महादजी शिन्दे ( मृत्यु:12 फरवरी 1794 ई.)

February 12, 2017

महादजी शिन्दे ( मृत्यु:12 फरवरी 1794 ई.) रणोजी सिंधिया का अवैध पुत्र और उत्तराधिकारी था। वह अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक काल में प्रमुख रूप से सक्रिय था। महादजी शिन्दे एक बहुत ही महत्वाकांक्षी और सैनिक गुणों से सम्पन्न व्यक्ति था। अपनी तीव्र बुद्धि और सैनिक कुशलताओं के कारण ही वह मराठा साम्राज्य में विशिष्ट स्थान रखता था। उसकी मृत्यु 1794 ई. में हुई थी।


परिचय
महादजी शिन्दे के जन्म के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का मतभेद है। कुछ विद्वान् इनका जन्म 1729 ई. व 1730 ई. में मानते हैं। ये मराठा साम्राज्य के शासक थे, इन्होंने ग्वालियर पर शासन किया था। इनके पिता का नाम सरदार रानोजी राव शिंदे व माता का नाम चीमा बाई था। इनक राज्याभिषेक 18 जनवरी 1768 ई. को हुआ व इन्होंने 18 जनवरी 1768 ई.-12 फरवरी 1794 ई. तक शासन किया था।


पेशवा बाजीराव प्रथम के शासन काल में महादजी शिन्दे छोटे से पद से पदोन्नति करते हुए उच्च पद तक पहुँच गया। 1803 ई. के द्वितीय युद्ध में उसने भाग लिया और घाव लगने के कारण सदा के लिए लंगड़ा हो गया। महाराष्ट्र वापस लौटकर उसने अपने दायित्व का निर्वाह इतनी कुशलता से किया कि सरदारों में वही सबसे प्रमुख गिना जाने लगा। उसका मुख्य उद्देश्य पूना स्थित पेशवा को नाना फड़नवीस के संरक्षण से हटाकर अपने संरक्षण में लेना था। इस लक्ष्य में वह सफल तो न हो सका, पर शीघ्र ही उत्तर भारत में उसने अपनी प्रतिष्ठा में इतनी वृद्धि कर ली कि 1771 ई. में शाहआलम द्वितीय को दिल्ली के सिंहासन पर पुन: आसीन कर स्वयं उसका रक्षक बन गया।


इसके बाद महादजी शिन्द अंग्रेज़ों और मराठों के बीच होने वाले प्रथम मराठा युद्ध (1775-82 ई.) में मध्यस्थ बना रहा और सालबाई की सन्धि के द्वारा दोनों पक्षों में पुन: शान्ति स्थापित करा दी। इससे अंग्रेज़ों में भी उसकी प्रतिष्ठा बढ़ गई। अंग्रेज़ों के सैनिक संगठन की श्रेष्ठता को भली-भाँति परखकर उसने अपनी सेना को भी काउन्ट दब्बांग जैसे यूरोपीय पदाधिकारियों की सहायता से पुनर्गठित किया और उसमें एक शक्तिशाली तोपख़ाने की व्यवस्था करके उसे एक नियमित सेना का रूप प्रदान किया। इसके बल पर उसने राजपूत और मुसलमान शासकों पर अपनी धाक जमा ली। 1790 ई. में पाटन नामक स्थान पर राजपूताना के इस्माइल बेग को, 1791 ई. में मिर्था के युद्ध में राजपूत शासकों के सम्मिलित दल को और 1792 ई. में लखेड़ी के युद्ध में होल्कर को पराजित किया।


इसके पूर्व ही उसने नाम मात्र के सम्राट शाहआलम द्वितीय से पेशवा को 'वकीले मुतलक' अथवा 'साम्राज्य के उपप्रधान' का ख़िताब दिलाया। 1793 ई. में महादजी शिन्दे के संयोजन से ही पूना में एक विशेष समारोह में विधिवत यह उपाधि पेशवा को दी गई। यद्यपि इससे पेशवा का केवल प्रतीकात्मक लाभ हुआ, तथापि महादजी शिन्दे के जीवन में यह समारोह उसकी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि थी। 1794 ई. में महादजी शिन्दे की मृत्यु हो गई।


Mahadaji Shinde (Birth: 3 December 1730) & (Died: 12 February 1794) also spelled as Mahadji Scindia, was a Maratha ruler of the Maratha Empire is a state of Gwalior in central India. He was the fifth and the youngest son of Sardar Ranoji Rao Scindia.


Mahadaji was instrumental in resurrecting Maratha power in North India after the Third Battle of Panipat in 1761, and rose to become a trusted lieutenant of the Peshwa, leader of the Maratha Empire. Along with Madhavrao I and Nana Fadnavis, he was one of the three pillars of Maratha Resurrection. During his reign, Gwalior became the leading state in the Maratha Empire and one of the foremost military powers in India. After accompanying Shah Alam II in 1771 to Delhi, he restored the Mughals in Delhi, under the suzerainty of Marathas.


He annihilated the power of Jats of Mathura and during 1772-73 he destroyed the power of Pashtun Rohillas in Rohilkhand and captured Najibabad. His role during the First Anglo-Maratha War was greatest from the Maratha side since he humbled the British in Central India, single handed, which resulted in the Treaty of Salbai in 1782, where he mediated between the Peshwa and the British.
Mahadji became Vakil-ul-Mutlaq (regent of Mughal affairs), and The Mughals also gave him the title of Amir-ul-Umara (head of the amirs) in 1784.



Another achievement of Mahadji was his victory over the Nizam of Hyderabad’s army in a battle. The Nizam state ceased be a factor in the north Indian politics after this battle and it generally confined itself in the Deccan afterwards. After the peace made with Tipu Sultan of Mysore in 1792, Mahadji exerted his influence to prevent the completion of a treaty between the British, the Nizam of Hyderabad, and the Peshwa, directed against Tipu.


After the Battle of Lakheri, Mahadji was now at the zenith of his power, when he died, at his camp at Wanavdi near Pune on 12 February 1794. He left no heir, and was succeeded by Daulat Rao Scindia.


Kini, the English biographer of Mahadaji Shinde, has described Mahadaji as the greatest man in South Asia in the 18th century.Mahadaji Shinde’s role was instrumental in establishing Maratha supremacy over North India.


Shinde Chhatri, located in Wanowrie, in Pune is a memorial dedicated to Mahadji Shinde. It is a hall that marks the spot of Mahadji Shinde's cremation on 12 February 1794. The three storied memorial in Rajput architectural style, is one of the most significant landmarks in the city.