वहाँ काम करना स्वीकार लिया। उनका काम हुआ दुकान खुलने के समय से लेकर अन्य स्टाफ के आने से पहले की साफ-सफाई। नौशाद को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई थी। वे रोज समय से आते और दुकान खुलवाकर सभी वाद्ययंत्रों की अच्छी तरह सफाई करते और उन्हें जी भर कर छूते। कुछ वक्त तो ऐसे ही बीत गया। एक दिन दुकान खोलने वाले स्टाफ ने नौशाद से कहा, भइया.., तुम जब तक साफ़ सफाई करो, मैं तब तक चाय पीकर आता हूं। नौशाद ने कहा, जी ठीक है। वे उधर गए, नौशाद ने मौका देखकर वाद्ययंत्रों पर हाथ आजमाना शुरू कर दिया। एक दिन उस साज पर तो दूसरे दिन दूसरे और फिर तीसरे दिन तीसरे साज पर..। इसी तरह हर रोज स्टाफ चाय पीने जाता और नौशाद रियाज में लग जाते। यह रोज का काम हो गया। यह सब महीनों तक चला। एक दिन वह भी आया, जब मालिक समय से पहले आ धमका और नौशाद हारमोनियम बजाते पकड़े गए। नौशाद डरे हुए थे, उनकी हालत खराब थी। ठंड के समय में पसीना आ निकला था, लेकिन मालिक ऊपर से गुस्सैल बना रहा, वह अंदर से खुश था। पूछताछ के बाद अंत में मालिक ने वह पेटी यानी हारमोनियम नौशाद को दे दी और कहा, अच्छा बजाते हो, खूब रियाज करना..।


नौशाद का घर लखनऊ के अकबरी गेट के कांधारी बाज़ार, झंवाई टोला में था। वे लाटूस रोड पर अपने उस्ताद उमर अंसारी से संगीत सीखने लगे, इस बात से उनके वालिद नाराज रहते थे। अंत में बात यहां तक हो गई कि वालिद ने कह दिया कि अगर संगीत को अपनाओगे तो घर छोड़ दो। नौशाद ने मन में यह बात ठान ली कि घर छोड़ना सही होगा, लेकिन संगीत नहीं..। वे संगीत को अपनाए रहे। उनका अब मूल काम गाना-बाजाना हो गया। हालांकि उन पर कुछ कुछ समय बाद कई बार पाबंदियां लगीं, घर के दरवाज़े बंद किए गए, लेकिन नौशाद ने दादी का सहारा लिया और संगीत का शौक़ जारी रखा। उनके पांव और ख्वाब उनके पिता कभी नहीं रोक सके। इसी बीच उन्होंने मैट्रिक पास किया।


मैट्रिक पास करने के बाद वे लखनऊ के विंडसर एंटरटेनर म्यूजिकल ग्रुप के साथ दिल्ली, मुरादाबाद, जयपुर, जोधपुर और सिरोही की यात्रा पर निकले। जब कुछ समय बाद वह म्यूजिकल ग्रुप बिखर गया तो नौशाद ने लखनऊ लौटने के बजाए मुंबई का रुख़ किया और 16 वर्ष की किशोर उम्र में यानी 1935 में वे मुंबई आ गए। नौशाद के लिए मुंबई उम्मीदों का शहर था। यहां उन्हें पहला ठिकाना के रूप में दादर के ब्रॉडवे सिनेमाघर के सामने का फुटपाथ मिला। तब नौशाद ने सपना देखा था कि कभी इस सिनेमाघर में उनकी कोई फ़िल्म लगेगी। उस किशोर कल्पना को साकार होने में काफ़ी वक्त लगा। 'बैजू बावरा' जब उसी हॉल में रिलीज हुई, तो वहां रिलीज के समय नौशाद ने कहा, इस सड़क को पार करने में मुझे सत्रह साल लग गए..। शुरू में नौशाद ने एन. ए. दास यानी नौशाद अली दास के नाम से कुछ संगीतकारों के साथ काम किया। उन्हें काम मिलने लगा था, लेकिन बहुत नहीं।


1940 में बनी 'प्रेम नगर' में नौशाद को पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का मौका मिला। इसके बाद एक और फ़िल्म 'स्टेशन मास्टर' भी सफल रही। उसके बाद तो जैसे नौशाद संगीत के मोतियों की माला-सी बुनते चले गए। नौशाद को पहली बार 'सुनहरी मकड़ी' फ़िल्म में हारमोनियम बजाने का अवसर मिला। यह फ़िल्म पूरी नहीं हो सकी लेकिन शायद यहीं से नौशाद का सुनहरा सफर शुरू हुआ। इसी बीच गीतकार दीनानाथ मधोक (डीएन) से उनकी मुलाकात हुई तो उन्होंने उनका परिचय फ़िल्म इंडस्ट्री के अन्य लोगों से करवाया जिससे नौशाद को छोटा-मोटा काम मिलना प्रारंभ हुआ।


यह नौशाद के संगीत का ही जादू था कि 'मुग़ल-ए-आजम', 'बैजू बावरा', 'अनमोल घड़ी', 'शारदा', 'आन', 'संजोग' आदि कई फ़िल्मों को न केवल हिट बनाया बल्कि कालजयी भी बना दिया। 'दीदार' के गीत- 'बचपन के दिन भुला न देना', 'हुए हम जिनके लिए बरबाद', 'ले जा मेरी दुआएँ ले जा परदेश जाने वाले' आदि की बदौलत इस फ़िल्म ने लंबे समय तक चलने का रिकॉर्ड क़ायम किया। इसके बाद तो नौशाद की लोकप्रियता में ख़ासा इजाफा हुआ। 'बैजू बावरा' की सफलता से नौशाद को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पहला फ़िल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 1982 में फालके अवॉर्ड, 1984 में लता अलंकरण तथा 1992 में पद्म भूषण से उन्हें नवाजा गया। 


नौशाद को सुरैया, अमीरबाई कर्नाटकी, निर्मलादेवी, उमा देवी आदि को प्रोत्साहित कर आगे लाने का श्रेय जाता है। सुरैया को पहली बार उन्होंने 'नई दुनिया' में गाने का मौका दिया। इसके बाद 'शारदा' व 'संजोग' में भी गाने गवाए। सुरैया के अलावा निर्मलादेवी से सबसे पहले 'शारदा' में तथा उमा देवी यानी टुनटुन की आवाज का इस्तेमाल 'दर्द' में 'अफ़साना लिख रही हूँ' के लिए नौशाद ने किया। नौशाद ने ही मुकेश की दर्दभरी आवाज का इस्तेमाल 'अनोखी अदा' और 'अंदाज' में किया। 'अंदाज' में नौशाद ने दिलीप कुमार के लिए मुकेश और राज कपूर के लिए मो. रफी की आवाज का उपयोग किया। 1944 में युवा प्रेम पर आधारित 'रतन' के गाने उस समय के दौर में सुपरहिट हुए थे।
प्रसिद्ध गीत
'मन तरपत हरि दर्शन..' (बैजू बावरा)
'ओ दुनिया के रखवाले..' (बैजू बावरा)
'झूले में पवन के' (बैजू बावरा)
'मोहे पनघट पे नंद लाल' (मुग़ल-ए-आज़म)
'प्यार किया तो डरना क्या..' (मुग़ल-ए-आज़म)
'खुदा निगेबान..' (मुग़ल-ए-आज़म)
'मधुबन में राधिका नाचे रे..' (कोहिनूर)
'ढल चुकी शाम-ए-गम...' (कोहिनूर)
नन्हा मुन्ना राही हूँ (सन ऑफ़ इंडिया)
अपनी आज़ादी को हम (लीडर)
इंसाफ़ की डगर पर (गंगा जमुना)
नौशाद और सहगल का एक वाकया


'शाहजहाँ' में हीरो कुंदनलाल सहगल से नौशाद ने गीत गवाए। उस समय ऐसा माना जाता था कि सहगल बगैर शराब पिए गाने नहीं गा सकते। नौशाद ने सहगल से बगैर शराब पिए एक गाना गाने के लिए कहा तो सहगल ने कहा, 'बगैर पिए मैं सही नहीं गा पाऊँगा।' इसके बाद नौशाद ने सहगल से एक गाना शराब पिए हुए गवाया और उसी गाने को बाद में बगैर शराब पिए गवाया। जब सहगल ने अपने गाए दोनों गाने सुने तब नौशाद से बोले, 'काश! मुझसे तुम पहले मिले होते!' यह गीत कौन-सा था, इसका तो पता नहीं चला लेकिन 'शाहजहाँ' के गीत 'जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे...' तथा 'गम दिए मुस्तकिल, कितना नाजुक है दिल...' कालजयी सिद्ध हुए।


'तुम महान् गायक बनोगे'


'पहले आप' के निर्देशक कारदार मियाँ के पास एक बार सिफारिशी पत्र लेकर एक लड़का पहुँचा। तब उन्होंने नौशाद से कहा कि भाई, इस लड़के के लिए कोई गुंजाइश निकल सकती है क्या। नौशाद ने सहज भाव से कहा, 'फिलहाल तो कोई गुंजाइश नहीं है। हाँ, अलबत्ता इतना ज़रूर है कि मैं इनको कोई समूह (कोरस) में गवा सकता हूँ।' लड़के ने हाँ कर दी। गीत के बोल थे : 'हिन्दू हैं हम हिन्दुस्तां हमारा, हिन्दू-मुस्लिम की आँखों का तारा'। इसमें सभी गायकों को लोहे के जूते पहनाए गए, क्योंकि गाते समय पैर पटक-पटककर गाना था ताकि जूतों की आवाज का इफेक्ट आ सके। उस लड़के के जूते टाइट थे। गाने की समाप्ति पर लड़के ने जूते उतारे तो उसके पैरों में छाले पड़ गए थे। यह सब देख रहे नौशाद ने उस लड़के के कंधे पर हाथ रखकर कहा, 'जब जूते टाइट थे तो तुम्हें बता देना था।' इस पर उस लड़के ने कहा, 'आपने मुझे काम दिया, यही मेरे लिए बड़ी बात है।' तब नौशाद ने कहा था, 'एक दिन तुम महान् गायक बनोगे।' यह लड़का आगे चलकर मुहम्मद रफ़ी के नाम से जाना गया।


सम्मान और पुरस्कार
सन 1954 में 'बैजू बावरा' फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार
संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 1982 में फालके अवॉर्ड
1984 में लता मंगेशकर सम्मान
1984 में अमीर खुसरो पुरस्कार
1992 में पद्म भूषण
1992 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार

सन 1940 से 2006 तक उन्होंने अपना संगीत का सफर जारी रखा। उन्होंने अंतिम बार 2006 में बनी 'ताजमहल' के लिए संगीत दिया। अपने अंतिम दिनों तक वे कहते थे, 'मुझे आज भी ऐसा लगता है कि अभी तक न मेरी संगीत की तालीम पूरी हुई है और न ही मैं अच्छा संगीत दे सका।' और इसी मलाल के साथ वे 5 मई, 2006 को इस दुनिया से रुखसत हो गए।


Naushad Ali (26 December 1919 – 5 May 2006) was an Indian musician.He was the foremost music directors for Hindi films and is particularly known for popularizing the use of classical music in films.


His first film as an independent music director was Prem Nagar in 1940. His first musical success film was Rattan (1944), following it up with 35 silver jubilee hits, 12 golden jubilee and 3 diamond jubilee mega successes. Naushad was conferred the Dadasaheb Phalke Award and the Padma Bhushan in 1982 and 1992 respectively for his contribution to the Bollywood film industry.


Naushad was born and raised in Lucknow, a city with a long tradition as a center of Indian Muslim culture. His father, Wahid Ali, was a munshi (court clerk). As a child, Naushad would visit the annual fair at the Deva Sharif in Barabanki, 25 km from Lucknow, where all the great qawwals and musicians of those days would perform before the devotees. He studied Hindustani music there under Ustad Ghurbat Ali, Ustad Yusuf Ali, Ustad Babban Saheb and others. He also repaired harmoniums.


As a lad, he joined a junior theatrical club and was appointed the club's music maestro for their theatrical presentations. He used to watch silent films at the Royal theatre in Lucknow. Theatre owners would hire a team of musicians to play the tabla, harmonium, sitar and violin. The musicians would watch the film first, make notes, finalize the scales required. When the show began in the evening, they would sit in front of the screen and play music for the scenes. This was a great way to be entertained and learn music at the same time. It made him grasp the nuances required in composing a film's background music score.


In time Naushad formed his own Windsor Music Entertainers or just Windsor Entertainers, so named because he had seen the word "Windsor" around Lucknow and liked its ring. It led to the Indian Star Theatrical Company in a theatre at Golaganj colony in Lucknow. He was trained under Laddan Khan until he became capable of working independently as a composer. There he also developed the sense to pick rare musical jewels from the folk tradition of Punjab, Rajasthan, Gujarat and Saurashtra during the company's sojourns in those regions. The travelling players got as far as Viramgam in Gujarat, where they discovered penury, even after selling off theatrical props and musical instruments. The company limped back to Lucknow through the kindness of one of Naushad's friends.


Naushad had already become a cinema fan in the silent era and then, in 1931, Indian cinema got voice and music that further fascinated the 13-year-old boy. But his family was strict follower of Islamic diktat of prohibition of music and his father gave him ultimatum to leave music if he wanted to stay at home. He ran away to Mumbai in the late 1937 to try his luck as a musician.
In Mumbai, he initially stayed with an acquaintance from Lucknow (U.P.) at Colaba and after a while, shifted to Dadar opposite the Broadway theatre where he would sleep on the footpath. He assisted music director Ustad Jhande Khan who was at the peak of his success those days, at a monthly salary of Rs 40. The producer was a Russian and the studio was at Chembur. The film could not be completed. Naushad was a piano player so he worked as a pianist in composer Ustad Mushtaq Hussain's orchestra. He then polished off an unfinished film score and got a credit as assistant to Hussain. Then the film company collapsed. Composer Khemchand Prakash took him on as his assistant for the film Kanchan at Ranjit Studios at a salary of Rs 60 per month, for which Naushad remained extremely grateful and in interviews, he had called Khemchand his guru.


His friend, lyricist D. N. Madhok, trusted Naushad's unusual talent for composing music and introduced him to various film producers. Chandulal Shah, the owner of Ranjit Studios, offered to sign Naushad for one of his forthcoming films. Naushad composed a thumri for this film, "Bata de koi kaun gali gaye Shyam", but the film never got on the floors. He was assistant music director for the Punjabi film Mirza Sahib (1939).


He composed for his first independent film Prem Nagar in 1940 that had a story set in Kutch for which he did a lot of research into the folk music of the area. With A.R. Kardar's film Nayi Duniya (1942), he got first credit as "music director" and he began to work regularly for Kardar Productions. He however had a flexibility that he could work outside Kardar Productions and this arrangement continued ever after. He first got noticed with A.R. Kardar's film Sharda (1942) wherein 13-year-old Suraiya debuted with the song "Panchhi Ja" for the playback for heroine Mehtab. It was Rattan (1944) that took Naushad right to the top and enabled him to charge Rs 25,000 a film during those days.


Film expert and author Rajesh Subramanian opines that Kardar production spent Rupees seventy five thousand in 1944 to make Rattan. The music by Naushad saheb was such a phenomenal hit that the company earned Rs 3 lacs as royalty from gramophone sales in the first year.


But his Lucknow-based family remained against music and Naushad had to hide from his family the fact that he composed music. When Naushad got married, the band was playing the tunes of the super hit songs of Naushad's film 'Rattan'. While Naushad's father and father-in-law were condemning the musician who had composed these songs, Naushad dared not tell them that it was he who had composed the music.


From 1942 until the late 1960s, he was one of the top music directors in Hindi films. While he did less than a hundred films during his lifetime, 26 of those films celebrated Silver jubilees (25 weeks run) – 8 celebrated golden jubilees (50 weeks run) and 4 celebrated diamond jubilees (60 weeks run). (inclusive count – a diamond jubilee film also celebrated Silver and Golden jubilee)


Naushad worked with several lyricists, including Shakeel Badayuni, Majrooh Sultanpuri, D. N. Madhok, Zia Sarhadi, and Khumar Barabankvi.


Mother India (1957), for which he had composed music, was the first Indian film that got nominated for Oscar.


In 1981, Naushad was awarded the Dadasaheb Phalke Award for his lifetime contribution to Indian cinema.


He composed the tunes of Taj Mahal: An Eternal Love Story (2005) at the age of 86.


Amongst his assistants, Mohammed Shafi, Jerry Amaldev and Ghulam Mohammed stand out prominently.


Five films have been made on his life and work. Biographical books published are Dastaan-E-Naushad (Marathi) by Shashikant Kinikar; Aaj Gaawat Man Mero (Gujarati); Hindi and Urdu biographical sketches in Shama & Sushma Magazines respectively, titled "Naushad Ki Kahani, Naushad Ki Zubani"; the last one was translated into Marathi by Shashikant Kinikar. Kinikar also came up with a book titled "Notes of Naushad" which puts together some interesting anecdotes of Naushad's life.


Naushad also composed background music for the TV serial "Akbar The Great" telecast in 1988 which was directed by Akbar Khan, brother of Hindi film stars Sanjay Khan and Feroze Khan as also "The Sword of Tipu Sultan" produced and directed by Sanjay Khan and Akbar Khan which was telecast in 1990 and became very popular.
Naushad died on 5 May 2006 in Mumbai. He was buried at the Juhu Muslim cemetery.


He is survived by six daughters Zubeda, Fehmida, Farida, Sayeeda, Rashida, and Waheeda and three sons Rehman Naushad, Raju Naushad & Iqbal Naushad. Rehman Naushad and Raju Naushad had assisted him in some of his films. Also, Naushad composed music for two movies directed by Rahman Naushad, My Friend (1974) and 'Teri Payal Mere Geet (1989).


Naushad had requested the Maharashtra State Government to sanction a plot for an institution for promoting Hindustani music. This was sanctioned during his lifetime and the 'Naushad Academy of Hindustani Sangeet' was formed.



Writer
Naushad was also a respected and published poet and formally launched his book of Urdu poetry entitled Aathwaan Sur ("The Eighth Note") and the Navras label's album titled "Aathwan Sur – The Other Side of Naushad" having 8 ghazals as part of Hounslow's book fair and festival "Bookmela" in November 1998. The album has lyrics and composition by Naushad, arranged by Uttam Singh.


Track list:


Aabadiyon Mein Dasht Ka Munzar Bhi Aayega – A. Hariharan – 7:08
Aaj Ki Baat Kal Pay Kyun Taalo – A. Hariharan & Preeti Uttam Singh – 6:17
Ghata Chhaayi Thi Saawan Khul Ke Barsa – Preeti Uttam Singh – 7:19
Kabhi Meri Yaad Unko Aati To Hogi – A. Hariharan & Preeti Uttam Singh – 6:18
Mujh Ko Muaff Kijiye – A. Hariharan – 5:35
Peenay Waalay Bekhudi Say Kaam Lay – A. Hariharan & Preeti Uttam Singh – 8:13
Saawan Kay Jab Baadal Chhaaye – A. Hariharan – 6:50
Tanhaa Khud Say Baat Karoon – Preeti Uttam Singh – 7:49
Awards and recognition[edit]
1954: Filmfare Best Music Director Award – Baiju Bawra
1961: Bengal Film Journalists' Association's best music director Award for Gunga Jumna
1975: "Naushad Ali", a 30-minute documentary film produced by Television Centre, Mumbai
1981: Dada Saheb Phalke Award
1984: Lata Mangeshkar Award (Madhya Pradesh State Government's Award)
1987: Amir Khusro Award
1992: Sangeet Natak Akademi Award
1992: Padma Bhushan
: Maharashtra Gaurav Puruskar
: Best Music for "The Sword of Tipu Sultan"


Awards and recognition
1954: Filmfare Best Music Director Award – Baiju Bawra
1961: Bengal Film Journalists' Association's best music director Award for Gunga Jumna
1975: "Naushad Ali", a 30-minute documentary film produced by Television Centre, Mumbai
1981: Dada Saheb Phalke Award
1984: Lata Mangeshkar Award (Madhya Pradesh State Government's Award)
1987: Amir Khusro Award
1992: Sangeet Natak Akademi Award
1992: Padma Bhushan
: Maharashtra Gaurav Puruskar
: Best Music for "The Sword of Tipu Sultan"

Know Another Day