लाल बहादुर शास्त्री (मृत्यु: 11 जनवरी, 1966)

January 11, 2017

लाल बहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर, 1904 - मृत्यु: 11 जनवरी, 1966) एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता, महान स्वतंत्रता सेनानी और जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसी हस्ती थे जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में देश को न सिर्फ सैन्य गौरव का तोहफा दिया बल्कि हरित क्रांति और औद्योगीकरण की राह भी दिखाई। शास्त्री जी किसानों को जहां देश का अन्नदाता मानते थे, वहीं देश के सीमा प्रहरियों के प्रति भी उनके मन में अगाध प्रेम था जिसके चलते उन्होंने 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया।


जीवन परिचय
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुग़लसराय, उत्तर प्रदेश में 'मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव' के यहाँ हुआ था। इनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। अत: सब उन्हें 'मुंशी जी' ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम 'रामदुलारी' था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार से नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने का हुआ तब दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उसकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही प्रबुद्ध बालक ने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया। इसके पश्चात 'शास्त्री' शब्द 'लालबहादुर' के नाम का पर्याय ही बन गया।


भारत में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के एक कार्यकर्ता लाल बहादुर थोड़े समय (1921) के लिये जेल गए। रिहा होने पर उन्होंने एक राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय काशी विद्यापीठ (वर्तमान महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) में अध्ययन किया और स्नातकोत्तर शास्त्री (शास्त्रों का विद्वान) की उपाधि पाई। स्नातकोत्तर के बाद वह गांधी के अनुयायी के रूप में फिर राजनीति में लौटे, कई बार जेल गए और संयुक्त प्रांत, जो अब उत्तर प्रदेश है, की कांग्रेस पार्टी में प्रभावशाली पद ग्रहण किए। 1937 और 1946 में शास्त्री प्रांत की विधायिका में निर्वाचित हुए।


1928 में उनका विवाह गणेशप्रसाद की पुत्री 'ललिता' से हुआ। ललिता जी से उनके छ: सन्तानें हुईं, चार पुत्र- हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक; और दो पुत्रियाँ- कुसुम व सुमन। उनके चार पुत्रों में से दो- अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री अभी भी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं।


1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने श्री टंडन जी के साथ 'भारत सेवक संघ' के इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम किया। यहीं उनकी नज़दीकी नेहरू जी से भी बढी। इसके बाद से उनका क़द निरंतर बढता गया जिसकी परिणति नेहरू मंत्रिमंडल में गृहमंत्री के तौर पर उनका शामिल होना था। इस पद पर वे 1951 तक बने रहे।


"मरो नहीं मारो" का नारा "करो या मरो" का ही एक रूप था। गाँधीवादी सोच के चलते महात्मा गाँधी ने नारा दिया था- 'करो या मरो'। यह नारा उसी रात दिया गया था, जिस रात भारत छोड़ो आन्दोलन का आगाज़ हुआ। यह इसी नारे का असर था कि सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की प्रचंड आग फ़ैल गई। ब्रिटिश शासन के खिलाफ इसे अगर एक हिंसक नारा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह नारा लाल बहादुर शास्त्री द्वारा 1942 में दिया गया था, जो कि बहुत ही चतुराई पूर्ण रूप से 'करो या मरो' का ही एक अन्य रूप था तथा समझने में आत्यधिक सरल था। सैंकड़ों वर्षों से दिल में रोष दबाए हुए बैठी जनता में यह नारा आग की तरह फ़ैल गया था। एक तरफ गाँधीवादी विचारधारा अहिंसा के रास्ते पर चलकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन से ब्रिटिश सरकार से आज़ादी लिए जाने का रास्ता था, परन्तु अंग्रेज़ों ने शायद इसे आवाम का डर समझ लिया था। इसी कारण साफ़ अर्थों में अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों तथा हिंसा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना आवश्यक था। तत्पश्चात स्थिति को भांपते हुए शास्त्री जी ने चतुराईपूर्वक 'मरो नहीं मारो' का नारा दिया, जो एक क्रान्ति के जैसा साबित हुआ।


भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने। यातायात मंत्री के समय में उन्होंनें प्रथम बार किसी महिला को संवाहक (कंडक्टर) के पद में नियुक्त किया। प्रहरी विभाग के मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी के जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ कराया। 1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। 1952 में वह संसद के लिये निर्वाचित हुए और केंद्रीय रेलवे व परिवहन मंत्री बने।


1961 में गृह मंत्री के प्रभावशाली पद पर नियुक्ति के बाद उन्हें एक कुशल मध्यस्थ के रूप में प्रतिष्ठा मिली। 3 साल बाद जवाहरलाल नेहरू के बीमार पड़ने पर उन्हें बिना किसी विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया और नेहरू की मृत्यु के बाद जून 1964 में वह भारत के प्रधानमंत्री बने। भारत की आर्थिक समस्याओं से प्रभावी ढंग से न निपट पाने के कारण शास्त्री जी की आलोचना हुई, लेकिन जम्मू-कश्मीर के विवादित प्रांत पर पड़ोसी पाकिस्तान के साथ वैमनस्य भड़कने पर (1965) उनके द्वारा दिखाई गई दृढ़ता के लिये उन्हें बहुत लोकप्रियता मिली। ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध करने की ताशकंद घोषणा के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई।


धोती कुर्ते में सिर पर टोपी लगाए गांव-गांव किसानों के बीच घूमकर हाथ को हवा में लहराता, जय जवान, जय किसान का उद्घोष करता। ये उसके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू है। भले ही इस महान व्यक्ति का कद छोटा हो लेकिन भारतीय इतिहास में उसका कद बहुत ऊंचा है। जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री जी ने 9 जून, 1964 को प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण किया। उनका कार्यकाल राजनीतिक सरगर्मियों से भरा और तेज गतिविधियों का काल था। पाकिस्तान और चीन भारतीय सीमाओं पर नज़रें गड़ाए खड़े थे तो वहीं देश के सामने कई आर्थिक समस्याएं भी थीं। लेकिन शास्त्री जी ने हर समस्या को बेहद सरल तरीक़े से हल किया। किसानों को अन्नदाता मानने वाले और देश की सीमा प्रहरियों के प्रति उनके अपार प्रेम ने हर समस्या का हल निकाल दिया "जय जवान, जय किसान" के उद्घोष के साथ उन्होंने देश को आगे बढ़ाया।


जिस समय लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने उस साल 1965 में पाकिस्तानी हुकूमत ने कश्मीर घाटी को भारत से छीनने की योजना बनाई थी। लेकिन शास्त्री जी ने दूरदर्शिता दिखाते हुए पंजाब के रास्ते लाहौर में सेंध लगा पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस हरकत से पाकिस्तान की विश्व स्तर पर बहुत निंदा हुई। पाक हुक्मरान ने अपनी इज्जत बचाने के लिए तत्कालीन सोवियस संघ से संपर्क साधा जिसके आमंत्रण पर शास्त्री जी 1966 में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता करने के लिए ताशकंद गए। इस समझौते के तहत भारत, पाकिस्तान के वे सभी हिस्से लौटाने पर सहमत हो गया, जहां भारतीय सेना ने विजय के रूप में तिरंगा झंडा गाड़ दिया था।


ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच 11 जनवरी, 1966 को हुआ एक शांति समझौता था। इस समझौते के अनुसार यह तय हुआ कि भारत और पाकिस्तान अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे और अपने झगड़ों को शान्तिपूर्ण ढंग से तय करेंगे। यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब ख़ाँ की लम्बी वार्ता के उपरान्त 11 जनवरी, 1966 ई. को ताशकंद, रूस में हुआ।


लाल बहादुर शास्त्री अपने परिवार के साथ
ताशकंद समझौते के बाद दिल का दौरा पड़ने से 11 जनवरी, 1966 को ताशकंद में शास्त्री जी का निधन हो गया। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर आज तक कोई आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं लाई गई है। उनके परिजन समय समय पर उनकी मौत का सवाल उठाते रहे हैं। यह देश के लिए एक शर्म का विषय है कि उसके इतने काबिल नेता की मौत का कारण आज तक साफ नहीं हो पाया है।


शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।


Lal Bahadur Shastri ( 2 October 1904 – 11 January 1966) was the 2nd Prime Minister of India and a senior leader of the Indian National Congress political party.


Shastri joined the Indian independence movement in the 1920s and with his friend Nithin Eslavath. Deeply impressed and influenced by Mahatma Gandhi (with whom he shared his birthday), he became a loyal follower, first of Gandhi, and then of Jawaharlal Nehru. Following independence in 1947, he joined the latter's government and became one of Prime Minister Nehru's principal, first as Railways Minister (1951–56), and then in a variety of other functions, including Home Minister.


He led the country during the Indo-Pakistan War of 1965. His slogan of "Jai Jawan Jai Kisan" ("Hail the soldier, Hail the farmer") became very popular during the war and is remembered even today.[when?] The war formally ended with the Tashkent Agreement on 10 January 1966; he died the following day, still in Tashkent, the cause of death was said to be a heart attack but there are various reasons to think that it was a planned murder by the CIA. Also, opposition parties of the Congress, have always claimed Indira Gandhi's role in Shastri's death as a part of her strategy to keep the Prime Minister post with the Nehru family.



Shastri was born at the house of his maternal grandparents in Ramnagar, Varanasi in a Kayastha Hindu family, that had traditionally been employed as Highly administrators and civil servants. Shastri's paternal ancestors had been in the service of the zamindar of Ramnagar near Varanasi and Shastri lived there for the first one year of his life. Shastri's father, Sharada Prasad Srivastava, was a school teacher who later became a clerk in the revenue office at Allahabad, while his mother, Ramdulari Devi, was the daughter of Munshi Hazari Lal, the headmaster and English teacher at a railway school in Mughalsarai. Shastri was the second child and eldest son of his parents; he had an elder sister, Kailashi Devi (b. 1900).


In April 1906, When Shastri was hardly one year old, his father, had only recently been promoted to the post of deputy tahsildar, died in an epidemic of bubonic plague. Ramdulari Devi, then only 23 and pregnant with her third child, took her two children and moved from Ramnnagar to her father's house in Mughalsarai and settled there for good. She gave birth to a daughter, Sundari Devi, in July 1906. Thus, Shastri and his sisters grew up in the household of his maternal grandfather, Hazari Lal. However, Hazari Lal himself died from a stroke in mid-1908, after which the family were looked after by his brother (Shastri's great-uncle) Darbari Lal, who was the head clerk in the opium regulation department at Ghazipur, and later by his son (Ramdulari Devi's cousin) Bindeshwari Prasad, a school teacher in Mughalsarai.


In Shastri's family, as with many Kayastha families, it was the custom in that era for children to receive an education in the Urdu language and culture. This is because Urdu/Persian had been the language of government for centuries, before being replaced by English, and old traditions persisted into the 20th century. Therefore, Shastri began his education at the age of four under the tutelage of a maulvi (a Muslim cleric), Budhan Mian, at the East Central Railway Inter college in Mughalsarai. He studied there until the sixth standard. In 1917, Bindeshwari Prasad (who was now head of the household) was transferred to Varanasi, and the entire family moved there, including Ramdulari Devi and her three children. In Varanasi, Shastri joining the seventh standard at Harish Chandra High School. At this time, he decided to drop his caste-derived surname of "Srivastava" (which is a traditional surname for all Kayastha families).For the outstanding slogan given by him during Indo-Pak war of 1965 Ministry of Information and Broadcasting (India) commemorated Shastriji even after 47 years of his death on his 48th martyr's day:


Former Prime Minister Lal Bahadur Shastri was one of those great Indians who has left an indelible impression on our collective life. Shri Lal Bahadur Shastri's contribution to our public life were unique in that they were made in the closest proximity to the life of the common man in India. Shri Lal Bahadur Shastri was looked upon by Indians as one of their own, one who shared their ideals, hopes and aspirations. His achievements were looked upon not as the isolated achievements of an individual but of our society collectively.


Under his leadership India faced and repulsed the Pakistani invasion of 1965. It is not only a matter of pride for the Indian Army but also for every citizen of the country. Shri Lal Bahadur Shastri's slogan Jai Jawan! Jai Kisan!! reverberates even today through the length and breadth of the country. Underlying this is the inner-most sentiments 'Jai Hind'. The war of 1965 was fought and won for our self-respect and our national prestige. For using our Defence Forces with such admirable skill, the nation remains beholden to Shri Lal Bahadur Shastri. He will be remembered for all times to come for his large heartedness and public service.Shastri continued Nehru policy of non-alignment but also built closer relations with the Soviet Union. In the aftermath of the Sino-Indian War of 1962 and the formation of military ties between the Chinese People's Republic and Pakistan, Shastri's government decided to expand the defence budget of India's armed forces.


In 1964, Shastri signed an accord with the Sri Lankan Prime minister Sirimavo Bandaranaike regarding the status of Indian Tamils in the then Ceylon.This agreement is also known as the Sirima-Shastri Pact or the Bandaranaike-Shastri pact.


Under the terms of this agreement, 600,000 Indian Tamils were to be repatriated, while 375,000 were to be granted Sri Lankan citizenship. This settlement was to be done by 31 October 1981. However, after Shastri's death, by 1981, India had taken only 300,000 Tamils as repatriates, while Sri Lanka had granted citizenship to only 185,000 citizens (plus another 62,000 born after 1964). Later, India declined to consider any further applications for citizenship, stating that the 1964 agreement had lapsed.


India's relationship with Burma had been strained after the 1962 Military coup followed by the repatriation of many Indian families in 1964 by Burma. While the central government in New Delhi monitored the overall process of repatriation and arranged for identification and transportation of the Indian returnees from Burma, it fell under the responsibilities of local governments to provide adequate facilities to shelter the repatriates upon disembarkation on Indian soil. Particularly in the Madras State the Chief Minister during that time, Minjur K. Bhaktavatsalam, showed care in rehabilitation of the returnees. In December 1965 Shastri made an official visit with his Family to Rangoon, Burma and re-established cordial relations with the country's military government of General Ne Win.
Shastri's greatest moment came when he led India in the 1965 Indo-Pak War.


Laying claim to half the Kutch peninsula, the Pakistani army skirmished with Indian forces in August, 1965. In his report to the Lok Sabha on the confrontation in Kutch, Shastri stated:


In the utilization of our limited resources, we have always given primacy to plans and projects for economic development. It would, therefore, be obvious for anyone who is prepared to look at things objectively that India can have no possible interest in provoking border incidents or in building up an atmosphere of strife... In these circumstances, the duty of Government is quite clear and this duty will be discharged fully and effectively... We would prefer to live in poverty for as long as necessary but we shall not allow our freedom to be subverted.


On August the 1st of 1965, major incursions of militants and Pakistani soldiers began, hoping not only to break down the government but incite a sympathetic revolt. The revolt did not happen, and India sent its forces across the Ceasefire Line (now Line of Control) and threatened Pakistan by crossing the International Border near Lahore as war broke out on a general scale. Massive tank battles occurred in the Punjab, and while the Pakistani forces made gains in the northern part of subcontinent, Indian forces captured the key post at Haji Pir, in Kashmir, and brought the Pakistani city of Lahore under artillery and mortar fire.


On 17 September 1965, while the Indo-Pak war was on, India received a letter from China alleging that the Indian army had set up army equipment in Chinese territory, and India would face China's wrath, unless the equipment was pulled down. In spite of the threat of aggression from China, Shastri declared "China's allegation is untrue".The Chinese did not respond, but the Indo-Pak war resulted in some 3–4,000 casualties on each side and significant loss of material.


The Indo-Pak war ended on 23 September 1965 with a United Nations-mandated ceasefire. In a broadcast to the nation on the day of the ceasefire, Shastri stated:


"While the conflict between the armed forces of the two countries has come to an end, the more important thing for the United Nations and all those who stand for peace is to bring to an end the deeper conflict.... How can this be brought about? In our view, the only answer lies in peaceful coexistence. India has stood for the principle of coexistence and championed it all over the world. Peaceful coexistence is possible among nations no matter how deep the differences between them, how far apart they are in their political and economic systems, no matter how intense the issues that divide them."


During his tenure as Prime Minister, Shastri visited many countries including Russia, Yugoslavia, England, Canada, Nepal, Egypt and Burma. Incidentally while returning from the Non Alliance Conference in Cairo on the invitation of then President of the Pakistan, Mohammed Ayub Khan to have lunch with him, Shastri made a stop over at Karachi Airport for few hours and breaking from the protocol Ayub Khan personally received him at the Airport and had an informal meeting during October 1964. After the declaration of ceasefire with Pakistan in 1965, Shastri and Ayub Khan attended a summit in Tashkent (former USSR, now in modern Uzbekistan), organized by Alexei Kosygin. On 10 January 1966, Shastri and Ayub Khan signed the Tashkent Declaration.


Shastri died in Tashkent, at 02:00 on the day after signing the Tashkent Declaration, reportedly due to a heart attack, but people allege conspiracy behind the death.He was the first Prime Minister of India to die overseas. He was eulogised as a national hero and the Vijay Ghat memorial established in his memory. Upon his death, Gulzarilal Nanda once again assumed the role of Acting Prime Minister until the Congress Parliamentary Party elected Indira Gandhi over Morarji Desai to officially succeed Shastri.