स्वामी दयानन्द सरस्वती ( मृत्यु- 30 अक्टूबर, 1883)

October 30, 2017

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (जन्म- 12 फरवरी, 1824 - गुजरात, भारत; मृत्यु- 30 अक्टूबर, 1883 अजमेर, राजस्थान) आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी सन्न्यासी थे। जिस समय केशवचन्द्र सेन ब्रह्मसमाज के प्रचार में संलग्न थे लगभग उसी समय दण्डी स्वामी विरजानन्द की मथुरा पुरी स्थित कुटी से प्रचण्ड अग्निशिखा के समान तपोबल से प्रज्वलित, वेदविद्यानिधान एक सन्न्यासी निकला, जिसने पहले-पहल संस्कृतज्ञ विद्वात्संसार को वेदार्थ और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। यह सन्न्यासी स्वामी दयानन्द सरस्वती थे।


परिचय


प्राचीन ऋषियों के वैदिक सिद्धांतों की पक्षपाती प्रसिद्ध संस्था, जिसके प्रतिष्ठाता स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म गुजरात की छोटी-सी रियासत मोरवी के टंकारा नामक गाँव में हुआ था। मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण पुत्र का नाम मूलशंकर रखा गया। मूलशंकर की बुद्धि बहुत ही तेज़ थी। 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें रुद्री आदि के साथ-साथ यजुर्वेद तथा अन्य वेदों के भी कुछ अंश कंठस्थ हो गए थे। व्याकरण के भी वे अच्छे ज्ञाता थे। इनके पिता का नाम 'अम्बाशंकर' था। स्वामी दयानन्द बाल्यकाल में शंकर के भक्त थे। यह बड़े मेधावी और होनहार थे। शिवभक्त पिता के कहने पर मूलशंकर ने भी एक बार शिवरात्रि का व्रत रखा था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि एक चुहिया शिवलिंग पर चढ़कर नैवेद्य खा रही है, तो उन्हें आश्चर्य हुआ और धक्का भी लगा। उसी क्षण से उनका मूर्तिपूजा पर से विश्वास उठ गया। पुत्र के विचारों में परिवर्तन होता देखकर पिता उनके विवाह की तैयारी करने लगे। ज्यों ही मूलशंकर को इसकी भनक लगी, वे घर से भाग निकले। उन्होंने सिर मुंडा लिया और गेरुए वस्त्र धारण कर लिए। ब्रह्मचर्यकाल में ही ये भारतोद्धार का व्रत लेकर घर से निकल पड़े। इनके जीवन को मोटे तौर से तीन भागों में बाँट सकते हैं:


घर का जीवन(1824-1845),
भ्रमण तथा अध्ययन (1845-1863) एवं
प्रचार तथा सार्वजनिक सेवा। (1863-1883)


चौदह वर्ष की अवस्था में मूर्तिपूजा के प्रति विद्रोह (जब शिवचतुर्दशी की रात में इन्होंने एक चूहे को शिव की मूर्ति पर चढ़ते तथा उसे गन्दा करते देखा),
अपनी बहिन की मृत्यु से अत्यन्त दु:खी होकर संसार त्याग करने तथा मुक्ति प्राप्त करने का निश्चय।
इक्कीस वर्ष की आयु में विवाह का अवसर उपस्थित जान, घर से भागना। घर त्यागने के पश्चात् 18 वर्ष तक इन्होंने सन्न्यासी का जीवन बिताया। इन्होंने बहुत से स्थानों में भ्रमण करते हुए कतिपय आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की।
शिक्षा


बहुत से स्थानों में भ्रमण करते हुए इन्होंने कतिपय आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की। प्रथमत: वेदान्त के प्रभाव में आये तथा आत्मा एवं ब्रह्म की एकता को स्वीकार किया। ये अद्वैत मत में दीक्षित हुए एवं इनका नाम 'शुद्ध चैतन्य" पड़ा। पश्चात् ये सन्न्यासियों की चतुर्थ श्रेणी में दीक्षित हुए एवं यहाँ इनकी प्रचलित उपाधि दयानन्द सरस्वती हुई।


सच्चे ज्ञान की खोज में इधर-उधर घूमने के बाद मूलशंकर , जो कि अब स्वामी दयानन्द सरस्वती बन चुके थे, मथुरा में वेदों के प्रकाण्ड विद्वान् प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द के पास पहुँचे। दयानन्द ने उनसे शिक्षा ग्रहण की। मथुरा के प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द, जो वैदिक साहित्य के माने हुए विद्वान् थे। उन्होंने इन्हें वेद पढ़ाया । वेद की शिक्षा दे चुकने के बाद उन्होंने इन शब्दों के साथ दयानन्द को छुट्टी दी "मैं चाहता हूँ कि तुम संसार में जाओं और मनुष्यों में ज्ञान की ज्योति फैलाओ।" संक्षेप में इनके जीवन को हम पौराणिक हिन्दुत्व से आरम्भ कर दार्शनिक हिन्दुत्व के पथ पर चलते हुए हिन्दुत्व की आधार शिला वैदिक धर्म तक पहुँचता हुआ पाते हैं।


गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके महर्षि स्वामी दयानन्द ने अपना शेष जीवन इसी कार्य में लगा दिया। हरिद्वार जाकर उन्होंने ‘पाखण्डखण्डिनी पताका’ फहराई और मूर्ति पूजा का विरोध किया। उनका कहना था कि यदि गंगा नहाने, सिर मुंडाने और भभूत मलने से स्वर्ग मिलता, तो मछली, भेड़ और गधा स्वर्ग के पहले अधिकारी होते। बुजुर्गों का अपमान करके मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध करना वे निरा ढोंग मानते थे। छूत का उन्होंने ज़ोरदार खण्डन किया। दूसरे धर्म वालों के लिए हिन्दू धर्म के द्वार खोले। महिलाओं की स्थिति सुधारने के प्रयत्न किए। मिथ्याडंबर और असमानता के समर्थकों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। अपने मत के प्रचार के लिए स्वामी जी 1863 से 1875 तक देश का भ्रमण करते रहे। 1875 में आपने मुम्बई में ‘आर्यसमाज’ की स्थापना की और देखते ही देखते देशभर में इसकी शाखाएँ खुल गईं। आर्यसमाज वेदों को ही प्रमाण और अपौरुषेय मानता है।


आर्यसमाज की स्थापना के साथ ही स्वामी जी ने हिन्दी में ग्रन्थ रचना आरम्भ की। साथ ही पहले के संस्कृत में लिखित ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद किया। ‘ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका’ उनकी असाधारण योग्यता का परिचायक ग्रन्थ है। ‘सत्यार्थप्रकाश’ सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ है। अहिन्दी भाषी होते हुए भी स्वामी जी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। उनके शब्द थे - ‘मेरी आँखें तो उस दिन को देखने के लिए तरस रहीं हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा को बोलने और समझने लग जायेंगे।’ अपने विचारों के कारण स्वामी जी को प्रबल विरोध का भी सामना करना पड़ा। उन पर पत्थर मारे गए, विष देने के प्रयत्न भी हुए, डुबाने की चेष्टा की गई, पर वे पाखण्ड के विरोध और वेदों के प्रचार के अपने कार्य पर अडिग रहे।


इन्होंने शैवमत एवं वेदान्त का परित्याग किया, सांख्ययोग को अपनाया जो उनका दार्शनिक लक्ष्य था और इसी दार्शनिक माध्यम से वेद की भी व्याख्या की। जीवन के अन्तिम बीस वर्ष इन्होंने जनता को अपना संदेश सुनाने में लगाये। दक्षिण में बम्बई से पूरा दक्षिण भारत, उत्तर में कलकत्ता से लाहौर तक इन्होंने अपनी शिक्षाएँ घूम-घूम कर दीं। पण्डितों, मौलवियों एवं पादरियों से इन्होंने शास्त्रार्थ किया, जिसमें काशी का शास्त्रार्थ महत्त्वपूर्ण था। इस बीच इन्होंने साहित्य कार्य भी किये। चार वर्ष की उपदेश यात्रा के पश्चात् ये गंगातट पर स्वास्थ्य सुधारने के लिए फिर बैठ गये। ढाई वर्ष के बाद पुन: जनसेवा का कार्य आरम्भ किया।


1863 से 1875 ई. तक स्वामी जी देश का भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार करते रहें। उन्होंने वेदों के प्रचार का बीडा उठाया और इस काम को पूरा करने के लिए संभवत: 7 या 10 अप्रैल 1875 ई. को 'आर्य समाज' नामक संस्था की स्थापना की। शीघ्र ही इसकी शाखाएं देश-भर में फैल गई। देश के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नवजागरण में आर्य समाज की बहुत बड़ी देन रही है। हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली और अनेक संस्कारगत कुरीतियों से छुटकारा मिला। स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है। इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।


स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिन्दी भाषा को अपनाया। उनकी सभी रचनाएं और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' मूल रूप में हिन्दी भाषा में लिखा गया। उनका कहना था - "मेरी आंख तो उस दिन को देखने के लिए तरस रही है। जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा बोलने और समझने लग जाएंगे।" स्वामी जी धार्मिक संकीर्णता और पाखंड के विरोधी थे। अत: कुछ लोग उनसे शत्रुता भी करने लगे। इन्हीं में से किसी ने 1883 ई. में दूध में कांच पीसकर पिला दिया जिससे आपका देहांत हो गया। आज भी उनके अनुयायी देश में शिक्षा आदि का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।


स्वामी दयानन्द सरस्वती का निधन एक वेश्या के कुचक्र से हुआ। जोधपुर की एक वेश्या ने, जिसे स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर राजा ने त्याग दिया था, स्वामी जी के रसोइये को अपनी ओर मिला लिया और विष मिला दूध स्वामी जी को पिला दिया। इसी षड्यंत्र के कारण 30 अक्टूबर 1883 ई. को दीपावली के दिन स्वामी जी का भौतिक शरीर समाप्त हो गया। लेकिन उनकी शिक्षाएँ और संदेश उनका ‘आर्यसमाज’ आन्दोलन बीसवीं सदी के भारतीय इतिहास में एक ज्वलंत अध्याय लिख गए, जिसकी अनुगूँज आज तक सुनी जाती है।


स्वामी दयानन्द द्वारा लिखी गयी महत्त्वपूर्ण रचनाएं - सत्यार्थप्रकाश (1874 संस्कृत), पाखण्ड खण्डन (1866), वेद भाष्य भूमिका (1876), ऋग्वेद भाष्य (1877), अद्वैतमत का खण्डन (1873), पंचमहायज्ञ विधि (1875), वल्लभाचार्य मत का खण्डन (1875) आदि।


महापुरुषों के विचार
डॉ. भगवान दास ने कहा था कि स्वामी दयानन्द हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता थे।
श्रीमती एनी बेसेन्ट का कहना था कि स्वामी दयानन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 'आर्यावर्त (भारत) आर्यावर्तियों (भारतीयों) के लिए' की घोषणा की।


सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतन्त्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने डाली थी।
पट्टाभि सीतारमैया का विचार था कि गाँधी जी राष्ट्रपिता हैं, पर स्वामी दयानन्द राष्ट्र–पितामह हैं।
फ्रेञ्च लेखक रोमां रोलां के अनुसार स्वामी दयानन्द राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रुप देने में प्रयत्नशील थे।



Dayanand Saraswati  (12 February 1824 – 30 October 1883) was an Indian religious leader and founder of the Arya Samaj, a Hindu reform movements of the Vedic dharma. He was also a renowned scholar of the Vedic lore and Sanskrit language. He was the first to give the call for Swaraj as "Indian for India" in 1876, a call later taken up by Lokmanya Tilak. Denouncing the idolatry and ritualistic worship prevalent in Hinduism at the time, he worked towards reviving Vedic ideologies. Subsequently, the philosopher and President of India, S. Radhakrishnan called him one of the "makers of Modern India", as did Sri Aurobindo.


Those who were influenced by and followed Dayananda included Madam Cama, Pandit Lekh Ram, Swami Shraddhanand, Pandit Guru Dutt Vidyarthi,Shyamji Krishna Varma (who established India House in England for Freedom fighters,) Vinayak Damodar Savarkar, Lala Hardayal, Madan Lal Dhingra, Ram Prasad Bismil, Mahadev Govind Ranade, Ashfaq Ullah Khan Swami Shraddhanand, Mahatma Hansraj, Lala Lajpat Rai, and others. One of his most influential works is the book Satyarth Prakash, which contributed to the Indian independence movement.


He was a sanyasi (ascetic) from boyhood, and a scholar. He believed in the infallible authority of the Vedas. Maharshi Dayananda advocated the doctrine of Karma and Reincarnation. He emphasized the Vedic ideals of brahmacharya, including celibacy and devotion to God.


Among Maharshi Dayananda's contributions are his promoting of the equal rights for women, such as the right to education and reading of Indian scriptures, and his commentary on the Vedas from Vedic Sanskrit in Sanskrit as well as in Hindi.


Dayananda Saraswati was born on the 10th day of waning moon in the month of Purnimanta Falguna (either the 12 or 24 February 1824) on the tithi to a Hindu family in Jeevapar Tankara, Kathiawad region (now Rajkot district of Gujarat.)His original name was Mul Shankar because he was born in Dhanu Rashi and Mul Nakshatra. His father was Karshanji Lalji Tiwari, a wealthy tax collector, and mother Amrutbai. His father also served as the head of an eminent Hindu family of the village. As such Dayanand led a comfortable early life, learning Sanskrit and studying the Vedas and other religious texts.


When he was eight years old, his Yajnopavita Sanskara ceremony was performed, marking his entry into formal education. His father was a follower of Shiva and taught him the ways to impress Shiva. He was also taught the importance of keeping fasts. On the occasion of Shivratri, Dayananda sat awake the whole night in obedience to Shiva. On one of these fasts, he saw a mouse eating the offerings and running over the idol's body. After seeing this, he questioned that if Shiva could not defend himself against a mouse, then how could he be the savior of the massive world.


The deaths of his younger sister and his uncle from cholera caused Dayananda to ponder the meaning of life and death. He began asking questions which worried his parents. He was engaged in his early teens, but he decided marriage was not for him and ran away from home in 1846.


Dayananda Saraswati spent nearly twenty-five years, from 1845 to 1869, as a wandering ascetic, searching for religious truth. He gave up material goods and lived a life of self-denial, devoting himself to spiritual pursuits in forests, retreats in the Himalayan Mountains, and pilgrimage sites in northern India. During these years he practiced various forms of yoga and became a disciple of a religious teacher named Virajanand Dandeesha. Virajanand believed that Hinduism had strayed from its historical roots and that many of its practices had become impure. Dayananda Sarasvati promised Virajanand that he would devote his life to restoring the rightful place of the Vedas in the Hindu faith.


Dayanand's mission was to ask humankind for universal brotherhood through nobility as stated in the Vedas. He believed that Hinduism had been corrupted by divergence from the founding principles of the Vedas and that Hindus had been misled by the priesthood for the priests' self-aggrandizement. For this mission, he founded the Arya Samaj, enunciating the Ten Universal Principles as a code for Universalism, called Krinvanto Vishwaryam. With these principles, he intended the whole world to be an abode for Nobles (Aryas).


His next step was to reform Hinduism with a new dedication to God. He traveled the country challenging religious scholars and priests to discussions, winning repeatedly through the strength of his arguments and knowledge of Sanskrit and Vedas. Hindu priests discouraged the laity from reading Vedic scriptures, and encouraged rituals, such as bathing in the Ganges River and feeding of priests on anniversaries, which Dayananda pronounced as superstitions or self-serving practices. By exhorting the nation to reject such superstitious notions, his aim was to educate the nation to return to the teachings of the Vadis, and to follow the Vadic way of life. He also exhorted the Hindu nation to accept social reforms, including the importance of Cows for national prosperity as well as the adoption of Hindi as the national language for national integration. Through his daily life and practice of yoga and asanas, teachings, preaching, sermons and writings, he inspired the Hindu nation to aspire to Swarajya (self governance), nationalism, and spiritualism. He advocated the equal rights and respects to women and advocated for the education of all children, regardless of gender.


Swami Dayanand also logical, scientific and critical analyses of faiths including Christianity & Islam, as well as of other Indian faiths like Jainism, Buddhism, and Sikhism. In addition to discouraging idolatry in Hinduism, he was also against what he considered to be the corruption of the true and pure faith in his own country. Unlike many other reform movements of his times within Hinduism, the Arya Samaj's appeal was addressed not only to the educated few in India, but to the world as a whole as evidenced in the sixth principle of the Arya Samaj. As a result, his teachings professed universalism for all the living beings and not for any particular sect, faith, community or nation.


Dayananda's Vedic message emphasized respect and reverence for other human beings, supported by the Vedic notion of the divine nature of the individual. In the ten principles of the Arya Samaj, he enshrined the idea that "All actions should be performed with the prime objective of benefiting mankind", as opposed to following dogmatic rituals or revering idols and symbols. The first five principles speak of Truth, while the last five speak of a society with nobility, civics, co-living, and disciplined life. In his own life, he interpreted moksha to be a lower calling, as it argued for benefits to the individual, rather than calling to emancipate others.


Dayananda's "back to the Vedas" message influenced many thinkers and philosophers the world over.


Dayanand is recorded to have been active since he was 14, which time he was able to recite religious verses and teach about them. He was respected at the time for taking parts in religious debates. His debates were attended by relatively large crowd of the public.


One of the most important debates took place on 22 October 1869 in Varanasi, where he won a debate against 27 scholars and approximately 12 expert pandits. The debate recorded to have been attended by over 50,000 people. The main topic was "Do the Vedas uphold deity worship?"