नाडिया (मृत्यु- 10 जनवरी, 1996)

January 10, 2017

मेरी इवान्स या मेरी इवान्स वाडिया या फ़ीयरलेस नाडिया (जन्म- 8 जनवरी, 1908, ऑस्ट्रेलिया; मृत्यु- 10 जनवरी, 1996, मुम्बई) भारतीय सिनेमा की ख्यातिप्राप्त अभिनेत्रियों में से एक थीं। सिर्फ़ हिन्दी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा के सिनेमा के इतिहास में इतनी दबंग, निर्भीक, बहादुर, स्टंटबाज, टारजन या रॉबिनहुड स्टॉइल की नायिका आज तक दूसरी नहीं हुई। नाडिया ने हिन्दुस्तानी सिनेमा के तीस और चालीस के दशक में एक दिलेर-जांबाज अभिनेत्री के रूप में ऐसा जीवटभरा प्रदर्शन किया कि उसने पारम्परिक भारतीय समाज की अनेक मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया। अपने समय में नाडिया बहुत बड़ी स्टार थीं। उन्होंने अपने बलबूते पर कई हिट फ़िल्में दी थीं। किंतु नाडिया को वह मान-सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वह हकदार थीं।


नाडिया का जन्म 8 जनवरी, सन 1908 को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के 'पर्थ' शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम हर्बर्ट इवान्स था, जो ब्रिटिश सेना में सैनिक थे। माता का नाम ग्रीक मार्गरेट था। पहले नाडिया का नाम 'मेरी इवान्स' रखा गया था, किंतु एक अमेरिकी ज्योतिष की सलाह पर वह 'मेरी इवान्स' से 'नाडिया' हो गईं।


जब नाडिया केवल पाँच साल की थीं, तब उनके पिता का तबादला बम्बई (वर्तमान मुम्बई) हो गया, और पूरा परिवार भारत आ गया। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्हें फ़्राँस के मोर्चे पर भेजा गया था, जहाँ वे मारे गए। पिता की मृत्यु के बाद नाडिया की माँ बम्बई में ही बस गईं।


जब नाडिया ने होश संभाला तो माँ की मदद के लिए नौसेना के स्टोर्स में सेल्स गर्ल बन गईं। फिर सेक्रेटरी का दायित्व निभाया। इसी दौरान रशियन बैले नर्तकी मैडम एस्ट्रोव से उनकी मुलाकात हुई। बैले सीखने के लिए नाडिया ने अपन वजन भी घटाया। कुछ समय 'झाको रशियन सर्कस' में भी काम किया और अपनी कलाबाजियाँ दिखाईं। वे ब्रिटिश-भारतीय दर्शकों का मनोरंजन बैले के प्रदर्शन से करने लगीं। इसी दौरान एक शो में होमी वाडिया ने नाडिया को देखा तो उन पर मंत्रमुग्ध हो गए। स्क्रीन टेस्ट के बाद 'वाडिया मूवीटोन' के लिए नाडिया ऐसे अनुबंधित हुईं कि होमी वाडिया के 'होम' की मालकिन बनीं।


नाडिया ने सन 1933 में पहली बार हिन्दी फ़िल्म 'लाल ए यमन' में अभिनय किया था, जिसका निर्माण 'वाडिया मूवीटोन' के जेबीएच वाडिया ने किया था। भारत में 'हंटरवाली' के नाम से मशहूर हुई नाडिया ने 1930 और 1940 के दशक में 35 से भी अधिक फ़िल्मों में काम किया। पूरी ऊँची और गोरी-चिट्टी नाडिया के लिए नायक ढूँढना मुश्किल काम था। 'ऑल इण्डिया बॉडी ब्यूटीफुल कॉम्पिटिशन' के विजेता जॉन कावस का व्यक्तित्व शानदार था। वे हट्टे-कट्टे कदकाठी के कद्दावर व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें नाडिया का हीरो बना दिया गया। नाडिया की सफलता के पीछे जॉन कावस का बहुत बड़ा योगदान था।


आरंभिक दो-तीन फ़िल्मों में छोटे रोल करने के बाद जेबीएच वाडिया ने सन 1935 में फ़िल्म "हंटरवाली" की पटकथा लिखी। इस दौर में गूंगा सिनेमा अपने धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक गुफ़ाओं से बाहर आ रहा था। प्रभात फ़िल्म कंपनी, न्यू थिएटर्स, बाम्बे टॉकिज अपने स्टाइल की फ़िल्में बना रहे थे। वाडिया भाइयों ने अपना अलग चलन शुरू किया। यह अमेरिकन टार्जन मूवीज, वेस्टनर्स, काऊबॉय स्टाइल से प्रेरित था। नाडिया को स्टंट फ़िल्मों का ऑफ़र दिया गया।


'हंटरवाली' नायिका प्रधान फ़िल्म थी। उन दिनों साठ हज़ार रुपयों में फ़िल्म बन जाया करती थी। जेबीएच वाडिया ने 'हंटरवाली' का बजट अस्सी हज़ार किया। जब वितरकों ने फ़िल्म देखी, तो हीरोइन के हाथों में हंटर और तलवार देखकर पीछे हट गए। मजबूर होकर वाडिया भाइयों ने अपने दोस्त बिलिमोरिया की भागीदारी में 'हंटरवाली' फ़िल्म रिलीज की। दर्शकों ने अब तक या तो स्वर्ग की अप्सराओं या देवियों को फूल बरसाते देखा था या फिर घरों में कैद हमेशा रोने-धोने-कलपने वाली औरत को देखा था। इतनी दिलेर स्त्री को परदे पर हैरतअंगेज करतब करते देख वे चकित रह गए। फ़िल्म 'हंटरवाली' ने बॉक्स ऑफ़िस पर ऐसा धमाल किया कि नाडिया रातोंरात सुपर स्टार बन गईं। इस प्रकार स्टंट फ़िल्मों का कारवाँ चल पड़ा।


नाडिया सचमुच में एक बहादुर स्त्री थीं। इसका प्रमाण फ़िल्म "जंगल प्रिंसेस" से मिलता है। इस फ़िल्म के एक दृश्य में नाडिया चार शेरों से लड़ती हैं। हिन्दी उच्चारण ठीक नहीं होने के बावजूद भी फ़िल्म "पहाड़ी कन्या" में नाडिया ने लम्बे संवाद बोले थे। मारधाड़ में माहिर नाडिया ने कई भावुक दृश्य भी बड़ी खूबी के साथ दिए थे। फ़िल्म "मौज" में भावना प्रधान संवाद बोलकर उन्होंने दर्शकों को रुला दिया था।


उस समय तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी कि स्टंट वाले दृश्य आसानी से किए जा सकते। स्टंट दृश्य करने में जान का जोखिम बना रहता था। नाडिया स्टंट करने में पारंगत थीं। उनकी कई बार हड्डियाँ भी टूटीं, लेकिन वह हमेशा अपने स्टंट खुद करती थीं। उनके स्टंट दृश्य देखकर दर्शक चकरा जाते थे। आज के स्पाइडरमैन और सुपरमैन की तरह नाडिया की भी एक छवि थी। परदे पर वह बहादुर और सच्चाई की राह पर चलने वाली महिला का किरदार निभाती थीं। नकाबपोश, हाथ में हंटर और पैरों में लम्बे जूते पहने जब वह दुश्मनों को सबक सिखाती थीं तो सिनेमा हॉल दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूँज उठता था। फ़िल्मों में घोड़ा और कुत्ता नाडिया के साथी थे। कुश्ती, तलवारबाजी, घुड़सवारी, कहीं से भी छलाँग लगाना, चलती ट्रेन पर लड़ाई करना, ट्रेन से घोड़े पर बैठ जाना जैसे स्टंट करना नाडिया को बेहद पसंद थे। नाडिया और जॉन कावस को चलती ट्रेन पर स्टंट करने का शौक़ था। इसलिए ट्रेन फ़िल्मों की सीक्वल बनाई गईं, जिनके नाम थे- फ्रंटियर मेल, 'पंजाब मेल' और 'दिल्ली एक्सप्रेस'।


नाडिया सुपरवूमन थीं। अपनी दिलेरी के बल पर उन्होंने दर्शकों का दिल जीत लिया था। उन्हें 'फ़्री', 'फ़्रेंक', 'फ़ीयरलेस स्टंट क्वीन नाडिया' कहा जाता था। अपनी फ़िल्म "डायमंड क्वीन" के प्रचार में नाडिया ने लिखवाया था- "थका देने वाली फ़िल्में और होंगी, मेरी फ़िल्म देखकर दर्शक जोश से भर जाते हैं।"


उनकी आखिरी स्टंट फ़िल्म "सरकस क्वीन" थी। सन 1959 में उन्होंने अपने निर्माता-निर्देशक होमी वाडिया से विवाह कर फ़िल्मों से सन्न्यास ले लिया। 1968 में "खिलाड़ी" फ़िल्म में छोटी भूमिका में वह आखिरी वार परदे पर आई थीं। सिनेमा हॉल में जो लोग आगे बैठते थे, उन्हें उस समय 'चवन्नी क्लास' कहा जाता था। नाडिया के वे दीवाने थे। नाडिया के हैरतअंगेज करतब देखने में उन्हें खूब आनंद आता था। उस जमाने में जब नारी हमेशा पुरुषों के पीछे ही खड़ी होती थी। उसे अत्यंत कमज़ोर माना जाता था, नाडिया की सफलता वास्तव में आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।


 


लाल ए यमन - 1933
हंटरवाली - 1935
मिस फ्रंटियर मेल - 1936
पंजाब मेल - 1939
डायमंड क्वीन - 1940
हंटरवाली की बेटी - 1943
स्टंट क्वीन - 1945
हिम्मतवाली - 1945
लेडी रॉबिनहुड - 1946
तूफान क्वीन - 1947
दिल्ली एक्सप्रेस - 1949
कार्निवल क्वीन - 1955
सर्कस क्वीन - 1959
खिलाड़ी - 1968


सन 1935 से 1968 तक नाडिया ने कुल 42 फ़िल्मों में काम किया। 10 जनवरी, 1996 को मुम्बई, भारत में उनका देहांत हुआ।