कैफ़ी आज़मी ( जन्म: 14 जनवरी, 1919)

January 14, 2017

कैफ़ी आज़मी ( जन्म: 14 जनवरी, 1919 - मृत्यु: 10 मई, 2002) फ़िल्मजगत के मशहूर उर्दू शायर थे। कैफ़ी आज़मी का मूल नाम अख़्तर हुसैन रिज़्वी था। कैफ़ी आज़मी में नैसर्गिक काव्य प्रतिभा थी और वह छोटी उम्र में ही वे शायरी करने लगे थे।


जीवन परिचय
कैफ़ी आज़मी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में 19 जनवरी 1919 हुआ था। कैफ़ी आज़मी के परिवार में उनकी पत्नी शौकत आज़मी, इनकी दो संतान शबाना आज़मी (फ़िल्मजगत की मशहूर अभिनेत्री और जावेद अख़्तर की पत्नी) और बाबा आज़मी है।


कैफ़ी आज़मी के तहसीलदार पिता उन्हें आधुनिक शिक्षा देना चाहते थे। किंतु रिश्तेदारों के दबाव के कारण कैफ़ी आज़मी को इस्लाम धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए लखनऊ के 'सुलतान-उल-मदरिया' में भर्ती कराना पड़ा। लेकिन वे अधिक समय तक वहाँ नहीं रह सके। उन्होंने वहाँ यूनियन बनाई और लंबी हड़ताल करा दी। हड़ताल समाप्त होते ही कैफ़ी आज़मी को वहाँ से निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने लखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई और उर्दू, अरबी और फ़ारसी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।


कैफ़ी आज़मी में नैसर्गिक काव्य प्रतिभा थी। छोटी उम्र में ही वे शायरी करने लगे थे। यद्यपि उनकी आरंभिक रचनाओं में प्रेम-भावना प्रधान होती थी, किंतु शीघ्र ही उसमें प्रगतिशील विचारों का प्राधान्य हो गया। राजनीतिक दृष्टि से वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। कैफ़ी आज़मी पार्टी के काम के लिए मुम्बई गए थे। वहाँ उनका संबंध इंडियन पीपुल्स थियेटर से हुआ और आगे चलकर वे उसके अध्यक्ष भी बने। कैफ़ी आज़मी बहुत कम उम्र में जाने-माने शायर हो चुके थे। वे मुशायरों में स्टार थे, लेकिन वे पूरी तरह से कम्युनिस्ट पार्टी के लिए समर्पित थे। वे पार्टी के कामों में मशरूफ रहते थे। वे कम्युनिस्ट पार्टी के पेपर 'कौमी जंग' में लिखते थे और ग्रासरूट लेवल पर मज़दूर और किसानों के साथ पार्टी का काम भी करते थे। इसके लिए पार्टी उनको माहवार चालीस रूपए देती थी। उसी में घर का खर्च चलता था।


कैफ़ी आज़मी इस मामले में बहुत ही खुशक़िस्मत रहे कि उन्हें दोस्त हमेशा ही बेहतरीन मिले। मुंबई में इप्टा के दिनों में उनके दोस्तों की फेहरिस्त में जो लोग थे वे बाद में बहुत बड़े और नामी कलाकार के रूप में जाने गए। इप्टा में ही होमी भाभा, किशन चंदर, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी, मोहन सहगल, मुल्कराज आनंद, रोमेश थापर, शैलेन्द्र, प्रेम धवन, इस्मत चुगताई, ए. के. हंगल, हेमंत कुमार, अदी मर्जबान, सलिल चौधरी जैसे कम्युनिस्टों के साथ उन्होंने काम किया। प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन के संस्थापक सज्जाद ज़हीर के ड्राइंग रूम में मुंबई में उनकी शादी हुई थी। उनकी जीवन साथी शौक़त कैफ़ी ने उन्हें इस लिए पसंद किया था कि कैफ़ी आज़मी बहुत बड़े शायर थे।


1946 में भी उनके तेवर इन्क़लाबी थे और अपनी माँ की मर्जी के ख़िलाफ़ अपने प्रगतिशील पिता के साथ औरंगाबाद से मुंबई आकर उन्होंने कैफ़ी से शादी कर ली थी। शादी के बाद कैफ़ी ने बड़े पापड़ बेले। अपने गाँव चले गए जहां एक बेटा पैदा हुआ, शबाना आज़मी का बड़ा भाई। एक साल का भी नहीं हो पाया था कि चला गया। बाद में वाया लखनऊ मुंबई पहुंचे। शुरुआत में भी लखनऊ रह चुके थे, दीनी तालीम के लिए गए थे लेकिन इंसाफ़ की लड़ाई शुरू कर दी और निकाल दिए गए थे। जब उनकी बेटी शबाना शौकत आपा के पेट में आयीं तो कम्युनिस्ट पार्टी ने फरमान सुना दिया कि एबार्शन कराओ, कैफ़ी अंडरग्राउंड थे और पार्टी को लगता था कि बच्चे का खर्च कहाँ से आएगा। शौकत कैफ़ी अपनी माँ के पास हैदराबाद चली गयीं। वहीं शबाना आज़मी का जन्म हुआ। उस वक़्त की मुफलिसी के दौर में इस्मत चुगताई और उनेक पति शाहिद लतीफ़ ने एक हज़ार रुपये भिजवाये थे। यह खैरात नहीं थी, फ़िल्म निर्माण के काम में लगे शाहिद लतीफ़ साहब अपने एक फ़िल्म में कैफ़ी के लिखे दो गीत इस्तेमाल किये थे। [2]


फ़िल्मों में प्रवेश
कैफ़ी आज़मी की बीवी शौकत आजमी को बच्चा होने वाला था। कम्युनिस्ट पार्टी की हमदर्द और 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' की मेंबर थीं इस्मत चुगतई। उन्होंने अपने शौहर शाहिर लतीफ से कहा कि तुम अपनीफ़िल्म के लिए कैफ़ी से क्यों नहीं गाने लिखवाते हो? कैफ़ी साहब ने उस वक्त तक कोई गाना नहीं लिखा था। उन्होंने लतीफ साहब से कहा कि मुझे गाना लिखना नहीं आता है। उन्होंने कहा कि तुम फ़िक्र मत करो। तुम इस बात की फ़िक्र करो कि तुम्हारी बीवी बच्चे से है और उस बच्चे की सेहत ठीक होनी चाहिए। उस वक्त शौकत आजमी के पेट में जो बच्चा था, वह बड़ा होकर शबाना आजमी बना।


पहला गीत
कैफ़ी आज़मी ने 1951 में पहला गीत 'बुझदिल फ़िल्म' के लिए लिखा- 'रोते-रोते बदल गई रात'। कैफ़ी आज़मी ट्रेडीशनल बिल्कुल नहीं थे। शिया घराने में एक ज़मींदार के घर में उनकी पैदाइश हुई थी। मर्सिहा शिया के रग-रग में बसा हुआ है। मुहर्रम में मातम के दौरान हजरत अली को जिन अल्फाजों में याद करते हैं, वह शायरी में है। वे जिस माहौल में पले-बढ़े, वहां शायरी का बोल-बाला था। गयारह साल की उम्र में उन्होंने लिखा था, ‘‘इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े, हंसने से हो सुकूं, न रोने से कल पड़े.’’


गर्म हवा
Main.jpg मुख्य लेख : गर्म हवा
भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को लेकर जितनी फ़िल्में आज तक बनी हैं, उनमें ‘गरम हवा’ को आज भी सर्वोत्कृष्ट फ़िल्म का दर्जा हासिल है। ‘गरम हवा’ फ़िल्म की कहानी, पटकथा, संवाद कैफ़ी आजमी ने लिखे। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि ‘गरम हवा’ पर कैफ़ी आजमी को तीन-तीन फ़िल्म फेयर अवार्ड दिए गए। पटकथा, संवाद पर बेस्ट फ़िल्म फेयर अवार्ड के साथ ही कैफ़ी को ‘गरम हवा’ पर राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।[2]


गुरुदत्त के साथ
उनको पहला बड़ा ब्रेक मिला 1959 में, फ़िल्म काग़ज के फूल में। अबरार अल्वी ने उन्हें गुरूदत्त से मिलवाया। गुरूदत्त से बड़ी जल्दी उनकी अच्छी बन गई। कैफ़ी साब कहते थे-


"उस जमाने में फ़िल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी। आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी। उसके बाद उसमें शब्द पिरोए जाते थे। ये ठीक ऐसे ही था कि पहले आपने क़ब्र खोद ली, फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश करें। तो कभी मुर्दे का पैर बाहर रहता था तो कभी कोई अंग। मेरे बारे में फ़िल्मकारों को यकीन हो गया कि ये मुर्दे ठीक गाड़ लेता है, इसलिए मुझे काम मिलने लगा।"
कैफ़ी आज़मी यह भी बताते हैं कि कागज के फूल का जो मशहूर गाना है 'वक्त ने किया क्या हंसीं सितम..' ये यूं ही बन गया था। एस डी बर्मन और कैफ़ी आजमी ने यूं ही यह गाना बना लिया था, जो गुरूदत्त को बेहद पसंद आया। उस गाने के लिए फ़िल्म में कोई सिचुएशन नहीं थी, लेकिन गुरूदत्त ने कहा कि ये गाना मुझे दे दो। इसे मैं सिचुएशन में फिट कर दूंगा। आज अगर आप कागज के फूल देखें तो ऐसा लगता है कि वह गाना उसी सिचुएशन के लिए बनाया गया है। कैफ़ी साहब के गाने बेइंतेहा मशहूर हुए, लेकिन फ़िल्म कामयाब नहीं हुई। गुरूदत्त डिप्रेशन में चले गए। उसके बाद कैफ़ी साहब के पास 'शोला और शबनम' फ़िल्म आई। उसके गाने बहुत मशहूर हुए। जाने क्या ढूंढती हैं ये आंखें मुझमें और जीत ही लेंगे बाजी हम-तुम, लेकिन फिर फ़िल्म नहीं चली। फिर 'अपना हाथ जगन्नाथ' आई। एक के बाद एक कैफ़ी साहब की काफ़ी फ़िल्में आईं और सबके गाने मशहूर, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर एक भी फ़िल्म नहीं चली। 'शमा' ज़रूर एक फ़िल्म थी, जिसमें सुरैया थीं, उसके गाने मशहूर हुए और वह फ़िल्म भी चली, लेकिन ज़्यादातर जिन फ़िल्मों में इन्होंने गाने लिखे, वह नहीं चलीं। फिर फ़िल्म इंडस्ट्री ने इनसे पल्ला झाडऩा शुरू कर दिया और लोग यह बात कहने लगे कि कैफ़ी साहब लिखते तो बहुत अच्छा हैं, लेकिन ये अनलकी हैं।
इस माहौल में चेतन आनंद एक दिन कैफ़ी साहब के घर आए। उन्होंने कहा कि कैफ़ी साहब, बहुत दिनों के बाद मैं एक फ़ि बना रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरी फ़िल्म के गाने आप लिखें। कैफ़ी साहब ने कहा कि मुझे इस वक़्त काम की बहुत ज़रूरत है और आपके साथ काम करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है, लेकिन लोग कहते हैं कि मेरे सितारे गर्दिश में हैं। चेतन आनंद ने कहा कि मेरे बारे में भी लोग यही कहते हैं। मैं मनहूस समझा जाता हूं। चलिए, क्या पता दो निगेटिव मिलकर एक पॉजिटिव बन जाएं। आप इस बात की फ़िक्र न करें कि लोग क्या कहते हैं। कर चले हम फ़िदा जाने तन साथियों.. गाना बना। हक़ीक़त (1964) फ़िल्म के तमाम गाने और वह पिक्चर बहुत बड़ी हिट हुई। उसके बाद कैफ़ी साहब का कामयाब दौर शुरू हुआ। चेतन आनंद साहब की तमाम फ़िल्में वो लिखने लगे, जिसके गाने बहुत मशहूर हुए।[1]


हीर राँझा
हीर रांझा (1970) में कैफ़ी साहब ने एक इतिहास कायम कर दिया। उन्होंने पूरी फ़िल्म शायरी में लिखी। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। आप उसका एक-एक शब्द देखें, उसमें शायरी है। उन्होंने इस फ़िल्म पर बहुत मेहनत की। वह रात भर जागकर लिखते थे। उन्हें हाई ब्लडप्रेशर था, सिगरेट बहुत पीते थे। इसी दौरान उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ और फिर पैरालसिस हो गया। उसके बाद फिर एक नया दौर शुरू हुआ। नए फ़िल्ममेकर्स कैफ़ी साहब की तरफ आकर्षित होने लगे। उनमें चेतन आनंद के बेटे केतन आनंद थे। उनकी फ़िल्म 'टूटे खिलौने' के गाने उन्होंने लिखे। उसके बाद उन्होंने मेरी दो-तीन फ़िल्मों टूटे खिलौने, भावना, अर्थ के गाने लिखे। बीच में सत्यकाम, अनुपमा, 'दिल की सुनो दुनिया वालो' बनी। ऋषिकेष मुखर्जी के साथ भी उन्होंने काम किया। अर्थ के गाने बहुत लोकप्रिय हुए और फ़िल्म भी बहुत चली।[1]


कहानी लेखक
कैफ़ी आज़मी ने कहानी लेखक के रूप में फ़िल्मों में प्रवेश किया। 'यहूदी की बेटी' और 'ईद का चांद' उनकी लिखी आरंभिक फ़िल्में थीं। उन्होंने 'गर्म हवा' और 'मंथन' जैसी फ़िल्मों में संवाद भी लिखें। उन्होंने अनेक फ़िल्मों में गीत लिखें जिनमें कुछ प्रमुख हैं- 'काग़ज़ के फूल' 'हक़ीक़त', हिन्दुस्तान की क़सम', हंसते जख़्म 'आख़री ख़त' और हीर रांझा'।


नज़्म संग्रह
कैफ़ी आज़मी ने आधुनिक उर्दू शायरी में अपना एक ख़ास स्थान बनाया। कैफ़ी आज़मी की नज़्मों और ग़ज़लों के चार संग्रह हैं:-


झंकार-
आखिरे-शब
आवारा सिज्दे
इब्लीस की मजिलसे शूरा।
बहुआयामी प्रतिभा
कैफ़ी आज़मी बहुआयामी प्रतिभा से संपन्न थे। शायर, गद्यकार (तंज), नाटककार, फ़िल्मकार (गीत, कहानी, पटकथा, संवाद, अभिनय) के साथ ही साथ कैफ़ी मज़दूर सभा, ट्रेड यूनियन में काम करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के एक कुशल संगठनकर्ता थे। कैफ़ी एक पुख़्ता कामरेड थे और जीवन के अंतिम समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर बने रहे। कैफ़ी लाल कार्ड को हमेशा सीने से लगाकर रखते थे। बंबई में कैफ़ी के घर ख्वाजा अहमद अब्बास, भीष्म साहनी, बेगम अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, जोश मलीहाबादी, फैज अहमद फैज, फिराक़ गोरखपुरी जैसी तमाम बड़ी हस्तियों का आना-जाना रहता था। मज़े की बात तो यह है कि अली सरदार जाफ़री का पहला संग्रह, परवाज मखदूम मोहीउद्दीन का पहला संग्रह ‘सुर्ख सबेरा’, जज्बी का पहला संग्रह ‘फरोजां’ और कैफ़ी आज़मी का पहला संग्रह ‘झनकार’ 1943 में लगभग एक साथ प्रकाशित हुए।


विशेष जानकारी
कैफ़ी आज़मी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले में 'मिजवां ग्राम' में 1919 में हुआ था।
कैफ़ी आज़मी की जन्मतिथि उनकी अम्मी को याद नहीं थी। उनके मित्र डॉक्यूमेंट्री फ़िल्ममेकर सुखदेव ने उनकी जन्मतिथि चौदह जनवरी रख दी थी।
उन्होंने 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली। बाद में वे 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' के सक्रिय कार्यकर्ता बने।
1951 में वे फ़िल्मों से जुड़े। शाहिद लतीफ़ की फ़िल्म 'बुझदिल' में उन्होंने पहली बार गीत लिखे। बाद में उन्होंने 'हीर रांझा', 'मंथन' और 'गर्म हवा' फ़िल्मों का लेखन किया।
कैफ़ी आज़मी ने सईद मिर्ज़ा की फ़िल्म 'नसीम' (1997) में अभिनय किया। यह किरदार पहले दिलीप कुमार निभाने वाले थे।
कैफ़ी आज़मी केवल 'मॉन्ट ब्लॉक पेन' से लिखते थे। उनकी पेन की सर्विसिंग न्यूयॉर्क के 'फाउंटेन हॉस्पिटल' में होती थी। जब उनकी मौत हुई, तो उनके पास अट्ठारह मॉन्ट ब्लॉक पेन थे।
कैफ़ी आज़मी को 'सात हिंदुस्तानी' (1969) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था। इसके अलावा, उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं गर्म हवा (1975) के लिए सर्वश्रेष्ठ कथा, पटकथा एवं संवाद के फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
कैफ़ी आज़मी ने कुल अस्सी हिंदीफ़िल्मों में गीत लिखे हैं।[1]
सम्मान और पुरस्कार
कैफ़ी आज़मी को अपनी विभिन्न प्रकार की रचनाओं के लिये कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-


1975 कैफ़ी आज़मी को आवारा सिज्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किये गये।
1970 सात हिन्दुस्तानी फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार
1975 गरम हवा फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ वार्ता फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
निधन
फ़िल्मजगत के मशहूर उर्दू के शायर कैफ़ी आज़मी का निधन 10 मई 2002 को हृदयाघात (दिल का दौरा) के कारण मुम्बई में हुआ।


Sayyid Akhtar Hussein Rizvi, known as Kaifi Azmi  (14 January 1919 – 10 May 2002) was an Indian Urdu poet. He is remembered as the one who brought Urdu literature to Indian motion pictures. Together with Pirzada Qasim, Jon Elia and others he participated in the most memorable mushairas of the twentieth century.Azmi was born into a shia Muslim family in the village of Mizwaa(n) in Azamgarh district, Uttar Pradesh, India.


Azmi was married to Shaukhat Azmi. They have a daughter, Shabana Azmi (An Indian Actress of film, television and theatre) and a son, Baba Azmi (Indian Cinematographer).At age eleven, Azmi wrote his first ghazal Itna To Zindagi Mein Kisi Ki Khalal Pade and somehow managed to get himself invited to a mushaira and over there, he recited a ghazal, rather a couplet of the ghazal which was very much appreciated by the president of the mushaira, Mani Jaisi, but most of the people, including his father, thought he recited his elder brother's ghazal. When his elder brother denied it, his father and his clerk decided to test his poetic talent. They gave him one of the lines of a couplet and asked him to write a ghazal in the same meter and rhyme. Azmi accepted the challenge and completed a ghazal.


This particular ghazal was to become a rage in undivided India and it was immortalised as it was sung by legendary ghazal singer, Begum Akhtar. Azmi abandoned his studies of Persian and Urdu during the Quit India agitations in 1942 and shortly thereafter became a full-time Marxist when he accepted membership of the Communist Party of India in 1943.During this period, the leading progressive writers of Lucknow noticed him. They were very impressed by his leadership qualities. They also saw in him a budding poet and extended all possible encouragement towards him


. Consequently, Azmi started to win great acclaim as a poet and became a member of Progressive Writers' Movement of India. At the age of twenty-four, he started activities in the textile mill areas of Kanpur. As a full-time worker, he left his life of comfort, though he was the son of a zamindar. He was asked to shift his base to Bombay, work amongst the workers and start party work with a lot of zeal and enthusiasm and at the same time would attend mushairas in different parts of India. In Bombay, he joined Ali Sardar Jafri in writing for the party's paper, Qaumi Jung. In 1947, he visited Hyderabad to participate in a mushaira. There he met, fell in love with and married a woman named Shaukat Azmi. She later became a renowned actress in theatre and films. They had two children together, Shabana Azmi (b. 1950), a renowned actress of Indian cinema and Baba Azmi, a noted cameraman.



Like most of the Urdu poets, Azmi began as a ghazal writer, cramming his poetry with the repeated themes of love and romance in a style that was replete with clichés and metaphors. However, his association with the Progressive Writers' Movement and Communist Party made him embark on the path of socially conscious poetry. In his poetry, he highlights the exploitation of the subaltern masses and through them he conveys a message of the creation of a just social order by dismantling the existing one. Yet, his poetry cannot be called plain propaganda. It has its own merits; intensity of emotions, in particular, and the spirit of sympathy and compassion towards the disadvantaged section of society, are the hallmark of his poetry. His poems are also notable for their rich imagery and in this respect, his contribution to Urdu poetry can hardly be overstated. Azmi's first collection of poems, Jhankar was published in 1943. His important works including anthologies of poetry, were Aakhir-e-Shab, Sarmaya, Awaara Sajde, Kaifiyaat, Nai Gulistan, an anthology of articles he wrote for Urdu Blitz, Meri Awaaz Suno, a selection of his film lyrics, and the script of Heer Ranjha in Devanagari.


Azmi's work in films includes working as a lyricist, writer and actor. Azmi wrote his first lyrics for the film Buzdil, directed by Shaheed Latif and music by SD Burman, released in 1951. His early work as a writer was mainly for Nanubhai Vakil's films like Yahudi Ki Beti (1956), Parvin (1957), Miss Punjab Mail (1958) and Id Ka Chand (1958). While directors like Khwaja Ahmad Abbas and Bimal Roy strove to create the "New Cinema", writers like Sahir Ludhianvi, Jan Nisar Akhtar, Majrooh Sultanpuri, and Kaifi changed the tenor and vocabulary of the Hindi film song, creating a fresh new wave in Hindi film lyrics that lasted many years.  His greatest feat as a writer was Chetan Anand's Heer Raanjha (1970) wherein the entire dialogue of the film was in verse. It was a tremendous achievement and one of the greatest feats of Hindi film writing.


Azmi also won great critical accolades for the script, dialogues and lyrics of M.S. Sathyu's Garam Hawa (1973), based on a story by Ismat Chughtai. Azmi also wrote the dialogues for Shyam Benegal's Manthan (1976) and Sathyu's Kanneshwara Rama (1977). As a lyricist and songwriter, though he wrote for numerous films, he will always be remembered for Guru Dutt's Kaagaz Ke Phool (1959) and Chetan Anand's Haqeeqat (1964), India's greatest war film. Some notables films for which he wrote lyrics include Kohra (1964), Anupama (1966), Uski Kahani (1966), Saat Hindustani (1969), Shola Aur Shabnam, Parwana (1971), Bawarchi (1972), Pakeezah (1972), Hanste Zakhm (1973), Arth (1982) and Razia Sultan (1983). For Naunihal (1967), he wrote the song "Meri Aawaz Suno Pyar ka Raaz Suno" (Hear my voice, hear the secret of love) sung by Mohammad Rafi. The song is picturised over the funeral procession of Prime Minister of India, Jawahar Lal Nehru. Years later, after Azmi's own death his daughter, Shabana Azmi mentioned finding comfort in verses from the song.[6] He also played a memorable role of Naseem's grandfather in Naseem (1995). Azmi died on 10 May 2002 at around the age of eighty three. He was survived by his wife, daughter and son. His autobiography is included in a collection of his works, Aaj Ke Prashid Shayar: Kaifi Azmi.



Awards
He was the recipient of Padma Shri, India's fourth highest civilian award. Besides he was awarded the Uttar Pradesh Urdu Academy Award and the Sahitya Akademi Award for Urdu for his collection Awaara Sajde, Special Award of Maharashtra Urdu Academy, Soviet Land Nehru Award, Lotus Award from the Afro-Asian Writers' Association, and President's Award for national integration. In 1998, Government of Maharashtra conferred the Jyaneshwara Award on him. He was also honoured with the prestigious Sahitya Akademi Fellowship for lifetime achievement.


In 2000, he was conferred the first Millennium Award by the Government of Delhi and the Delhi Urdu Academy. He has also been honoured with a doctorate from Vishva Bharati University, Santiniketan. 


Sahitya Akademi Award
1975: Sahitya Akademi Award: Awara Sajde
2002: Sahitya Akademi Fellowship (Immortals of Literature)



National Film Awards
1970: National Film Award for Best Lyrics: Saat Hindustani



Famous Hindi film songs:


1. Jeet hi lenge baazi hum tum----------Shola Aur Shabnam


2. Jane kya dhoondti raheti hai---------Shola Aur Shabnam


3. Waqt ne kiya kya haseen sitam--------Kaagaz Ke Phool


4. Dekhi zamaane ki yaari---------------Kaagaz Ke Phool


5. Jhoom jhoom dhalti raat--------------Kohra


6. Ye nain dare dare--------------------Kohra


7. O beqaraar dil-----------------------Kohra


8. Zara si aahat hoti hai to------------Haqeeqat


9. Kar chale hum fida-------------------Haqeeqat


10. Maye ye soch kar us ke dar se-------Haqeeqat


11. Pyaasi hirni ban ban----------------Do Dil


12. Saara mora kajra--------------------Do Dil


13. Tera husn rahe mera ishq rahe-------Do Dil


14. Kuchh dil ne kaha-------------------Anupama


15. Dheere dheere machal----------------Anupama


16. Ya dil ki suno duniyawaalon---------Anupama


17. Bahaaron mera jeevan bhi------------Aakhri Khat


18. Aur kuchh der thaher----------------Aakhri Khat


19. Mile na phool to kaanto se----------Anokhi Raat


20. Meri awaaz suno---------------------Naunihal


21. Tumhari zulf ke saaye me------------Naunihal


22. Tum se bichhad ke chain kahan-------Maharaja


23. Tum bin jeevan kaisa jeevan---------Bawarchi


24. Ye duniya ye mehfil-----------------Heer Ranjha


25. Do dil toote do dil haare-----------Heer Ranjha


26. Milo na tum to hum ghabraaye--------Heer Ranjha


27. Meri duniya me tum aai--------------Heer Ranjha


28. Simti si sharmaai si----------------Parwana


29. Jis din se maine tum ko dekha-------Parwana


30. Ye raat hai pyaasi pyaasi-----------Chhoti Bahu


31. Aaj socha to aansoo bhar aaye-------Haanste Zakham


32. Betaab dil ki tamanna---------------Haanste Zakham


33. Tum jo mil gaye ho------------------Haanste Zakham


34. Hai tere saath meri wafa------------Hindustan Ki Kasam


35. Har taraf ab ye hi afsaane hai------Hindustan Ki Kasam


36. Hone lagi hai raat jawaan-----------Naina


37. Jalta hai badan---------------------Razia Sultan


38. Tum itna jo muskura rahe ho---------Arth


39. Jhuki jhuki si nazar----------------Arth


40. Koi ye kaise bataaye----------------Arth