चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख ( जन्म: 14 जनवरी, 1896)

January 14, 2017

चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख ( जन्म: 14 जनवरी, 1896 – मृत्यु: 2 अक्टूबर, 1982) ब्रिटिश शासन के अधीन आई.सी.एस. अधिकारी और भारतीय रिज़र्व बैंक के तीसरे गवर्नर थे।


परिचय
चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले में 14 जनवरी, 1896 ई. को हुआ। इनके पिता द्वारकानाथ देशमुख एक सम्मानित वकील थे तथा उनकी माँ भागीरथी बाई एक धार्मिक महिला थी। देशमुख ने 1912 में बंबई विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। साथ ही उन्होंने संस्कृत की जगन्नाथ शंकर सेट छात्रवृत्ति भी हासिल की। 1917 में उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से नेचुरल साइंस से, वनस्पति शास्त्र, रसायन शास्त्र तथा भूगर्भ शास्त्र लेकर, ग्रेजुएशन पास किया। साथ ही उन्होंने वनस्पति शास्त्र में फ्रैंक स्मार्ट प्राइस भी जीता। 1918 में लन्दन में आयोजित इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा में वह बैठे और उन्हें सफल उम्मीदवारों में पहला स्थान मिला। लन्दन में छट्टियाँ बिताने के दौरान देशमुख ने दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में बतौर एक सेक्रेटरी काम किया। उस कांफ्रेंस में महात्मा गाँधी भी भाग ले रहे थे। उस कांफ्रेंस में सेन्ट्रल प्राविंस तथा बेटर सरकार की ओर से एक ज्ञापन रखा गया जिसे देशमुख ने तैयार किया था। यह ज्ञापन सर आटो नीमेय्यर द्वारा की जाने वाली जाँच से सम्बन्धित था, जिसके आधार पर भारत सरकार के एक्ट 1935 के अन्तर्गत केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय सम्बन्धों की नीति तय की जानी थी। यह ज्ञापन इतना सूझ-बूझ भरा तथा योग्यतापूर्ण था कि उसकी सबने प्रशंसा की और देशमुख की राजनीतिक हलके में तथा वित्तीय प्रशासन क्षेत्र में पहचान बन गई। बागवानी उनका प्रिय शौक था। संस्कृत भाषा से उनका लगाव गहरा था और उनका संस्कृत भाषा में एक कविता संग्रह प्रकाशित भी हुआ था, हालाँकि वह कई विदेशी भाषाओं के भी ज्ञाता थे।


1939 में देशमुख रिज़र्व बैंक के लायजन ऑफिसर बने। इनका काम बैंक, व्यवस्था तथा सरकार के बीच तालमेल बनाए रखना था। तीन महीने के भीतर ही अपनी कार्य कुशलता के कारण देशमुख बैंक के सेन्ट्रल बोर्ड के सेक्रेटरी बना दिए गए। दो वर्ष बाद वह डिप्टी गवर्नर बने तथा 11 अगस्त 1943 को उन्हें गवर्नर बना दिया गया। यह पद उन्होंने 30 जून 1949 तक सम्भाला। अपने कार्यकाल में देशमुख एक बेहद प्रभावी गवर्नर सिद्ध हुए। उन्होंने रिज़र्व बैंक को निजी शेषन धारकों के बैंक से एक राष्ट्रीय बैंक के रूप में बदले जाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। देशमुख ने बैंकों की गतिविधियों को संयोजित करने के लिए ऐसा कानूनी ढाँचा तैयार करके दिया जो बिना किसी, बाधा के लम्बे समय तक चल सके। इसी के आधार पर ऋण नीतियाँ स्थापित की गईं और इण्डस्ट्रियल फाइनेंस कारपोरेशन ऑफ इण्डिया का गठन हो सका। ऐसा संवैधानिक ढाँचा बैंकिंग उद्योग के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। चिन्तामन देशमुख ने ग्रामीण वित्तीय ऋण भी तय किया जो रिज़र्व बैंक के कृषि ऋण कार्यक्रमों से तालमेल बैठाने में सफल हुआ और गाँव के ऋण पाने वालों, तथा रिज़र्व बैंक की व्यवस्था में किसी हिचकिचाहट की भी गुंजाइश नहीं रह गई। देशमुख की इस सूझबूझ भरी युक्ति की बड़ी प्रशंसा की गई और कहा गया कि इससे पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन आया है, जो लाभकारी है। जुलाई 1944 में चिन्तामन देशमुख ब्रेटन वुड्स कांफ्रेस में भाग ले रहे थे। वहाँ इनकी सक्रिय भूमिका से संयुक्त राष्ट्रसंघ की इकाई इन्टरनैशनल मॉनीटरी फंड (IMF) की स्थापना सम्भव हुई। इसी तरह इन्टरनैशनल बैंक फॉर रिकांस्ट्रक्शन एण्ड डवलेपमेंट की स्थापना भी हुई। इन दोनों संस्थानों के गवर्नर्स बोर्ड के सदस्य के रूप में देशमुख ने दस वर्षों तक काम किया और पेरिस में 1950 में जब इन दोनों संस्थानों की संयुक्त वार्षिक बैठक हुई उसमें देशमुख ने अध्यक्ष का दायित्व सम्भाला।


सितम्बर 1949 में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने देशमुख को भारत का स्पेशल फाइनेन्शियल अम्बेस्डर बनाकर अमेरिका तथा यूरोप में भेज दिया। वहाँ देशमुख ने अमरीका से गेहूँ की उधार योजना पर निर्णायक बातचीत की। उसी साल वर्ष के अंत में नेहरू जी ने योजना आयोग की सदस्यता का प्रस्ताव दिया। 1 अप्रैल 1920 में जब आयोग शुरू हुआ देशमुख उसके सदस्य बने। जल्दी ही देशमुख ने संसद में वित्तमंत्री का पद सम्भाला जहाँ वह जुलाई 1956 तक बने रहे। उनके इस मंत्री पद सम्भाल ने के दौरान देश की वित्तीय योजनाओं और उनके दृष्टिकोण में बड़े व्यापक परिवर्तन आए जिनका प्रभाव विकास की गति पर स्पष्ट देखा गया। देशमुख ने देश की पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। चिन्तामन देशमुख ने वित्तीय संरचना में सामाजिक नियन्त्रण की जगह बनाई जिससे नया कम्पनी एक्ट बनाया जा सका। इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ और जीवन बीमा कम्पनियों की संकल्पना की जा सकी। वर्ष 1956 से 1960 के बीच जब चिन्तामन देशमुख विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे विश्वविद्यालयों के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका।


वर्ष 1956 से 1960 के बीच जब चिन्तामन देशमुख विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन थे, तब शिक्षा तथा समाज सेवाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार सामने आए जिनसे विश्वविद्यालयों के कार्य स्तर में देशव्यापी विकास देखा जा सका। चिन्तामन मार्च 1960 से फरवरी 1967 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। उनके कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय ने उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में बेजोड़ नाम कमाया। वित्तीय कार्यक्षेत्र तथा शिक्षा क्षेत्र के अतिरिक्त देशमुख विविध विभागों में कार्यरत रहे। 1945 से 1964 तक लगातार वह इण्डियन स्टैटिस्टकल इन्टीट्यूट के प्रेसिडेंट रहे। 1965 में उन्होंने इण्डियन इकानोमिक ग्रोथ न्यू दिल्ली में प्रेसिडेंट का पद संभाला। 1957 से 1960 तक वह नेशनल बुक ट्रस्ट के ऑनरेरी चेयरमैन भी रहे। 1959 में इन्होंने इण्डिया इन्टरनेशनल सेंटर की स्थापना की जिसका आजीवन अध्यक्ष इन्हें बनाया गया। चिन्तामन देशमुख ने 1959 से 1973 तक बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव स्टॉफ कॉलेज ऑफ इण्डिया हैदराबाद अगुवाई की। इस तरह वह एकसाथ एक बार में कई-कई पदों का दायित्व सम्भालते रहे। अपने कार्यभार से मुक्त होने के बाद चिन्तामन देशमुख अपने परिवार में मग्न हो गए।


डॉ. चिन्तामणि द्वारकानाथ देशमुख का निधन 2 अक्टूबर, 1982 को हो गया।


सम्मान और पुरस्कार
कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा 'डॉक्टर ऑफ़ साइंस' (1957) की उपाधि मिली।
सन 1959 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित हुए।
सन 1975 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।



Sir Chintaman Dwarakanath Deshmukh, CIE, ICS (14 January 1896 – 2 October 1982) was an Indian civil servant and the first Indian[5] to be appointed as the Governor of the Reserve Bank of India in 1943 by the British Raj authorities. He subsequently served as the Finance Minister in the Union Cabinet (1950–1956). It was during this time that he also became a founding member of the Governing Body of NCAER, the National Council of Applied Economic Research in New Delhi, India's first independent economic policy institute established in 1956 at the behest of Prime Minister Jawaharlal Nehru. After resignation from Union Cabinet he worked as Chairman of UGC(1956–1961). He served as Vice-Chancellor of University of Delhi (1962–67).


He was also President of Indian Statistical Institute from 1945 to 1964, Honorary Chairman of National Book Trust (1957–60). He founded India International Center in 1959 and served as Lifetime President of it. He was also chairman of Indian Institute of Public Administration.


Chintaman Deshmukh was born in a Marathi-speaking Chandraseniya Kayastha Prabhu family[6] to Dwarakanath Ganesh Deshmukh, a lawyer and Bhagirathibai on 14 January 1896 in Nategaon, near Fort Raigad, Maharashtra.He was schooled at Roha and Tala and at the Elphinstone High School, Bombay.In 1912, Deshmukh passed the Matriculation Examination of the University of Bombay with record marks and secured the first Jagannath Shankarseth Scholarship in Sanskrit.[9] In 1915 he went to England and graduated with a degree in Natural Sciences Tripos from Jesus College, Cambridge in 1917. He was awarded the Frank Smart Prize in Botany and was also president of the Majlis Society. In 1918 he sat for, and topped, the Indian Civil Service Examination, then held only in London.



Deshmukh returned to India in 1920 and worked in the Central Provinces and Berar where he went on to hold several posts including as undersecretary to the government, Deputy Commissioner and Settlement Officer and as secretary to the Secretary-General at the Second Round Table Conference of 1931, later becoming secretary to the finance and public works department. He also served briefly as Joint Secretary to Government of India in the departments of education and health and was Custodian of Enemy Property.



Deshmukh joined the Reserve Bank of India in 1939 and served successively as its Secretary to the Board, Deputy Governor and the Governor. He was appointed Governor of the Reserve Bank of India in August 1943 and is one of only two Deputy Governors of the Bank who have gone on to become its Governor. As Governor, Deshmukh helped establish the Industrial Finance Corporation and focused on the promotion of rural credit.[18] Deshmukh's tenure saw the RBI begin a Research and Statistics department, the demonetisation of bank notes of ₹ 500 and above, the ceasing of the RBI's role as the central banks of Burma and State Bank of Pakistan and the enactment of the Banking Companies Act, 1949 that laid down the framework for regulation of India's banking sector.The RBI was nationalised on January 1, 1949 through the RBI Act, 1948.[20] Deshmukh opposed this proposal for nationalisation but agreed to continue as the chairman of the board of directors presiding over the transition of the bank from a private to a nationalised institution. In July 1949 Benegal Rama Rau succeeded Deshmukh as the Governor of the RBI.



Deshmukh was a member of a five-member delegation representing India at the Bretton Woods Conference that established the International Monetary Fund (IMF) and International Bank for Reconstruction and Development (IBRD). On the issue of quotas, Deshmukh suggested that India walk out of the conference since the original hierarchy would have excluded India from being automatically represented through an executive director at the IMF. The delegation also succeeded in bringing the issues of poverty and development into the agenda of the IBRD. It is said that John Maynard Keynes was so impressed by the “dignity, ability and reasonableness” of Deshmukh that he recommended Deshmukh head the IMF as its first managing director a suggestion that was however rejected by the United States.


He was a member of the Board of Governors of both of these institutions from 1946-1956. In 1950, he was elected Chairman of the Joint Annual Meeting of the Boards of Governors of these institutions at its Paris Conference.Following Partition, the division of income tax revenue and jute export duty between the Union and the states of India had to be decided based on the changed geographical realities. The Government of India appointed Deshmukh to resolve this matter pending the establishment of a Finance Commission. The Deshmukh Award, which was effected in 1950, factored in population in deciding the division of revenue and recommended grants in aid for various states and remained in force until April 1952.



Shortly after his resignation from the Cabinet, Deshmukh was appointed as Chairman of India's University Grants Commission in 1956, a post he held until 1961. Deshmukh, who was the first chairman of the commission after it became a statutory body, played a key role in the development of university libraries during his tenure.He was also the founding chairman of the National Book Trust which was inaugurated in 1957 with the aim of making available books priced moderately to the general public and libraries. From 1962 - 1967, Deshmukh served as the tenth Vice Chancellor of the University of Delhi. He invited the Ford Foundation to survey and finance the upgradation of the Delhi University Library through a grant of US$ 1 million.


Deshmukh contested the Indian presidential election of 1969 as a candidate of the Swatantra Party and the Jana Sangh and won the third-highest number of first preference votes.
Deshmukh was appointed a Companion of the Order of the Indian Empire in 1937 and conferred a knighthood in 1944.


He was awarded an honorary Doctor of Science by the University of Calcutta in 1957 and an honorary Doctor of Literature by the Panjab University in 1959.


In 1959, Deshmukh was a co-recipient (along with Jose Aguilar of the Philippines[80]) of the Ramon Magsaysay Award for distinguished Government Service. Jesus College, Cambridge, Deshmukh's alma mater, elected him its Honorary Fellow in 1952 in recognition of his distinguished contribution in the areas of Indian and international finance and administration.


In 1975, Chintaman and Durgabai Deshmukh were awarded the Padma Vibhushan.