गिरिजाकुमार माथुर (मृत्यु: 10 जनवरी, 1994)

January 10, 2017

गिरिजाकुमार माथुर ( जन्म: 22 अगस्त, 1919 - मृत्यु: 10 जनवरी, 1994) एक कवि, नाटककार और समालोचक के रूप में जाने जाते हैं। लम्बे अरसे तक इन्होंने आकाशवाणी की सेवा की। इनकी कविता में रंग, रूप, रस, भाव तथा शिल्प के नए-नए प्रयोग हैं। मुख्य काव्य संग्रह हैं, 'नाश और निर्माण', 'मंजीर', 'धूप के धान', 'शिलापंख चमकीले, 'जो बंध नहीं सका', 'साक्षी रहे वर्तमान', 'भीतर नदी की यात्रा', 'मैं वक्त के हूँ सामने' तथा 'छाया मत छूना मन' आदि। इन्होंने कहानी, नाटक तथा आलोचनाएं भी लिखी हैं। गिरिजाकुमार माथुर की 'मैं वक़्त के हूँ सामने' नामक काव्य संग्रह साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित है।


गिरिजाकुमार माथुर का जन्म मध्य प्रदेश के गुना ज़िले में 22 अगस्त, 1919 को हुआ। शिक्षा झांसी और लखनऊ में हुई। इनके पिता देवीचरण माथुर स्कूल अध्यापक थे तथा साहित्य एवं संगीत के शौकीन थे। वे कविता भी लिखा करते थे। सितार बजाने में प्रवीण थे। माता लक्ष्मीदेवी मालवा की रहने वाली थीं और शिक्षित थीं। गिरिजाकुमार की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता ने घर ही अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल आदि पढ़ाया। स्थानीय कॉलेज से इण्टरमीडिएट करने के बाद 1936 में स्नातक उपाधि के लिए ग्वालियर चले गये। 1938 में उन्होंने बी.ए. किया, 1941 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. किया तथा वकालत की परीक्षा भी पास की। इस बीच सन 1940 में उनका विवाह दिल्ली में कवयित्री शकुन्त माथुर से हुआ।


गिरिजाकुमार की काव्यात्मक शुरुआत 1934 में ब्रजभाषा के परम्परागत कवित्त-सवैया लेखन से हुई। वे विद्रोही काव्य परम्परा के रचनाकार माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' आदि की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित हुए और 1941 में प्रकाशित अपने प्रथम काव्य संग्रह 'मंजीर' की भूमिका उन्होंने सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' से लिखवायी। उनकी रचना का प्रारम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध की घटनाओं से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं से युक्त है तथा भारत में चल रहे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित है। सन 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित 'तारसप्तक' के सात कवियों में से एक कवि गिरिजाकुमार भी हैं। यहाँ उनकी रचनाओं में प्रयोगशीलता देखी जा सकती है। कविता के अतिरिक्त वे एकांकी नाटक, आलोचना, गीति-काव्य तथा शास्त्रीय विषयों पर भी लिखते रहे हैं। उनके द्वारा रचित मंदार, मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले आदि काव्य-संग्रह तथा खंड काव्य पृथ्वीकल्प प्रकाशित हुए हैं। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की साहित्यिक पत्रिका 'गगनांचल' का संपादन करने के अलावा इन्होंने कहानी, नाटक तथा आलोचनाएँ भी लिखी हैं। इनका ही लिखा एक भावान्तर गीत "हम होंगे कामयाब" समूह गान के रूप में अत्यंत लोकप्रिय है। गिरिजाकुमार माथुर की समग्र काव्य-यात्रा से परिचित होने के लिए इनकी पुस्तक "मुझे और अभी कहना है" अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।


1991 में कविता-संग्रह "मै वक्त के सामने" के लिए हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार
1993 में के. के. बिरला फ़ाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित व्यास सम्मान
शलाका सम्मान

10 जनवरी, 1994 को नई दिल्ली में गिरिजाकुमार माथुर का निधन हुआ।


 


Girijakumar Mathur (22 August 1918 - 10 January 1994) was a notable Indian writer of the Hindi language. He is noted for his translation of the popular English song "We Shall Overcome" into Hindi (हम होगें कामयाब). His father, Devicharan Mathur, was a teacher in a local school and greatly admired music as well as literature. Girijakumar Mathur is considered one of the most important writers in Hindi due to his efforts to modernise Hindi literature and promote it through many of his works.



Girijakumar Mathur was born in Guna, Madhya Pradesh, on 22 August 1918. He was homeschooled by his father in History, Geography and English. After obtaining his primary education in Jhansi, he was awarded a degree of M.A (English) and L.L.B from Lucknow University. After practicing law for a few years, he started working in All India Radio and later Doordarshan.On obtaining his law degree, Mathur initially worked as a lawyer, but subsequently joined the Delhi office of All India Radio. After a few years there, he moved on to join the then only television broadcasting organization of India, Doordarshan.


It was during his service in Doordarshan that mathur translated the popular gospel and civil rights movement song "We shall overcome" into Hindi as "Honge Kaamyab" (होंगे कामयाब). It was sung by a female singer of the Doordarshan orchestra and the music was arranged by Satish Bhatia using Indian musical instruments. This version of the song was subsequently released by TVS Saregama.[4][5] This Hindi rendition was released in 1970 as a song of social upliftment and was often broadcast by Doordarshan in the 1970s and 1980s. Doordarshan at that time was the only television station of India, and this song was especially played on days of national significance.


Mathur continued to work in Doordarshan, retiring in 1978 as the Deputy Director general.



Works
Girijakumar Mathur started his career in literature in 1934 in the Braj language.Greatly influenced by authors such as Makhanlal Chaturvedi and Balkrishna Sharma 'Navin', he published his first anthology, 'Manjir' in 1941. He was an important contributor to Hindi literature and used his works to spread moral messages through society. His notable works include:


Nash aur Nirman
Dhup ke Dhan
Sheilapankh Chamkile
Bhitri Nadi Ki Yatra (Anthology)
Janm Kaid (Play)
Nayi Kavita:Seemae aur Sambhavnae
Girijakumar Mathur was one of the seven eminent Hindi poets included in Taar Saptak, an anthology edited and published by Agyeya in 1943. Apart from poems, he wrote many plays, songs as well as essays. In 1991, he was awarded the Sahitya Akademi Award for his anthology, "Main Vakt ke Hun Samne" as well as the Vyas Samman[9] in the same year. He is noted for his translation of the popular English song "We Shall Overcome" into Hindi.


Mathur described his life's journey in his autobiography Mujhe aur abhi kehna hai (मुझे और अभी कहना है)


Girijakumar Mathur died on 10 January 1994, aged 75 in New Delhi.